Tuesday, 19 March 2013

आधुनिक कहानी : स्लोवाकिया



वाणी प्रकाशन दो देशों के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक सम्बन्ध सुदृढ़ बनाने की दिशा में प्रतिबद्ध है। आधुनिक कहानी श्रृंखला के अन्तर्गत 'आधुनिक कहानी : आस्ट्रिया,आधुनिक कहानी:स्विट्ज़रलैंड',अफगानिस्तान-ईरान, चीन, रूस, अरबिस्तान, जर्मनी, इसी श्रृंखला की कड़ी में आपके समक्ष 'आधुनिक कहानी : स्लोवाकिया' प्रस्तुत है।

Book :  Aadhunik Kahani : Slovakia /slˈvɑːkiə
Editor:  Amrit Mehta
Translator: Sharada Yadav
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 104
ISBN : 978-93-5000-834-8
Price :  `250(HB)
Size (Inches) : 5.25x8.75
First Edition : 2013
Category  : Collection of Short Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में...
स्लोवाक देश की पहचान विकसित होने की प्रक्रिया के दौरान वह एक ऐसे दौर से गुजरा था, जब एक अखिल-स्लावी पहचान एक बृहत् स्लावी जगत का आलम्ब थी। इसी तरह की एक मसीही मानसिकता पॉलिश तथा रूसी संस्कृति और साहित्य में पहले ही प्रचलित थी, जिसमें स्लोवाकिया का अखिल-स्लाववाद राष्ट्रीय घटकों को अधिक महत्त्व नहीं देता था और एक स्लावी संस्कृति के संश्लेषण में उसकी ज्यादा दिलचस्पी थी। गत शताब्दी का मोड़ स्लोवाक साहित्य के इतिहास के युग के लिए भी एक नया मोड़ लेकर आया है। जब जीवन पर एक नयी सोच और एक नयी काव्यात्मक भाषा उभर कर सामने आयी प्रतीकात्मकता कविता में एक मूल तत्त्व बन कर उभरी। आधुनिक युग की स्लोवाक कविता ईवान क्रासको, लुडमिला ग्रोएब्लेवा तथा यांको येनेस्की के यथार्थवादी गद्य से एकदम भिन्न है। दो विश्वयुद्धों के मध्य सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण लेखकों में लादिस्लाव नोवोमेस्की का नाम उल्लेखनीय है, जिनकी कविता पर चेक काव्यशास्त्र का प्रभाव था। नब्बे के दशक में नाटक ने तीस के दशक उस प्रगतिवादी साहित्य से पुनः अपनी कड़ी जोड़ी , जो शीतऋतु की निद्रा में कहीं खो गयी थी।
पचास के दशक में साहित्य और राजनीति में एक आवेशग्रस्त सम्बन्ध रहा था और अधिनायकवाद में ढिलाई आने पर कुछ ऐसा लेखन सामने आया जिसमें तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया था। इस अवधि के दौरान स्लोवाक राष्ट्रवादी आन्दोलन इस क्रान्ति का निश्चयवाचक बिन्दु बन गया था।
साठ का दशक स्लोवाक साहित्य के इतिहास में सबसे अधिक उर्वर और कलात्मकता के स्तर पर सबसे ज्यादा बेशकीमती समझा जाता है, हाँलाकि कुछ लेखक अपनी तब लिखी रचनाओं को 1989 में जा कर प्रकाशित करवा सके थे। साठ का दशक पचास के दशक के योजनाबद्ध साहित्य से विदा लेने का था जो समाजवादी यथार्थवाद का क्लासिकल दौर था। साठ के दशक में अनेकों लेखक उभरे, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण रुडोल्फ यासिक हैं जिनकी पुस्तक ‘होली एलिजाबेथ प्लेस’ 50 के दशक के अन्तिम वर्षों में प्रकाशित हुर्ह थी और व्लादिमीर मीनाक जिनकी त्रयी ‘जेनेरेशन’ महत्त्वपूर्ण है। 


पुस्तक के अनुक्रम...
टीला
गुलाबी लड़की ग्रेत्क 
अजनबी लड़की
बाख़ के साथ कॉफी, शोपिन के साथ चाय
पेशेवर मध्य-यूरोपीय
चौथा दिन
बच्चा
पैसे
गर्मी
दो भाई
घाट
आस्ट्रेलिया में अवतरण
काया-पलट
डॉन जोविन्नी की याद में
नदी के द्वीप पर 
बूढ़ा जमादार
वायु
शताब्दी की सबसे सुन्दर तस्वीर
पृथ्वी गोल है
विश्वास
बिल्ली का बच्चा


सम्पादक : अमृत मेहता
जन्म: 1946 ई., मुलतान में। हिन्दी, जर्मन, अंग्रेजी, पंजाबी तथा इतालवी भाषाओं का ज्ञान। जर्मन साहित्य में डॉक्टर की उपाधि। जर्मन विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में तथा अनुवाद विज्ञान विभाग, केन्द्रीय अंग्रेजी  एवं विदेशी भाषा संस्थान, हैदराबाद में अध्यक्ष के पद पर कार्यरत रहे। विदेशी भाषा साहित्य की त्रैमासिक  पत्रिका ‘सार संसार’ के मुख्य सम्पादक। जर्मन साहित्य का अनुवाद। 60 अनूदित पुस्तकें, दो पुस्तकें अनुवाद विज्ञान पर और दो पुस्तकें मूल जर्मन में। निजी साहित्य का स्लोवाक तथा हिन्दी में अनुवाद।

अनुवादक : शारदा यादव
एम.ए.: विश्व इतिहास में, चार्ल्स यूनिवर्सिटी, प्राग से (चेकोस्लाविया) 1981 में।
डॉक्टर की उपाधि: चेक एवं स्लोवाक साहित्य में, चार्ल्स यूनिवर्सिटी, प्राग से 1991 में स्लोवाक भाषा में। स्लोवाक भाषा में ग्रीष्म स्कूल, स्तूदिया अकादेमिका स्लोवाका, ब्राटिस्लावा में, 1997 से 2001 तक। प्रसिद्ध स्लोवाक लेखकों -योजेफ सिगार ह्नोंसकी, मारिया युरिच्किओवा, पीटर कारवास, दानिएल हाविएर, याना बोदनारोवा, मिलान रुफुस आदि - के गद्य तथा पद्य का हिन्दी में अनुवाद। चेक से परीकथाओं के अनुवाद की एक पुस्तक।
चेक तथा स्लोवाक साहित्य का सार संसार, कादम्बिनी, नन्दन इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशन


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Tuesday, 12 March 2013

मैं, स्टीव मेरा जीवन मेरी जुबानी



Book :  I, STEVE : STEVE JOBS IN HIS OWN WORDS 
Author : Steve Jobs 
Editor:  GEORGE BEAHM
Translator: Neeru
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 188
ISBN : 978-93-5072-238-1
Price :  `150(PB)
Size (Inches) : 5.25x8
First Edition : 2013
Category  : Autobiography/Management

