Wednesday, 30 October 2013

नयी पुस्तक ‘सेप्पुकु’

आधुनिक कला के उजाले और अँधेरे की अजीब दास्तान 


विनोद भारद्वाज
विनोद भारद्वाज से वाणी प्रकाशन समाचार की बातचीत


आपने अपने उपन्यास का नाम ‘सेप्पुकु’ क्यों रखा? कोई विशेष कारण?

दरअसल यह उपन्यास मैंने कुछ साल पहले लिखना शुरू किया था। मेरे मित्र और प्रसिद्ध आधुनिक कलाकार मनजीत बावा जब ‘कोमा’ में थे, तो एक अखबार के रंगीन पृष्ठों में उनकी एक पार्टी की तस्वीर देखकर मुझे धक्का लगा। गायतोंडे सरीखा महान कलाकार दिल्ली में चल बसा पर अखबारों को जैसे कोई खबर नहीं थी। मनजीत बावा का ‘कोमा’ में पड़े रहना (वह लम्बे समय तक ‘कोमा’ में रहे) अखबारों के लिए कोई खबर नहीं थी। आधुनिक कला की दुनिया को मैंने दिल्ली में 1974 से बहुत करीब से देखा, जाना और जाँचा है। 2002 के बाद इस दुनिया में एक अश्लील अमीरी ने कला का ‘अंडरग्राउंड’ बना दिया था। 2008 में कला बाजार को धक्का लगा, उसकी पोल भी खुलने लगी। मनजीत जब ‘कोमा’ में थे, तो मैंने ‘कोमा’ में चले गये एक अत्यन्त सफल कलाकार की कहानी के बहाने आधुनिक कला के उजाले और अँधेरे को समझने की कोशिश की। तीन अध्याय लिखे और वे फाइलों में पड़े रहे। मनजीत का निधन हुए भी अब काफी समय हो चुका है।

मेरे मित्र उदय प्रकाश के कहानी संग्रह ‘तिरिछ’ के आवरण पर मनजीत बावा की अद्भुत ड्राइंग छपी थी। पर मैं मनजीत की कहानी नहीं कहना चाहता था। इस साल मैंने संकल्प किया कि अपने जन्मदिन (7 अक्टूबर) तक अपना उपन्यास पूरा करूँगा। फिल्म और रंगमंच समीक्षक अजित राय को जानकारी थी कि मैं ऐसा एक उपन्यास लिख रहा हूँ। दूरदर्शन की पत्रिका ‘दृश्यान्तर’ के प्रवेशांक के लिए उन्होंने उपन्यास अंश के लिए दर्जनों बार याद दिलाया। शुरू में मैंने उपन्यास का कोई नाम नहीं रखा था। लिखने के दौरान एक दिन मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया में ‘कार्पोरेट सेप्पुकु’ शीर्षक को देखा। हॉलीवुड की एक लोकप्रिय फिल्म ‘वोल्वेराइन’ भी उन्हीं दिनों रिलीज हुई थी जिसकी शुरुआत में नागासाकी (जापान) पर आणविक बम गिराये जाने से पहले जापानी सैनिकों को ‘सेप्पुकु’ (पेट काटना) करते हुए दिखाया गया है। पर्यायवाची हाराकिरि शब्द हिन्दी में अधिक जाना जाता है। पर मुझे सेप्पुकु की ध्वनि अच्छी और ताकतवर नजर आयी। कला की दुनिया का ‘सेप्पुकु’ धीरे-धीरे मेरे भीतर के तहखाने में रच-बस गया। शुरू में मैंने नाम रखा था ‘कला सेप्पुकु’ पर मेरे पुराने मित्र मंगलेश डबराल ने कहा, ‘सेप्पुकु’ ही रखिए। मुझे यह सुझाव पसन्द आया।


हिन्दी में लिखे जा रहे उपन्यास के साथ-साथ अंग्रेजी अनुवाद का फैसला आपने क्यों लिया?

बहरीन में रह रहे मेरे मित्रा ब्रज शर्मा ने टाइम्स में मेरे साथ ही नौकरी शुरू की थी। वह पत्रकार ही नहीं, बड़े परिश्रमी स्कॉलर भी हैं। मेरी कविताओं का उन्होंने बरसों पहले अंग्रेजी में अनुवाद करके इंडियन एक्सप्रेस (अहमदाबाद) में छापा था। तब वह वहाँ असिस्टेंट एडिटर थे। जब उन्हें पता चला कि मैं कला की दुनिया पर एक उपन्यास लिख रहा हूँ, तो उन्होंने स्वयं ही कहा, मैं इसका अंग्रेजी में अनुवाद करूँगा। आखिर कला की दुनिया में तथाकथित ‘देवभाषा’ अंग्रेजी का बोलबाला है। मुझे लगा कि इस दुनिया तक भी ‘सेप्पुकु’ की खबर पहुँचनी चाहिए।

