Monday, 15 April 2013

चिन्ह्न




Book :  CHINNH
Author :  Piyush Daiya
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 94
ISBN : 978-93-5072-396-8(HB)
Price :  `150(HB)
Size (Inches) : 5.50x8.25
First Edition : 2013
Category  : Poetry

पुस्तक के सन्दर्भ में यतीन्द्र मिश्र जी के विचार ...
पीयूष दईया जैसे चिन्तक, सर्जक की कविताओं के बारे में शब्दबद्ध कुछ भी उकेरना साधारण बात को भी भाषा में थोड़ा वक्र करके देखने जैसा है। वे भाषा की आत्यन्तिक निजता को रेशा-रेशा विवरणहीन बनाते रहे हैं। हम यह मुश्किल से तय कर पाते हैं कि पीयूष की कविताई को भाषा के किस फ्रेम में रखकर उसका समवेत पाठ कर सकें।
पीयूष की कविताएँ समकालीन हिन्दी परिदृश्य में अपवाद सरीखी हैं। वे निजी आशयों की निहायत मौलिक गूँज में घुलकर शब्दों को कविता की ज्यामिति देते हैं।...उनकी कविताओं में भाषा और विचार, शिल्प और विन्यास, निजी और सार्वभौम तथा कला एवं समाज उनकी अपनी शर्तों पर सम्भव हुए हैं। वे अपनी चेतना के उन तमाम सोपानों को कविता के आलोक वृत्त में सहजता से ला पाए हैं, जो दुर्भाग्य से आज बहुतेरी समकालीन कविता में नदारद हैं। वे जिस शब्द-अवकाश में जाकर कविता के रूप में अपनी वैचारिकता को नये आशय सुलभ करा रहे हैं, वह उतना ही मौलिक, अनूठा और विचारपगा है, जितना कि उनकी काव्य पंक्तियों में उतरा हुआ प्रकृति और जीवन के उदात्त राग का बिम्ब व रूपक। यह कहना सर्वथा मुनासिब होगा कि पीयूष दईया की यह कविताएँ स्वयं के मानुष-मर्म को सम्बोधित जीवन के उदार संगीत की मर्मदर्शी स्वरलिपियाँ हैं।



लेखक पीयूष दईया 
27 अगस्त, 1973 को बीकानेर में जन्मे पीयूष दईया समकालीन हिन्दी साहित्य व कला परिदृश्य के अग्रणी युवा नामों में से एक हैं। यह हिन्दी साहित्य, संस्कृति और विचार पर एकाग्र पत्रिकाओं ‘पुरोवाक्’ (श्रवण संस्थान, उदयपुर) और ‘बहुवचन’ (महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) के सम्पादक रहे हैं और इन्होंने लोकविद्या पर एकाग्र भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर की त्रैमासिक पत्रिका ‘रंगायन’ का भी बरसों तक सम्पादन किया है। इन्होंने लोक-अन्वीक्षा पर एकाग्र ‘लोक’ (भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर) व ‘लोक का आलोक’ (मरुधारा शोध केन्द्र, बीकानेर) तथा ललित कला अकादेमी, दिल्ली के लिए ‘कला भारती, खण्ड-1, 2’ नामक वृहद् ग्रन्थों के सम्पादन सहित हकु शाह के निबन्धों के संचयन का हिन्दी में अनुवाद व सम्पादन किया है। अनेक शोध-परियोजनाओं व सम्पादन के काम करने के अलावा इन्होंने कुछ संस्थानों में सलाहकार के रूप में भी अपनी सेवाएँ देते रहे हैं। चित्रकार हकु शाह, अखिलेश और मनीष पुष्कले के साथ आपके पुस्तकाकार वार्तालाप प्रकाशित हैं और यूनान के आधुनिक कवि कवाफ़ी के हिन्दी काव्यानुवादों की पुस्तक ‘माशूक़’ भी।
सम्प्रति यह लोकमत समाचार, नागपुर की रचना वार्षिकी ‘दीप भव’ के प्रकल्प निदेशक हैं और रंगमंच पर एकाग्र त्रैमासिक  ‘नटरंग’ के अतिथि सम्पादक भी।