पुस्तक के सन्दर्भ में 
लोग कहते हैं कि आप जो कर रहे हैं, उसके प्रति आपके मन में अत्यधिक उत्साह होना चाहिए और यह पूर्ण रूप से सत्य है। और इसका कारण है कि यह इतना कठिन है कि यदि आप में उमंग नहीं तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इसे छोड़ देगा। यह वास्तव में बहुत कठिन है और आपको इसे लम्बे समय तक करना है। अतः यदि आप इसे पसन्द नहीं करते, आप इसे करते हुए आनन्दित नहीं होते तो आप इसे वास्तव में पसन्द नहीं करते और आप इसे छोड़ देंगे। और बहुत से लोगों के साथ वास्तव में यही होता है। आप यदि उन लोगों की ओर देखें जो समाज की दृष्टि में ‘सफल’ हैं और जो सफल नहीं हैं, तो आप प्रायः पाएँगे कि वही लोग सफल हैं, जिन्हें, उन्होंने जो किया, वह पसन्द था, अतः वे अत्यधिक कठिन समय में भी स्वयं को स्थिर रख सके। और जो इसे पसन्द नहीं करते थे, वे छोड़ गये क्योंकि वे समझदार हैं, ठीक है न? कौन उस कार्य को सहन करेगा, जिसे वह पसन्द नहीं करता। अतः इसके लिए अत्यधिक कठोर परिश्रम की, निरन्तर उसके विषय में सोचते रहने, चिन्तित रहने की आवश्यकता है और यदि आप अपने द्वारा किए जा रहे कार्य को पसन्द नहीं करते तो आप असफल हो जाएँगे।


स्टीव जॉब्स 
एप्पल इंक के सह-संस्थापक एवं लम्बे समय तक सीईओ रहे स्टीव जॉब्स का 5 अक्तूबर, 2011 को देहान्त हो गया था और उनके साथ ही इतिहास के एक महानतम एवं सर्वाधिक रूपान्तरकारी व्यावसायिक कैरियर का अन्त हो गया। इन वर्षों के दौरान जॉब्स ने मीडिया को अनगिनत साक्षात्कार दिये, जिनमें उन्होंने ‘द विज़न थिंग’, जिसकी वे सदा बात करते थे, को स्पष्ट किया। ‘द विज़न  थिंग’ उनकी अतुलनीय दूरदर्शिता एवं बाज़ार में सफलतापूर्वक ऐसे उत्पाद लाने की उनकी योग्यता थी जिनकी ओर लोग बस खिंचे चले आते थे।
तीन दशकों तक प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं ऑन-लाइन प्रसार माध्यमों में उनकी कवरेज पर तैयार की गयी यह पुस्तक स्टीव जॉब्स द्वारा व्यक्त किये गये श्रेष्ठ विचारों एवं सर्वाधिक झकझोरने वाले उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करती है। इसमें दी जा रही जॉब्स की दो सौ से अधिक उक्तियाँ उस महान व्यक्तित्व से अभिनव प्रेरणा प्राप्त करने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्यतः पठनीय हैं। 

Friday, 8 March 2013

सिर्फ़ कागज़ पर नहीं



Book :  SIRF KAGAZ PAR NAHIN
Author :  RANJANA JAISWAL
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 176
ISBN : 978-93-5072-208-4(HB)
Price :  `295(HB)
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2012
Category  : Poetry/Feminism

पुस्तक के सन्दर्भ में...
समकालीन हिन्दी कविता में रंजना जायसवाल का नाम जाना-पहचाना है। इस पाँचवें संग्रह में वह युवा रचनाधर्मिता का प्रतिनिधि स्वर बन कर सामने आयी हैं। भाषा-संयम और परिष्कृत रचाव में स्त्री मन के संशय, दुख, पीड़ा और प्रेम की गहनतर अनुभूति के साथ ही समय और समाज की खुरदरी सच्चाइयों के गहरे निशान इन कविताओं में हैं। यह काव्य-लोक उस औसत हिन्दुस्तानी स्त्री का है जो निराला के शब्दों में ‘मार खा रोई नहीं’। दर्द से आक्रोश और फिर प्रतिकार की इस तकलीफदेह यात्रा के निशान इन कविताओं में जगह-जगह हैं। ये कविताएँ सवाल की कविताएँ हैं। ज़ाहिर है जिनके जवाब नहीं हैं। कविता के पास-पड़ोस में नाते-रिश्तेदार हैं, गाँव-कस्बा है, रीति-रिवाज हैं, इन सबके बीच जीवन के घात-प्रतिघात हैं, आकांक्षाएँ और यातनाएँ हैं। गरज कि धड़कता धधकता जीवन है। ये कविताएँ समय में गहरे धँस कर लिखी गयी हैं और साफगोई से अपना पक्ष रखती हैं, समाज की विडम्बना और विद्रूपता पर इनका स्वर तल्ख है।
इन कविताओं का रचाव सहज है और इनसे लोक गीतों जैसा प्रभाव पैदा होता है। रोजमर्रे के दृश्य कविता में आते ही गहरे संकेत करने लगते हैं। कवयित्री ने सायास प्रभाव पैदा करने की प्रवृत्ति से बचते हुए कविता की स्वाभाविकता की रक्षा की है जिससे अनुभूति की प्रामाणिकता स्थापित हुई है। 
एक स्त्री के स्वप्न, संसार और यातना से गुजरते हुए आप अपने को बदला हुआ पाते हैं। ये कविताएँ मनुष्यता और प्रकृति की रक्षा साथ-साथ करती हैं।

रंजना जायसवाल 
रंजना जायसवाल, एम.ए., पीएच.डी. (हिन्दी), जन्म-स्थान पड़रौना (उत्तर प्रदेश) वर्तमान में एक मिशनरी कॉलेज में शिक्षिका हैं । वैसे तो लेखन की शुरुआत बचपन में ही हो गयी थी, यदा-कदा छपती भी रहती थी, पर 1997 से ज्यादा सक्रिय हैं । अब तक इनकी निम्न पुस्तकें प्रकाशित हैं-मछलियाँ देखती हैं सपने, दुःख पतंग, जिन्दगी के कागज़ पर, माया नहीं मनुष्य, जब मैं स्त्री हूँ (काव्य संग्रह), तुम्हें कुछ कहना है भर्तृहरि (कहानी संग्रह), स्त्री और सेंसेक्स (लेख संग्रह)।

'प्रतिमान' समय समाज संस्कृति (अर्धवार्षिक पत्रिका)

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विकासशील समाज अध्ययन पीठ (CSDS) की पत्रिका 'प्रतिमान' समय समाज संस्कृति 
समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित अर्धवार्षिक पत्रिका का प्रवेशांक : जनवरी -जून, 2013 ( वर्ष 1 ,  खंड 1, अंक 1) आपके समक्ष प्रस्तुत है ।


