Tuesday, 5 March 2013

पानी भीतर फूल



Book :  PANI BHEETAR PHOOL
Author :  EKANT SHRIVASTAVA
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 180
ISBN : 978-93-5072-409-5(HB)
Price :  `300(HB)
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2013
Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में प्रख्यात कवयित्री अनामिका के विचार...
भाव का अभाव से नाता उतना ही गहरा होता है जितना ग्रामीण शिक्षक, निताई-गुरुजी का अपनी भाविनी सखा से। जिस तर्क पर टी.एस. एलियट ने कविता को नाटकीय बाना दिया था और काव्य-नाटक लिखे थे, प्रायः उसी तर्क पर एकान्त ने कविता के कलेवर में ‘पानी भीतर फूल’ लिखा है। निताई-श्यामली का पर्यावरण-सजग प्रगाढ़ दाम्पत्य (जुगनुओं की तरह के जो) आत्मदीप्त क्षण पकड़ने की कोशिश करता है, अवचेतन के पानियों में एक सतरंगी स्वप्न, एक सतरंगी फूल पकड़ने-जैसी कोशिश है। 
‘टूट टाट घर टपकत खटियो टूट’ की स्थिति हो, ‘झोपरिया में आग’ लगने की स्थिति या भूख-अपमान-असमंजस की स्थिति-आन्ना केरिनिना के लेविन-जैसा निश्छल-सरल जीवन जिया तो जा ही सकता है, एक बछुरिया के जन्म की खुशी भी उतनी ही उत्फुल्ल कर सकती है कि लगे, जहान जीत लिया! आस-पास का साग-पात टूँगकर, अगल-बगल के पशु-पक्षियों, फूल-फलों-पानियों से भी जीवन स्निग्ध और तरल किया जा सकता है। एक ग्रामीण दम्पती की सीधी-सादी दिनचर्या, उनके रोजमर्रे की जिन्दगी का छन्द उसी तन्मयता से पकड़ा जा सकता है कि वह परीकथा दीखने लगे-यह काव्यभाषा के जादू से, उसके मांसल विनियोग से ही सम्भव है जिसके लिए कवि एकान्त श्रीवास्तव जाने-माने जाते हैं। 
छत्तीसगढ़ का यह हरा-भरा गाँव ‘हिन्द स्वराज’ के सपनों का गाँव है जहाँ आपसदारी सजग-सहज संवादों में, दोस्ताना पंचायतों में, सूफियाना मनोछन्द में अभी बची हुई है! यह दूसरी तरह का ‘आधा गाँव’ है, या कहिए ‘आधा बनारस’-‘आधा जल में, आधा दूब में,’ ‘आधा है, आधा नहीं है,’ और इस अधूरेपन में भी एक तरह की सम्पूर्णता, जैसे भगोली और मंगलू, रामबाई, चण्डहीन आदि के जीवन में  और एक सूफी एहसास-भवानी प्रसाद मिश्र वाला और अनुपम मिश्र वाला भी कि कहीं कोई वियुक्त नहीं है-पशु-पक्षी-पेड़ सब छोटे-बड़े मनुष्य एक बड़े सूत्र में बँधे हैं और फिर भी अपने-आप में पूर्ण-जैसे इस उपन्यास की सारी कथाएँ-लहरियाँ-
”आकाश का विस्तार आमन्त्रण है!/बाधा नहीं है!/कोई भी बड़ा-छोटा पंछी/आधा नहीं है।“
कोई इसे एक अन्तरंग यूटोपिया भी कह सकता है, और छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि इसे एक राजनीतिक पाठ भी बनाती है। निताई जो फूल अपनी पत्नी के जूड़े में खोंसना चाहता है, लोकसंवेदना के गहरे पानियों में उसकी जड़ें  हैं,  मौत से गले मिलने की सारी चुनौतियाँ हैं वहाँ, प्रेम और मृत्यु, संयोग और वियोग के तारों पर लोकजीवन का ध्रुपद बज रहा है! विनोद कुमार शुक्ल की तरह की मद्धिम लय पूरे उपन्यास पर तारी है जो शायद एकान्त-चिन्तन की अपनी स्वाभाविक लय होती है!  

एकान्त श्रीवास्तव
शरद बिल्लौरे, रामविलास शर्मा, ठाकुर प्रसाद, दुष्यन्त कुमार, केदार, नरेन्द्र देव वर्मा, सूत्र, हेमन्त स्मृति, जगत ज्योति स्मृति, वर्तमान साहित्य-मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार आदि से सम्मानित एकान्त श्रीवास्तव का जन्म 8 फरवरी, 1964, कस्बा छुरा जिला रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ। इन्होंने एम ए (हिन्दी), एम एड , पीएच डी की उपाधि प्राप्त की।
प्रकाशित कृतियाँ: अन्न हैं मेरे शब्द, मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद, बीज से फूल तक (कविता-संग्रह); नागकेसर का देश यह (लम्बी कविता); मेरे दिन मेरे वर्ष (स्मृति कथा); कविता का आत्मपक्ष (निबन्ध); शेल्टर फ्रॉम दि रेन (अंग्रेजी में अनूदित कविताएँ); बढ़ई, कुम्हार और कवि (आलोचना)। अनुवाद: कविताएँ अंग्रेजी व कुछ भारतीय भाषाओं में अनूदित; लोर्का, नाज़िम हिकमत और कुछ दक्षिण अफ्रीकी कवियों की कविताओं का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद।
सम्पादन: नवम्बर 2006 से दिसम्बर 2008 तक तथा जनवरी 2011 से पुनः वागर्थ का सम्पादन।