उपन्यास में सेक्स के प्रसंगों का एक खास तरह का इस्तेमाल है।
एक प्रसंग में डॉक्टर से नायक पूछता है कि मुझे अस्पताल से निकलने के बाद सेक्स की इजाजत है? तो डॉक्टर हँस कर कहती है ताल्सतॉय सेक्स के बिना लिख नहीं पाते थे, पिकासो पेंट नहीं कर पाते थे। मैं आपको कैसे रोकूँ? पर मैंने उपन्यास में सेक्स का इस्तेमाल संकेतों में किया है, उसके विवरण नहीं हैं। मिसाल के लिए उपन्यास में चार-पाँच प्रसंगों में ‘कनिलिंगस’ (पुरुष द्वारा मुखमैथुन) का जिक्र किया है। मर्दवादी सोच ‘कनिलिंगस’ से बिदकता है। ‘द वैजाइना मोनोलॉग्स’ सरीखे नाटकों के समय में कनिलिंगस को मैंने एक सम्पूर्ण कला और एक तीखा बयान दोनों रूपों में देखा है।


अगली योजना?

एक उपन्यास और लिखने का इरादा है। पचास साल का अधेड़ नायक 33 साल की तीन स्त्रियों की लगभग मनोरोगी ईर्ष्या की भूलभुलैया में फँसा हुआ है। मुझे लघु उपन्यास का ‘फॉर्मेट’ पसन्द है। ग्यारह अध्यायों में ‘सेप्पुकु’ की कहानी लम्बी और जटिल है पर उपन्यास बहुत लम्बा नहीं है।






Monday, 28 October 2013

‘विधाओं का विन्यास’ की समीक्षा।

हंसपत्रिका के नवंबर 2013 अंक में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध आलोचक अनंत विजय की नयी पुस्तक विधाओं का विन्यासकी समीक्षा।









तद्भव पत्रिका के नये अंक में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध आलोचक अनंत विजय की नयी पुस्तक विधाओं का विन्यास की समीक्षा। 







पाखी  पत्रिका के दिसम्बर 2013 के अंक में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध आलोचक अनंत विजय की नयी पुस्तक विधाओं का विन्यास की समीक्षा। 




नया ज्ञानोदय पत्रिका के मार्च 2014 के अंक में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रसिद्ध आलोचक अनंत विजय की पुस्तक 'विधाओं का विन्यास' की समीक्षा। 



Saturday, 19 October 2013

भारतीय उपमहाद्वीप की त्रासदी : सत्ता, साम्प्रदायिकता और विभाजन

Book : BHARATIYA UPMAHADWEEP KI TRASADI : SATTA SAMPRADAYIKTA AUR VIBHAJAN
Author : Dr.Razi Ahmad
Publisher : Vani Prakashan
Price : Rs.500(HB)
ISBN : 978-93-5072-590-0/Hard Bound
Total Pages : 256
Size (Inches) : 5.50X8.50
Category : Social studies

किताब के संदर्भ में...
1857 के विद्रोह को सख़्ती से कुचल देने के बाद अंग्रेज़ों ने फ़ोर्टविलियम कॉलेज की सोची-समझी मेकाले-रणनीति के तहत बौद्धिक अस्त्र को अपनाया और यहाँ के लोगों की मानसिकता को बदलने के बहुआयामी अभियान चलाये और कुछ दिनों बाद ही वह अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हुए। फ़ोर्टविलियम स्कूल के शिक्षित, दीक्षित और प्रोत्साहन प्राप्त लेखकों और इतिहासकारों ने अंग्रेज़ों की नपी-तुली नीतियों के तहत ऐसे काल्पनिक तथ्यों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित-प्रचारित किया  - जो ज़्यादातर तथ्यहीन थे। समय बीतने के साथ जो मानसिकता विकसित हुई, उस माहौल में व्हाइट मेन्स बर्डन की साज़िशी नीति सफ़ल हो गयी। उन लेखकों और इतिहासकारों ने जो भ्रमित करते तथ्य परोसेउनको सही मान लेने की वजह से हिंदुस्तानियों की दो महत्त्व्पूर्ण इकाइयों के बीच कटुता की खाई बढ़ती गयी। हिंदुस्तान पर क़बीलाई हमलों का सिलसिला बहुत लंबा रहा है। उसी क्रम में मुसलमानों के हमले भी हुए। उनकी कुछ ज़्यादतियाँ भी अवश्य रही होंगी, क्योंकि विश्व इतिहास का मध्यकालीन युग उसके लिए विख्यात है। उन हमलों की दास्तानों को प्राथमिकता देते हुए बुरी नीयत से खूब मिर्च-मसाला लगाकर पेश किया गया, जिसका नतीजा इस महाद्वीप के लिए अच्छा सिद्ध नहीं हुआ।