सम्पादकीय :
क्या हमारे मगध की मौलिकता में कुछ कमी है?
बारह साल पहले विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के भारतीय भाषा कार्यक्रम ने हिंदी में व्यवस्थित अनुसंधानपरक चिंतन और लेखन को बढ़ावा देने की कोशिशें शुरू की थीं। अब यह उद्यम अपने दूसरे चरण में पहुँच गया है। पहला दौर मुख्यत: अंग्रेज़ी में और यदा-कदा अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी गयी बेहतरीन रचनाओं को अनुवाद और सम्पादन के ज़रिये हिंदी में लाने का था। इसमें मिली अपेक्षाकृत सफलता के बाद अंग्रेज़ी से अनुवाद और सम्पादन पर ज़ोर कायम रखते हुए भारतीय भाषाओं में भी समाज-चिंतन करने की दिशा में बढ़ने की ज़रूरत महसूस हो रही थी। लेकिन इस पहल़कदमी के साथ व्यावहारिक और ज्ञानमीमांसक धरातल पर एक रचनात्मक मुठभेड़ की पूर्व-शर्त जुड़ी हुई थी। समाज-विज्ञान और मानविकी की अर्धवार्षिक पूर्व-समीक्षित पत्रिका प्रतिमान समय समाज संस्कृति का प्रकाशन एक ऐसे मंच की तरह है जो इस शर्त की पूर्ति कर सकता है। पिछले कुछ वर्षों में अध्ययन-पीठ में अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी लेखन करने वाले विद्वानों की संख्या बढ़ी है। साथ ही भारतीय भाषा कार्यक्रम के इर्द-गिर्द कुछ युवा और सम्भावनापूर्ण अनुसंधानकर्त्ता भी जमा हुए हैं। प्रतिमान का म़कसद इस जमात की ज़रूरतें पूरी करते हुए हिंदी की विशाल मु़फस्सिल दुनिया में फैले हुए अनगिनत शोधकर्त्ताओं तक पहुँचना है। समाज-चिंतन की दुनिया में चलने वाली सैद्धांतिक बहसों और समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श का केंद्र बनने के अलावा यह मंच अन्य भारतीय भाषाओं की बौद्धिकता के साथ जुड़ने के हर मौ़के का लाभ उठाने की फ़िरा़क में भी रहेगा।  
हमें यकीन है कि हिंदी के मगध में मौलिकता की कमी नहीं है। यहाँ गम्भीरता की विपुलता है, रचनात्मकता की बेचैनियाँ हैं और विचार की ग्लोबल साहित्येतर दुनिया में जा कर अंतर्दृष्टियाँ टटोलने की इच्छा भी है। लेकिन साथ में एक प्रश्न भी जुड़ा है कि आखिर इस मौलिकता की प्रकृति क्या है? लगता है कि यह मौलिकता कहीं न कहीं अपने-आप में डूबी हुई एक क़िस्म की स्वयंभू ख़्यालगोई में फँसी हुई है। रचनाकारों के पास अपनी दावेदारियों के लिए बौद्धिक प्रमाण जुटाने और एक सीमा तक निरपेक्ष तार्किकता के आधार पर एक पूरे विमर्श का शीराज़ा खड़ा करने का उद्यम और कौशल नहीं है। इसका ताज़ा सबूत हमें पिछले पच्चीस-तीस साल में हिंदी की अव्यावसायिक पत्रिकाओं (जिन्हें लघु-पत्रिका भी कहा जाता है) में प्रकाशित अकूत और नानाविध सामग्री के रूप में मिलता है। यह सामग्री मौलिकता और अनुवाद का मणि-कांचन संयोग दिखाती है। कभी ये पत्रिकाएँ केवल साहित्यिक हुआ करती थीं, लेकिन अब उत्तरोत्तर वैचारिक लेखन से भरते जा रहे पृष्ठों के कारण इनका चरित्र बदलता जा रहा है। ये हिंदी के लाखों-लाख पाठकों को वह बौद्धिक खुराक देती हैं जो केवल रचनात्मक साहित्य से नहीं मिल सकती। हिंदी में पैदा हो रहा यह ज्ञान आमतौर पर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की अंग्रेज़ी में सिमटी हुई दुनिया की निगाहों से ओझल रहा है। लेकिन हमारा आकलन है कि अभिव्यक्ति और संरचना के लिहाज़ से शोध की स्थापित प्रविधियों से अपरिचित होने के बावजूद इस अदृश्य ज्ञान के भीतर समाज-चिंतन के व्यवस्थित उद्यम की आहटें हैं। भारतीय भाषा कार्यक्रम प्रतिमान के ज़रिये इन्हीं पहलुओं को एक सुचिंतित रचना-प्रवाह में विकसित करने के लिए हिंदी की मौलिकता में व्यवस्थित अनुसंधानपरकता के मूल्यों का समावेश करने की कोशिश करेगा।  

