Thursday, 17 October 2013

अलकटराज़ देखा?



Book : ALAKATRAZ DEKHA?
Author : Chandrakanta
Publisher : Vani Prakashan
Price : Rs.250(HB)
ISBN :978-93-5072-430-9
Total Pages : 124
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category : Collection of Stories

पुस्तक के संदर्भ में...

चन्द्रकान्ता लेखन को मात्र भाषा विलास मानकर इनसानी जीवन की शर्त मानती हैं। अपने अनुभव वृत में आये समय सत्य के कुछ विशेष प्रसंगों और विचलित करने वाले स्थिति खण्डों को रचनात्मक विवेक और संवेदनात्मक घनत्व से कहानी में ढाल पाठकों से संवाद करती हैं। इस संवाद के पाश्र्व में, कुछ मूल्यगत चिन्तायें, कुछ मानवीय सरोकार, दृश्य-अदृश्य रुप में अवस्थित होते हैं। स्त्री लेखन की बनी बनाई रूढ़ियाँ ढ़ोने के बजाय उन्होंने इस वैश्विक होते समय में, व्यवस्था के दुष्चक्र में फँसे मनुष्य की त्रासद स्थितियों से जुड़ने की कोशिश की है।

अधिकांश कहानियाँ अमानवीयकरण, आतंक और मूल्यखिन्नता के उभार से जन्मी त्रासदियाँ हैं। उनकी जन्मभूमि कश्मीर की रक्तिरंजन पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियों में आतंकवाद की परिणतियाँ, भय, अविश्वास और बेघर होने की पीड़ा का करुण राग ही नहीं, (एक ही झील) दु: में हिस्सेदारी निभाती उदात्त मानवीयता भी है (रक्षक) वहाँ विस्थापन की पीड़ा है, अपने महादेश में बाहरीजन होने का कलेजा कोरता अहसास है, विगत के वैभव धूमिल होती स्मृतियाँ हैं तो ध्वस्त खँडहरों में भी जीवन की गूँज सुनने की कोशिश है। कोई भी विपत्ति जीवन से बढ़कर नहीं। आदिकाल से मनुष्य के भीतरी तहखानों में बजते जो जीवन के मद्धम सुर हैं वे निर्जन में भी उत्सव का राग रचते हैं, (निर्जन का उत्सव) लेखिका का नितान्त निजी सच, बाह्य जगत के, विशाल आनुभूतिक ज्ञान से जुड़कर जिस कथालोक की सर्जना करता है, वह उस वैयक्तिक को सार्वजनिक और सार्वभौमिक विस्तार देता है।

तेज़ी से बदलते इस अर्थकेन्द्रित समय में तकनीकी-प्रोद्यौगिकी प्रगति ने भले बाहर की दूरियाँ कम कर दीं, पर मनों की दूरियाँ बढ़ा दी हैं। भौतिक संसाधनों को पाने की दौड़ में आत्मीय रिश्ते-नाते अपनी उष्णता खोकर कैसे एक निभाव मात्र बन कर रह गये हैं इसे 'अनवांटेड विल...' कहानी में देखा जा सकता है। प्रेम जैसे अन्तरंग सम्बन्धों में जुड़ाव की जगह अब अपने-अपने अलग स्पेस ढूँढ़ने की प्रयोगात्मक होड़ मची है। (थोड़ा सा स्पेस अपने लिए) इस की एक बानगी है। स्त्री विमर्श के झंडे उठाए बिना, लेखिका स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को, सामाजिक-पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में शिद्दत से उठाती, स्वतन्त्र चेता स्त्री के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। आज की चेतना सम्पन्न स्त्री, पुरुष वर्चस्व का दम्भ और रूढ़ नैतिकता की कैद को अपनी नियति मानने से इनकार करती है। (अलकटराज़ देखा?) उम्रकैद की यातना से छुटकारा पाने के लिए वह केवल आवाज़ उठाती है, बल्कि उससे मुक्त होने के लिए छोटे-बड़े संघर्षों के बीच गुज़रती अपनी आकांक्षा और स्वप्नों को पूरा करने के लिए भी सन्नद्ध है। इसे 'अलकटराज़ देखा?', 'पिंजरे में हवा', पीर पर्वत', 'गुम चोट' और 'गुच्छा भर काले केश' कहानियों में महसूस किया जा सकता है।

भ्रष्ट व्यवस्था के संजाल बीच, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का मोहभंग, वृद्धावस्था में अकेले पड़ने की यातना, आदि, युगीन यथार्थ के विद्रूपों को कहानियों में इस प्रकार गूँथा गया है कि कहानियाँ प्रश्नाकूल भी करती हैं और संवेदना का उत्खनन भी।

मनुष्य के संवेदनशून्य होने से पहले, उसमें थोड़ा मनुष्य बचा रहे, इसी उम्मीद का रचनात्मक प्रयास हैं यह कहानियाँ!



पुस्तक के अनुक्रम

थोड़ा सा स्पेस अपने लिए
अलकटराज़ देखा?
पिंजरे में हवा
चलो, उड़ चलें!
आउटडेटिड विल उर्फ़ राग बेमौसम
गुच्छाभर काले केश और दो अंगुल का माथा
अगले पड़ाव तक
पीर पर्वत
गुम चोट
निर्जन में उत्सव
रक्षक
एक ही झील

लेखिका के संदर्भ में...

व्यास सम्मान, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल संस्थान से सम्मानित, जम्मू-कश्मीर कल्चरल अकादमी, हरियाणा साहित्य अकादमी, हिन्दी अकादमी, दिल्ली, हिन्दी संस्थान, लखनऊ आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत तथा सम्मानित चन्द्रकान्ता का जन्म 3 सितम्बर 1938 में कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था। इनके उपन्यास 'स्ट्रीट इन श्रीनगर' (ऐलाम गली ज़िंदा है का अंग्रेज़ी अनुवाद) को डीएससी प्राइज़ फॉर साउथ एशियन लिटरेचर 2012 के लिए शार्ट लिस्ट किया गया। जम्मू-कश्मीर दूरदर्शन द्वारा कई कहानियों का फिल्मांकन एवं आकाशवाणी दिल्ली द्वारा ''कथा सतीसर' और यहाँ वितस्ता है' उपन्यासों का तेरह भागों में रेडियो धारावाहिक प्रसारण किया गया।