किताब का अनुक्रम...
यह किताब क्यों?
हमें भी कुछ कहना है...!
हिन्दू और मुसलमान : रिश्तों के तानेबाने...
जीने की जद्दोजेहद : मुनासिब रस्तों की तलाश
हिन्दुओं के बीच समाज सुधारकों की पहल
साम्राज्यवाद का चक्रव्यूह : उलझनों का दौर
नए मुल्क, नई फ़िज़ाएँ
इतिहास का सच... समरथ को नहि दोस गोसाईं!
इतिहास से हमने कुछ नहीं सीखा...
दो पाटों के बीच...
संदर्भ सूची
अनुक्रमणिका


लेखक के संदर्भ में...
बिहार के वर्तमान बेगूसराय ज़िला के नूरपूर गाँव के एक मध्यवर्गीय शिक्षित परिवार में पले-बढ़े डॉ॰ रज़ी अहमद ने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में एम॰ए॰ किया, फिर वहीं से पीएच॰डी॰ की उपाधि प्राप्त की। एम॰ए॰ करने के बाद 1960 से ही वह रचनात्मक क्षेत्र में सक्रिय होकर तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री डॉ॰ श्रीकृष्ण सिंह की अध्यक्षता में बिहार में गाँधी संग्रहालय निर्माण के लिए 1958 में बनी समिति की योजनाओं से सम्बद्ध रहे। बारह वर्षों (1980-1992) तक यह राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय, नयी दिल्ली के मंत्री भी ह चुके हैं। पाँच वर्षों तक एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया चैप्टर, नयी दिल्ली, के सिक्रेटरी जेनरल भी रह चुके हैं। आपने 1978 में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य की हैसियत से यू॰एन॰ओ॰ में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया है। केन्द्रीय गाँधी स्मारक निधि, नयी दिल्ली, राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय समिति, नयी दिल्ली, रजेन्द्र भवन ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिहार विरासत विकास न्यास, बिहार सरकार, सहित अनेक  शैक्षणिक, रचनात्मक और मानवाधिकार के लिए संघर्षशील संस्थाओं की कार्य समिति और ट्रस्ट से सम्बद्ध हैं। पटना विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक और सामाजिक संस्थानों ने इनके सराहनीय कार्यों के लिए इन्हें सम्मानित किया है।

डॉ अहमद की अनेक छोटी पुस्तिकाओं के अतिरिक्त कई महत्त्व्पूर्ण पुस्तकें उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनमें सदाकत आश्रम’, साम्प्रदायिकता एक चुनौती’, गाँधी और मुसलमान’, जयप्रकाश नारायण’, आज़ादी के पचास वर्ष : क्या खोया क्या पाया’, गाँधी अमांग दी पीज़ेटस ने स्कोलर्स को आकर्षित किया है। देश और विदेशों में मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय समस्याओं तथा इस्लाम और विश्व्बंधुत्व जैसे विषयों पर आयोजित विचार गोष्ठियों में आप सम्मिलित होते रहे हैं। 

Thursday, 17 October 2013

अलकटराज़ देखा?



Book : ALAKATRAZ DEKHA?
Author : Chandrakanta
Publisher : Vani Prakashan
Price : Rs.250(HB)
ISBN :978-93-5072-430-9
Total Pages : 124
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category : Collection of Stories

पुस्तक के संदर्भ में...

चन्द्रकान्ता लेखन को मात्र भाषा विलास मानकर इनसानी जीवन की शर्त मानती हैं। अपने अनुभव वृत में आये समय सत्य के कुछ विशेष प्रसंगों और विचलित करने वाले स्थिति खण्डों को रचनात्मक विवेक और संवेदनात्मक घनत्व से कहानी में ढाल पाठकों से संवाद करती हैं। इस संवाद के पाश्र्व में, कुछ मूल्यगत चिन्तायें, कुछ मानवीय सरोकार, दृश्य-अदृश्य रुप में अवस्थित होते हैं। स्त्री लेखन की बनी बनाई रूढ़ियाँ ढ़ोने के बजाय उन्होंने इस वैश्विक होते समय में, व्यवस्था के दुष्चक्र में फँसे मनुष्य की त्रासद स्थितियों से जुड़ने की कोशिश की है।