      पत्रिका के नाम से यह अंदेशा पैदा हो सकता है कि कहीं हम समय, समाज और संस्कृति के बने-बनाये प्रतिमान तो नहीं परोसना चाहते हैं? या हम कोई नया प्रतिमान गढ़ कर हिंदी के बहुकेंद्रीय संसार को उसकी श्रृंखलाओं में बाँधने के फेर में तो नहीं हैं? दरअसल विचारों के जगत में प्रतिमानों की इस विवादास्पद भूमिका के उलट हमारी दिलचस्पी हर धरातल पर प्रतिमानों और उनकी सम्भावनाओं के बीच होने वाले उस परस्पर अनुवाद में है जिसकी तरफ थॉमस कुन ने भी एक इशारा किया था। फिर चाहे वह विचार का प्रश्न हो, अनुसंधानपरकता का सवाल हो या उसकी पद्धतिमूलकता का हो। हिंदी के वैचारिक संसार में हस्तक्षेप करने के साथ-साथ हमारा एक प्रमुख सरोकार समाज-विज्ञान (राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि) और मानविकी (दर्शनशास्त्र, इतिहास, साहित्य और साहित्यालोचना) के अनुसंधानपरक और पद्धतिमूलक प्रतिमानों का अंतर्गुम्फन भी है। इसमें कई स्थापित प्रतिमानों को अस्थिर करने की दूरस्थ सम्भावना है। अगर यह कोशिश हम लम्बे अरसे तक चला पाये तो धीरे-धीरे प्रत्यक्षवाद (पॉज़िटिविज़म) द्वारा उठायी गयी उस दीवार के दरकने की एक उम्मीद है जिसने सोच-विचार की दुनिया को संस्थागत पैमाने पर बाँट रखा है। इस लिहाज़ से इस पत्रिका के साथ समाज-विज्ञान और मानविकी के बँटवारे से परे जा कर समाज-चिंतन के समग्र और एकीकृत दायरे की नुमाइंदगी करने वाले भविष्य की कल्पना के सूत्र भी जुड़े हैं। चूँकि इस विभाजन की व्यावहारिक और संस्थागत जड़ें बहुत गहरी हैं, इसलिए इस पुराने कमरे से बाहर निकलने के लिए हमें अभी बहुत से कदम इस कमरे के भीतर ही रखने पड़ेंगे।
बहु-अनुशासनीयता के उदय ने व्यवस्थित चिंतन के ऊपर प्रत्यक्षवाद की जकड़बंदी एक बड़ी हद तक ढीली की है। ज्ञान-रचना के परस्पर-व्यापी उपक्रमों की चमकदार सफलताओं के प्रभाव में आज प्रत्यक्षवाद का बचाव करने वाली आवाज़ें त़करीबन खामोश हो चुकी हैं। स्त्री-अध्ययन, संस्कृति-अध्ययन, सेक्शुअलिटी-अध्ययन, साहित्य-अध्ययन, नागर-अध्ययन और मीडिया-अध्ययन जैसे नये क्षेत्रों की अनुशासन-बहुल ज़मीन की यह उपलब्धि उल्लेखनीय है। लेकिन अनुशासनबहुलता की यह कहानी अगर अपने-आप में का़फी होती तो समाज-विज्ञान की दुनिया ग्लोबल पैमाने पर आमतौर से और भारतीय संदर्भ में खासतौर से उस संगीन संरचनात्मक संकट का सामना न कर रही होती जिसे कई संबंधित सर्वेक्षणों और रपटों ने हाल के दिनों में उजागर किया है। आज के ज़माने का सृजनशील समाज-चिंतक प्रत्यक्षवाद की आक्रामकता के निष्प्रभावी हो जाने के बावजूद उसके अवशेषों से किस कदर उत्पीडि़त महसूस करता है, इसका प्रमाण इस अंक में छपे कई लेखों से भी मिलता है। इसी परिस्थिति के मद्देनज़र अनुशासनबहुलता में रमते हुए उससे परे जाने की हमारी इस कोशिश में कम से कम तीन लिहाज़ों से कुछ नयी बात है। पहली तो यह कि बहुअनुशासनीयता द्वारा प्रत्यक्षवाद को दी गई अप्रत्यक्ष चुनौती के बरक्स हम यह काम घोषणापूर्वक और आत्म-सचेत ढंग से करने जा रहे हैं । यह सही है कि भारतीय भाषा कार्यक्रम में सक्रिय हम सभी लोग अभी तक समाज-विज्ञान और मानविकी के विभिन्न खानों में फिट रहे हैं और निकट भविष्य में भी स्थिति ऐसी ही रहने वाली है। लेकिन खुद को समाज का वैज्ञानिक और अपने उद्यम को समाज का विज्ञान न कहने की यह छोटी सी शुरुआत इस आशा के साथ की जा रही है कि शायद इससे हमारी आत्मनिष्ठता में कुछ तब्दीली हो। आख़िर हमारी अपनी आँखों में भी तो हमारी पहचान बदलनी चाहिए। दूसरी और कहीं ज़्यादा अहम बात यह है कि हमारा यह प्रयास मुख्य रूप से हिंदी और आमतौर से भारतीय भाषाओं के धरातल पर नियोजित है। वैकल्पिक ज्ञानमीमांसा की चर्चाएँ कई बार होती रही हैं और उन्होंने ज्ञान के क्षेत्र में हलचलें भी मचायी हैं, पर उन दावेदारियों में अंग्रेज़ी के दायरे का अतिक्रमण करके भारतीय भाषाओं की ज़मीन स्पर्श करने से पहले ही ठिठक जाने की प्रवृत्ति रही है। दरअसल भारतीय भाषाएँ हमें एक ऐसा धरातल मुहैया कराती हैं जहाँ अंग्रेज़ी में ज्ञान-रचना की स्थापित और का़फी हद तक प्रत्यक्षवाद से आक्रांत शर्तों से कतराते हुए हम नई चिंतनशीलता के सूत्रों को अधिक सृजनात्मकता के साथ टटोल सकते हैं। यह काम हिंदी और भारतीय भाषाओं के धरातल पर ही अधिक स्वाभाविक और सकारात्मक ढंग से किया जा सकता है। इस दावे के पीछे कुछ ठोस कारण हैं।

 भारतीय भाषाएँ त़करीबन पिछले सौ साल से सामाजिक-राजनीतिक वैचारिक लेखन का समृद्ध संसार रच रही हैं। इस दुनिया में न तो मौलिकता के नाम पर अनुवाद-विरोधी आग्रह छाये हुए हैं, और न ही अनुवाद को सब कुछ समझ मौलिकता को गैर-ज़रूरी करार दिया गया है। इस ज़मीन का व्यवस्थित संधान कुछ नयी सम्भावनाओं से हमारा साक्षात्कार करा सकता है। अंग्रेज़ी में होने वाली ज्ञान-रचना के बरक्स ऐसे ही किसी उद्यम की संभावनाओं पर उँगली रखते हुए बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ने कहा था,  ‘नये विचार एक फैशन के तहत ग्रहण किये जा रहे हैं। उन्हें समझने और प्राप्त करने की प्रक्रिया कल्पना के धरातल पर चलती है। वे भाषा और कुछ आरोपित संस्थाओं में जड़ीभूत हैं। इस भाषा या इन संस्थाओं में बौद्धिक क़वायद करने से एक तरह के चिंतन की आदत पड़ जाती है। एक ऐसे चिंतन की जो लगता तो वास्तविक है, पर होता है आत्माहीन। ... हमारे विचारों के संकरीकरण का प्रमाण यह है कि हमारे शिक्षित लोग देशी भाषा और अंग्रेज़ी की हैरतंग़ेज़ खिचड़ी में एक-दूसरे से बात करते हैं। ख़ास तौर पर सांस्कृतिक विचारों की अभिव्यति करने के लिये हमें पूरी तरह से देशज भाषा का उपयोग करना बहुत ही मुश्किल लगता है। मसलन, अगर मुझसे आज का पूरा विमर्श बांग्ला में करने के लिए कहा जाता तो मुझे इसके लिए अच्छी ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती। ... शायद यह संक्रमण के दौर की स्थिति है। मेरी मान्यता है कि अगर हम भाषा की यह बाधा पार कर लें तो विचारों का स्वराज हासिल करने की दिशा में एक बड़ा क़दम बढ़ाया जा सकता है।’
अगर विचारों का स्वराज हासिल करना है तो ज्ञान-रचना को मुट्ठी-भर अंग्रेज़ीदाँ समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और दार्शनिकों के संकुचित दायरे से निकालना ही होगा। विचारों का स्वराज ज्ञान-रचना के लोकतंत्रीकरण की माँग करता है। अनुसंधानपरक व्यवस्थित चिंतन अपना नवीकरण इसलिए भी नहीं कर पा रहा है कि सि़र्फ अंग्रेज़ी में होने के कारण उसका नाता भारतीय भाषाओं से और इस प्रकार बृहत्तर भारतीय समाज से बहुत कमज़ोर हो चुका है। इक्का-दुक्का कुशाग्र प्रेक्षणों और सूत्रीकरणों को छोड़ कर वह ज़्यादातर पश्चिम द्वारा थमाये गये सैद्धांतिक आईनों में ही समाज को देखता रहा है। इन आईनों को बनाने में समाज की भूमिका अपवादस्वरूप ही है। भारतीय भाषाओं की ज़मीन पर ही ज्ञान-रचना के लोकतंत्रीकरण की सम्भावना अंकुरित हो सकती है।

      पत्रिका के पहले अंक का विशाल कलेवर बौद्धिक भूख के उस पहाड़ का परिचायक है जो पिछले दस साल से धीरे-धीरे विकासशील समाज अध्ययन  पीठ (सीएसडीएस) के भारतीय भाषा कार्यक्रम में और उसके इर्द-गिर्द सक्रिय विद्वानों के भीतर उगता जा रहा था। इस बीच हमने जिन पेचीदा सवालों का सामना किया, उनकी एक बानगी देखने लायक है। एक आश्चर्यजनक मासूमियत के साथ हमसे पूछा गया कि हिंदी में लिखने से   क्या होगा, क्योंकि अंग्रेज़ी में तो सारा काम चल ही रहा है। इस सवाल का जवाब अंग्रेज़ी के महानगरीय प्रभुत्व के परे मौजूद म़ुफस्सिल भारत (जहाँ का सारा बौद्धिक कार्य-व्यापार भारतीय भाषाओं में ही चलता है) की विराट ह़की़कतों की तरफ इशारा करके दिया जा सकता है। लेकिन प्रश्नों का दूसरा सिलसिला ज्ञानमीमांसा और संज्ञानात्मक उद्यम के धरातल से आया था। हमसे पूछा गया कि हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में ज्ञान-रचना से हमें किस तरह के संज्ञानात्मक लाभ की अपेक्षा है? क्या यह लाभ अंग्रेज़ी में लिखने से होने वाले लाभ से भिन्न होगा? इस लाभ को हम कैसे नापेंगे? भारतीय भाषाओं में उपलब्ध दस्तावेज़ों, ग्रंथों और अन्य सामग्री की तह में जा कर अंग्रेज़ी में ज्ञान-रचना करते रहने से हमें वह कौन सी ज्ञानमीमांसक उपलब्धि नहीं हो रही है जो हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में समाज-चिंतन अभिव्यक्त करने से होने लगेगी?
भारतीय भाषा कार्यक्रम जैसी कोशिशों में लगे सभी विद्वानों को इन सवालों पर गहराई से गौर करने की ज़रूरत है। इनके बने-बनाए जवाब मौजूद नहीं हैं। प्रतिमान के प्रकाशन की शुरुआत के इस ऐतिहासिक क्षण पर हम केवल यह कहने की स्थिति में हैं कि ज्ञान-रचना के मौजूदा मानचित्र को जिस ज्ञानमीमांसा और संज्ञानात्मकता की रेखाओं से बनाया गया है, वह पूर्व-निर्धारित अर्थों और तात्पर्यों की दिक् और काल से परे समझी जाने वाली स्याही से खींची गयी हैं। हमें तो नयी ज्ञानमीमांसा, उससे जुड़ी नयी संज्ञानात्मकता और तात्पर्यों के ऐसे नये परिक्षेत्रों का उत्पादन करना है जो भारतीय भाषाओं के सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक संसार की देन होंगे। थमायी गयी ज्ञानमीमांसा की जगह उस संज्ञानात्मकता को सम्भवत: आज के मु़काबले हम कहीं ज़्यादा अपना कह सकेंगे। शायद वह हमारा अपना प्रमाणशास्त्र होगा जिसके आधार पर हम थमाये गए तात्पर्यों की जाँच कर सकेंगे। अपनी इसी दावेदारी को और पुष्ट करने के लिए प्रतिमान के इस पहले अंक की विविध सामग्री के केंद्र में ज्ञान-रचना का प्रश्न ही रखा गया है। इसीलिए हम एक प्राश्निक की भाँति किसी दूसरे से नहीं बल्कि श्रीकांत वर्मा के लहजे में अपने-आप से पूछ रहे हैं कि आखिर हमारे मगध की मौलिकता के भीतर ऐसी क्या कमी है कि हमारी आधुनिकता के वितान में अंग्रेज़ी के बिना विमर्श और विचार कल्पनातीत हो जाता है? यह कोई नया सवाल नहीं है। इसे बीसवीं सदी के दूसरे दशक में दार्शनिक और योगी श्री अरविंद ने पूछा था। यही सवाल उसके कुछ वर्ष बाद तीसरे दशक में कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य ने उठाया था। यही सवाल ए.के. रामानुजन ने अपने विशिष्ट खिलंदड़े अंदाज़ में इस तरह पूछा था कि क्या चिंतन का कोई भारतीय तरी़का है? ये तीनों दस्तावेज़ और उनका भाष्य यहाँ पेश है; और इस विषय पर बहस आगे के अंकों में भी जारी रहेगी। जो बातें श्री अरविंद, भट्टाचार्य और रामानुजन ने पूछी थीं, उन्हीं को कुछ दूसरे शब्दों और दूसरे लहज़े में समकालीन रोशनी में प्रतिमान के इस अंक में कई लेखकों ने पूछा है। मणींद्र नाथ ठाकुर ने ज्ञान की सामाजिक उपयोगिता के संदर्भ में, सदन झा ने अनुभव और ज्ञान की मिलती-अलग होती श्रेणियों के संदर्भ में, अमितेश कुमार ने सांस्कृतिक आधुनिकता की बनती हुई भारतीय संरचनाओं की रोशनी में, हिलाल अहमद ने समकालीनता की संरचना के सिलसिले में, मैंने भारतीय नारीवाद और राष्ट्रवाद के पश्चिम से भिन्न रिश्तों एवं त्रिदीप सुहृद ने आधुनिकता और परम्परा की गोधूलि वेला के संदर्भ में यही प्रश्न पूछा है।
प्रतिमान के लिए ताज़ा राजनीतिक माहौल पर विहंगम अकादमीय नज़र डालने की जिम्मेदारी दो वरिष्ठ समाजशास्त्रियों ने निभायी है। राजनीतिक-समाजशास्त्री धीरूभाई शेठ ने एक विस्तृत साक्षात्कार में नागरिक समाज की भारतीय संकल्पना, ग़ैर-दलीय राजनीतिक प्रक्रिया, भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम और दलीय प्रणाली के गहन संकट पर कई विचारणीय बातें कही हैं। हाल ही में भ्रष्टाचार पर एक बेहतरीन पुस्तक रचने वाले योगेश अटल ने इस परिघटना के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की एक प्रस्तावना की है।
इस अंक में भारतीय पुरुषत्व के दो अलग-अलग आयामों की रूपरेखा भी देखने को मिलेगी। चारु गुप्ता ने ऐतिहासिक शोध की प्रविधियों का बेहतरीन इस्तेमाल करके औपनिवेशिक ज़माने में बनते हुए दलित-पौरुष का संधान किया है, और अनामिका ने कविता में अपनी पैठ का लाभ उठाते हुए महादेवी वर्मा के विमर्श के बहाने एक स्वतंत्रचेता स्त्री के काम्य पुरुष की सम्भावनाओं का पता लगाने की कोशिश की है। रोहिणी अग्रवाल द्वारा हिंदी के चार उपन्यासों में पारिस्थितिकीय चेतना के विमर्श के विस्तृत बानगी पेश की गयी है। इस अंक में हाशियाग्रस्तता के विभिन्न पहलुओं की मीमांसा भी है। मसलन, बद्री नारायण यहाँ हाशियाग्रस्तों के भीतर हाशियाग्रस्त जीवन गुज़ार रहे महा-दलितों तक आरक्षण के लाभ न पहुँच पाने के ऐतिहासिक कारणों की खोजबीन करते दिखेंगे; मिथिलेश झा ने राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के वर्चस्व के मु़काबले मैथिली भाषा के संघर्ष का इतिहास लिखा है; इंद्रजीत झा ने न्याय के विमर्श में उपेक्षित पड़े आदिवासियों की स्थिति पर उँगली रखी है, और कमल नयन चौबे ने आदिवासियों के अधिकारों को बचाने के लिए बने ़कानूनों की वस्तुस्थिति के अनुपलब्ध ब्योरे पेश किये हैं।
इस देश में संस्कृत सदियों तक प्रभु-भाषा रही है। आज उसकी स्थिति क्या है? क्या वह संग्रहालय की वस्तु बन कर रह गयी है? या उसकी शेष प्राणवत्ता के सूत्र समाज के साथ कहीं जुड़ते हैं? इन अहम सवालों के प्रगल्भ उत्तर राधावल्लभ त्रिपाठी ने सिमोना साहनी की महत्तवपूर्ण पुस्तक दि मॉडर्निटी ऑफ़ संस्कृत के बहाने दिये हैं। पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारतीय सामाजिक-राजनीतिक जीवन को मीडिया ने सबसे ज़्यादा बदला है। मीडिया की अपनी मंडी का तो विस्तार हो ही चुका है और उपभोग की वस्तु के रूप में वह खुद को मंडी में बेच भी रहा है। इससे पैदा होने वाली असाधारण स्थितियों का लेखा-जोखा लेने वाले विनीत कुमार की रचना मंडी में मीडिया की समीक्षा तृप्ता शर्मा ने की है। इसी अंक में आदित्य निगम ने पार्थ चटर्जी की बहुचर्चित थियरी राजनीतिक समाज की सैद्धांतिक मीमांसा की है। अंकिता पाण्डेय ने भारत में नागरिकता के विमर्श का एक ज्ञानवर्धक सर्वेक्षण किया है। विकासशील समाज अध्ययन पीठ साठ के दशक से ही चुनाव-अध्ययन में असाधारण योगदान के लिए जाना जाता है, इसलिए भारत में इस अनुशासन के विकास के इतिहास और चुनौतियों के संजय कुमार द्वारा प्रस्तुत विस्तृत त़खमीने के बिना यह अंक पूरा नहीं हो सकता था। इस अंक के पाठकों को दो लेखों में गुजराती हिंदी का स्वाद मिलेगा। हमने भरसक कोशिश की है कि किरन देसाई (गुजराती भाषा में समाज-विज्ञान) और त्रिदीप सुहृद की हिंदी से फूटने वाली गुजराती सुगंध को वैसे का वैसा ही रहने दिया जाए।
त़करीबन पाँच सौ पृष्ठ के इस अंक में अंग्रेज़ी से अनुवाद केवल तीन हैं। अंत में कन्नड़ के विख्यात नाट्यकार और हिंदी फ़िल्मों के श्रेष्ठ अभिनेता-निर्देशक गिरीश कारनाड की आत्मकथा अडाडाता आयुष्य के पहले अध्याय ‘प्राक्’ का सीधे कन्नड़ से अनुवाद करके प्रकाशित किया गया है। इस अध्याय में हमारे निकट अतीत की एक साहसी और सम्प्रभु महिला की कहानी दर्ज है जिसने अपने ज़माने में आज की नारीवादी आधुनिका जैसा आचरण करने की हिम्मत जुटाई थी।