अधिकांश कहानियाँ अमानवीयकरण, आतंक और मूल्यखिन्नता के उभार से जन्मी त्रासदियाँ हैं। उनकी जन्मभूमि कश्मीर की रक्तिरंजन पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियों में आतंकवाद की परिणतियाँ, भय, अविश्वास और बेघर होने की पीड़ा का करुण राग ही नहीं, (एक ही झील) दु: में हिस्सेदारी निभाती उदात्त मानवीयता भी है (रक्षक) वहाँ विस्थापन की पीड़ा है, अपने महादेश में बाहरीजन होने का कलेजा कोरता अहसास है, विगत के वैभव धूमिल होती स्मृतियाँ हैं तो ध्वस्त खँडहरों में भी जीवन की गूँज सुनने की कोशिश है। कोई भी विपत्ति जीवन से बढ़कर नहीं। आदिकाल से मनुष्य के भीतरी तहखानों में बजते जो जीवन के मद्धम सुर हैं वे निर्जन में भी उत्सव का राग रचते हैं, (निर्जन का उत्सव) लेखिका का नितान्त निजी सच, बाह्य जगत के, विशाल आनुभूतिक ज्ञान से जुड़कर जिस कथालोक की सर्जना करता है, वह उस वैयक्तिक को सार्वजनिक और सार्वभौमिक विस्तार देता है।

तेज़ी से बदलते इस अर्थकेन्द्रित समय में तकनीकी-प्रोद्यौगिकी प्रगति ने भले बाहर की दूरियाँ कम कर दीं, पर मनों की दूरियाँ बढ़ा दी हैं। भौतिक संसाधनों को पाने की दौड़ में आत्मीय रिश्ते-नाते अपनी उष्णता खोकर कैसे एक निभाव मात्र बन कर रह गये हैं इसे 'अनवांटेड विल...' कहानी में देखा जा सकता है। प्रेम जैसे अन्तरंग सम्बन्धों में जुड़ाव की जगह अब अपने-अपने अलग स्पेस ढूँढ़ने की प्रयोगात्मक होड़ मची है। (थोड़ा सा स्पेस अपने लिए) इस की एक बानगी है। स्त्री विमर्श के झंडे उठाए बिना, लेखिका स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को, सामाजिक-पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में शिद्दत से उठाती, स्वतन्त्र चेता स्त्री के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। आज की चेतना सम्पन्न स्त्री, पुरुष वर्चस्व का दम्भ और रूढ़ नैतिकता की कैद को अपनी नियति मानने से इनकार करती है। (अलकटराज़ देखा?) उम्रकैद की यातना से छुटकारा पाने के लिए वह केवल आवाज़ उठाती है, बल्कि उससे मुक्त होने के लिए छोटे-बड़े संघर्षों के बीच गुज़रती अपनी आकांक्षा और स्वप्नों को पूरा करने के लिए भी सन्नद्ध है। इसे 'अलकटराज़ देखा?', 'पिंजरे में हवा', पीर पर्वत', 'गुम चोट' और 'गुच्छा भर काले केश' कहानियों में महसूस किया जा सकता है।

भ्रष्ट व्यवस्था के संजाल बीच, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का मोहभंग, वृद्धावस्था में अकेले पड़ने की यातना, आदि, युगीन यथार्थ के विद्रूपों को कहानियों में इस प्रकार गूँथा गया है कि कहानियाँ प्रश्नाकूल भी करती हैं और संवेदना का उत्खनन भी।

मनुष्य के संवेदनशून्य होने से पहले, उसमें थोड़ा मनुष्य बचा रहे, इसी उम्मीद का रचनात्मक प्रयास हैं यह कहानियाँ!



पुस्तक के अनुक्रम

थोड़ा सा स्पेस अपने लिए
अलकटराज़ देखा?
पिंजरे में हवा
चलो, उड़ चलें!
आउटडेटिड विल उर्फ़ राग बेमौसम
गुच्छाभर काले केश और दो अंगुल का माथा
अगले पड़ाव तक
पीर पर्वत
गुम चोट
निर्जन में उत्सव
रक्षक
एक ही झील

लेखिका के संदर्भ में...

व्यास सम्मान, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल संस्थान से सम्मानित, जम्मू-कश्मीर कल्चरल अकादमी, हरियाणा साहित्य अकादमी, हिन्दी अकादमी, दिल्ली, हिन्दी संस्थान, लखनऊ आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत तथा सम्मानित चन्द्रकान्ता का जन्म 3 सितम्बर 1938 में कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था। इनके उपन्यास 'स्ट्रीट इन श्रीनगर' (ऐलाम गली ज़िंदा है का अंग्रेज़ी अनुवाद) को डीएससी प्राइज़ फॉर साउथ एशियन लिटरेचर 2012 के लिए शार्ट लिस्ट किया गया। जम्मू-कश्मीर दूरदर्शन द्वारा कई कहानियों का फिल्मांकन एवं आकाशवाणी दिल्ली द्वारा ''कथा सतीसर' और यहाँ वितस्ता है' उपन्यासों का तेरह भागों में रेडियो धारावाहिक प्रसारण किया गया।