     दस साल पहले इन्हीं दिनों एक वासंती शाम के साये में प्रो़फेसर पार्थ चटर्जी ने अध्ययन पीठ के हरे-भरे लॉन में भारतीय भाषा कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए हमसे समाज-चिंतन की द्विभाषी दुनिया रचने की अपील की थी। आज अपनी इस संस्था के स्वर्ण जयंती समारोहों के बीच समाज-चिंतन की पूर्व-समीक्षित पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही हम एक ऐसे मु़काम पर पहुँच गये हैं जिस पर खड़े होकर कहा जा सकता है कि हमारे पास दिखाने के लिए कुछ मामूली-सी उपलब्धियाँ हैं, और अमल करने के लिए एक लम्बा और श्रमसाध्य कार्यक्रम है। गहरे और अथाह समुद्र में प्रकाश स्तम्भ की नन्हीं रोशनी कहीं बहुत दूर टिमटिमा रही है। योगी श्री अरविंद की अपेक्षाओं को हमें हमेशा याद रखना होगा कि हम हर विषय पर स्वतंत्रत और सार्थकता के साथ चिंतन करना सीखेंगे। सि़र्फ सतह पर रुक जाने के बजाय तह तक जाएँगे। पूर्व-निर्णय, वाक्छल और पूर्वग्रह से बचते हुए हम बौद्धिक धरातल पर उन्मुक्त और अकुंठ गति प्राप्त करेंगे। इसके लिए हमें न केवल बारीकियों में उतरना होगा, बल्कि भारतीय बुद्धि के अनुकूल व्यापक निपुणता और बौद्धिक सम्प्रभुता भी हासिल करनी होगी। 

प्रतिमान / अनुक्रम

सम्पादकीय

परिप्रेक्ष्य
हिंद स्वराज : गोधूलि वेला में परम्परा और आधुनिकता                  
त्रिदीप सुहृद

सामयिकी
भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम और राजनीतिक संकट : एक सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य धीरूभाई शेठ से मणींद्र नाथ ठाकुर और कमल नयन चौबे की बातचीत
भ्रष्टाचार : एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य                                             
योगेश अटल

संधान
ज्ञान की सामाजिक उपयोगिता और मुर्दहिया                                     
मणींद्र नाथ ठाकुर
लोकतंत्र का भिक्षुगीत : अति-उपेक्षित दलितों के अध्ययन की एक प्रस्तावना      
बद्री नारायण
रूप-अरूप, सीमा और असीम : औपनिवेशिक काल में दलित-पौरुष               
चारु गुप्ता
महादेवी की मीरां : मनचीते पुरुष की खोज 
अनामिका 
दो ‘प्रगतिशील’ कानूनों की दास्तान : राज्य, जन-आंदोलन और प्रतिरोध              
कमल नयन चौबे
सलवा जुडूम और न्याय का लोकतंत्रीकरण : नीति-निर्णय,
उदारीकरण और सुप्रीम कोर्ट 
इंद्रजीत कुमार झा
रहेगी ज़मीन, रहेगा पानी : समकालीन हिंदी उपन्यास और पारिस्थिकीय संकट   
रोहिणी अग्रवाल
देखने की राजनीति : राष्ट्रीय ध्वज और आस्था की नज़र                          
सदन झा
सियासत के अधूरे अफ़साने  : मंटो की दो कहानियाँ                              
हिलाल अहमद
गाती-झूमती मज़े लेती वैकल्पिक आधुनिकता : हबीब तनवीर का रंगकर्म          
अमितेश कुमार
समकालीन भारत में नागरिकता का मानचित्र                                      
अंकिता पाण्डेय
हिंदी-वर्चस्व और मैथिली आंदोलन                                                
मिथिलेश झा
भारत में मतदान-व्यवहार : अध्ययन का इतिहास और उभरती चुनौतियाँ           
संजय कुमार
अनुवाद : विवेकरत्न

समीक्षा
मीडिया तो मंडी में, लेकिन दर्शक कहाँ?                                   
तृप्ता शर्मा

समीक्षा के बहाने 
राजनीतिक समाज, सत्ता  और सियासत : पार्थ(चटर्जी) के आगे जहाँ और भी हैं
आदित्य निगम
संस्कृत की आधुनिकता : फिर एक बहस                                       
राधावल्लभ त्रिपाठी
पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया : राष्ट्रवाद का प्रति-आख्यान           
अभय कुमार दुबे 

प्राश्निक / आधुनिक भारत में मौलिकता : एक बहस
वैचारिक नवोन्मेष की धाराएँ : तीन साक्ष्य                                        
राकेश पाण्डेय
मौलिक चिंतन के बारे में                                                          
श्री अरविंद
विचारों का स्वराज                                                         
कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य
क्या चिंतन का कोई भारतीय तरी़का है?                                   
ए.के. रामानुजम

म़कता
खेलते-खेलते ज़िंदगी : गिरीश कारनाड की
आत्मकथा अडाडता आयुष्य का पहला अध्याय ‘प्राक् ’
कन्नड़ से अनुवाद : अतुल तिवारी      

Tuesday, 5 March 2013

विधाओं का विन्यास




Book :  VIDHAON KA VINYAS
Author :  ANANT VIJAY
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 184
ISBN : 978-93-5072-461-3(HB)
Price :  `375(HB)
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2013
Category  : Criticism


पुस्तक के सन्दर्भ में...
अनंत विजय के नाम से हिन्दी के सुधी पाठक अवश्य परिचित होंगे। पैतृक संस्कार के कारण पहले वे साहित्य की दुनिया में आये और फिर बाद में पत्रकारिता की ओर मुड़े लेकिन अब भी साहित्य उनसे छूटा नहीं है। आजकल वे एक बड़े प्रतिष्ठित चैनल IBN7 से जुड़े हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि अब भी वो साहित्यिक सवालों और विवादों में हस्तक्षेप करते हैं। हिन्दी की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका हंस और नया ज्ञानोदय में वो लिखते रहते हैं। यह यूँ ही नहीं है कि हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव अपने सम्पादकीय में अनंत विजय का उल्लेख देशी-विदेशी अंग्रेजी लेखकों की अद्यतन पुस्तकों को पढ़नेवाले के तौर पर याद करते हैं। अनंत विजय में आधुनिक हिन्दी साहित्य के विकास और इतिहास की अच्छी समझ है। बड़ी बात यह है कि हिन्दी पाठकों के सामने अंग्रेजी लेखकों के माध्यम से एक बड़ी दुनिया के यथार्थ से हमारा परिचय करा रहे हैं। साहित्यिक संस्कार के कारण वे बड़े से बड़े अंग्रेजी लेखकों से कभी आतंकित नहीं होते और उनकी भूल-गलतियों पर बेहिचक उँगुली रखते हैं। और सही जगह पर। उनके लेखन की यह विशेषता है कि वो जटिल और दुर्बोध अंग्रेजी लेखक की रचना को भी अपार धैर्य और साहस के साथ पढ़कर हिंदी पाठकों के लिए पठनीय ही नहीं बनाते हैं, बल्कि उसमें समीक्षित पुस्तक के प्रति उत्सुकता भी जगाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक में संकलित अंग्रेजी पुस्तकों- विशेषतः आत्मकथा और जीवनी पर केन्द्रित पुस्तकों की समीक्षाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि लेखन के प्रति उनकी अगाध निष्ठा है और जो कुछ अच्छा वो अनायास पढ़ते हैं, उसे पाठकों से शेयर करते हैं। उनके लेख से पाठकों के सामने एक नयी दुनिया खुलती है जो बेहद आह्लादक है। 

पुस्तक के अनुक्रम...
आत्मकथा/जीवनी
सितारों की जिन्दगी के बहाने 
संघर्ष कथा में सेक्स का तड़का 
इन्दिरा की राजनीतिक जीवनी 
सोनिया गाँधी: कुछ कही, कुछ अनकही
सोनिया-जीवनी पर बवाल
घटनाओं का कोलाज
महात्मा का इश्क
मित्र से उठता विवाद
राजनीति के टर्निंग प्वाइंट्स
लोग ही चुनेंगे रंग
राजनीति का स्याह चेहरा
मित्र की आँखों देखी
आधुनिक भारत के निर्माता
व्यक्तित्वों के रंग
अमेरिका का रंगीला राष्ट्रपति
राजनीतिक बदमाशियों की ‘जर्नी’
शून्य से शिखर का सफर
फिडेल का फरेब? 
आतंक के आका की जीवनी
जांबाज की जीवनी
व्यभिचार का विमर्श
सम्पादक की कथा
आत्मकथा से दरकती छवि
सम्पादक के पूर्वग्रह
फतवा के दर्द की दास्तां
उपन्यास/फिक्शन
फिफ्टी शेड्स ऑफ फैंटेसी
सब कुछ, मगर वो नहीं...
घटनाओं का बेस्वाद कॉकटेल
कुंठा और महत्वाकांक्षा का उत्स
रिश्ते की नयी इबारत
सपनों और आकांक्षाओं का टकराव
सफलता तलाशता विवाद 
लगभग सिंगल
विचार/इतिहास/नॉन फिक्शन
महान लेखक का बुढभस
धर्म, सेक्स और महिलाएँ
न्याय की मान्यताओं को चुनौती 
किताब से धुलेगा कलंक?
महाभारत के चरित्रों का पुनःपाठ 
परम्पराओं की पड़ताल
आन्दोलन को जानने के लिए जरूरी किताब 
महाजन का कर्जा
आतंक के अंत का थ्रिलर
किताब से बेनकाब पाकिस्तान
सन्दर्भ-ग्रन्थ 

अनंत विजय
अनंत विजय का जन्म 19, नवम्बर 1969 में हुआ। स्कूली शिक्षा जमालपुर (बिहार) में हुई। भागलपुर विश्वविद्यालय से बीए ऑनर्स (इतिहास), दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट सर्टिफिकेट, बिजनेस मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट।
प्रकाशित कृति: प्रसंगवश, कोलाहल कलह में, मेरे पात्र।
सम्पादन: समयमान।
स्तम्भ लेखन: नया ज्ञानोदय, पुस्तक वार्ता, चौथी दुनिया।

पानी भीतर फूल



Book :  PANI BHEETAR PHOOL
Author :  EKANT SHRIVASTAVA
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 180
ISBN : 978-93-5072-409-5(HB)
Price :  `300(HB)
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2013
Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में प्रख्यात कवयित्री अनामिका के विचार...
भाव का अभाव से नाता उतना ही गहरा होता है जितना ग्रामीण शिक्षक, निताई-गुरुजी का अपनी भाविनी सखा से। जिस तर्क पर टी.एस. एलियट ने कविता को नाटकीय बाना दिया था और काव्य-नाटक लिखे थे, प्रायः उसी तर्क पर एकान्त ने कविता के कलेवर में ‘पानी भीतर फूल’ लिखा है। निताई-श्यामली का पर्यावरण-सजग प्रगाढ़ दाम्पत्य (जुगनुओं की तरह के जो) आत्मदीप्त क्षण पकड़ने की कोशिश करता है, अवचेतन के पानियों में एक सतरंगी स्वप्न, एक सतरंगी फूल पकड़ने-जैसी कोशिश है। 
‘टूट टाट घर टपकत खटियो टूट’ की स्थिति हो, ‘झोपरिया में आग’ लगने की स्थिति या भूख-अपमान-असमंजस की स्थिति-आन्ना केरिनिना के लेविन-जैसा निश्छल-सरल जीवन जिया तो जा ही सकता है, एक बछुरिया के जन्म की खुशी भी उतनी ही उत्फुल्ल कर सकती है कि लगे, जहान जीत लिया! आस-पास का साग-पात टूँगकर, अगल-बगल के पशु-पक्षियों, फूल-फलों-पानियों से भी जीवन स्निग्ध और तरल किया जा सकता है। एक ग्रामीण दम्पती की सीधी-सादी दिनचर्या, उनके रोजमर्रे की जिन्दगी का छन्द उसी तन्मयता से पकड़ा जा सकता है कि वह परीकथा दीखने लगे-यह काव्यभाषा के जादू से, उसके मांसल विनियोग से ही सम्भव है जिसके लिए कवि एकान्त श्रीवास्तव जाने-माने जाते हैं। 
छत्तीसगढ़ का यह हरा-भरा गाँव ‘हिन्द स्वराज’ के सपनों का गाँव है जहाँ आपसदारी सजग-सहज संवादों में, दोस्ताना पंचायतों में, सूफियाना मनोछन्द में अभी बची हुई है! यह दूसरी तरह का ‘आधा गाँव’ है, या कहिए ‘आधा बनारस’-‘आधा जल में, आधा दूब में,’ ‘आधा है, आधा नहीं है,’ और इस अधूरेपन में भी एक तरह की सम्पूर्णता, जैसे भगोली और मंगलू, रामबाई, चण्डहीन आदि के जीवन में  और एक सूफी एहसास-भवानी प्रसाद मिश्र वाला और अनुपम मिश्र वाला भी कि कहीं कोई वियुक्त नहीं है-पशु-पक्षी-पेड़ सब छोटे-बड़े मनुष्य एक बड़े सूत्र में बँधे हैं और फिर भी अपने-आप में पूर्ण-जैसे इस उपन्यास की सारी कथाएँ-लहरियाँ-
”आकाश का विस्तार आमन्त्रण है!/बाधा नहीं है!/कोई भी बड़ा-छोटा पंछी/आधा नहीं है।“
कोई इसे एक अन्तरंग यूटोपिया भी कह सकता है, और छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि इसे एक राजनीतिक पाठ भी बनाती है। निताई जो फूल अपनी पत्नी के जूड़े में खोंसना चाहता है, लोकसंवेदना के गहरे पानियों में उसकी जड़ें  हैं,  मौत से गले मिलने की सारी चुनौतियाँ हैं वहाँ, प्रेम और मृत्यु, संयोग और वियोग के तारों पर लोकजीवन का ध्रुपद बज रहा है! विनोद कुमार शुक्ल की तरह की मद्धिम लय पूरे उपन्यास पर तारी है जो शायद एकान्त-चिन्तन की अपनी स्वाभाविक लय होती है!  

एकान्त श्रीवास्तव
शरद बिल्लौरे, रामविलास शर्मा, ठाकुर प्रसाद, दुष्यन्त कुमार, केदार, नरेन्द्र देव वर्मा, सूत्र, हेमन्त स्मृति, जगत ज्योति स्मृति, वर्तमान साहित्य-मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार आदि से सम्मानित एकान्त श्रीवास्तव का जन्म 8 फरवरी, 1964, कस्बा छुरा जिला रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ। इन्होंने एम ए (हिन्दी), एम एड , पीएच डी की उपाधि प्राप्त की।
प्रकाशित कृतियाँ: अन्न हैं मेरे शब्द, मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद, बीज से फूल तक (कविता-संग्रह); नागकेसर का देश यह (लम्बी कविता); मेरे दिन मेरे वर्ष (स्मृति कथा); कविता का आत्मपक्ष (निबन्ध); शेल्टर फ्रॉम दि रेन (अंग्रेजी में अनूदित कविताएँ); बढ़ई, कुम्हार और कवि (आलोचना)। अनुवाद: कविताएँ अंग्रेजी व कुछ भारतीय भाषाओं में अनूदित; लोर्का, नाज़िम हिकमत और कुछ दक्षिण अफ्रीकी कवियों की कविताओं का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद।
सम्पादन: नवम्बर 2006 से दिसम्बर 2008 तक तथा जनवरी 2011 से पुनः वागर्थ का सम्पादन।