Wednesday, 30 January 2013

दलित साहित्य के प्रतिमान




Book :  DALIT SAHITYA KE PRATIMAN
Author :  DR. N. SINGH
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 332
ISBN : 978-93-5072-254-1(HB)
ISBN : 978-93-5072-398-2(PB)
Price : `595(HB)/ `200(PB)
Size (Inches) : 
5.75X8.75
First Edition : 2012
Category  : Dalit Literature/Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में...
डॉ. एन. सिंह हिन्दी दलित साहित्य की स्थापना के लिए प्रारम्भ से ही संघर्षरत रहे हैं। चाहे वह दलित रचनाओं का सम्पादन कर उन्हें पाठकों-आलोचकों तक पहुँचाने का काम हो अथवा दलित रचनाकारों की कृतियों पर समीक्षा लिखकर उन्हें चर्चा के केन्द्र में लाने का काम हो। दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में लगवाने तथा उसकी वैचारिकी को स्पष्ट करने में उनकी भूमिका को सभी दलित लेखकों ने मुक्तकंठ से स्वीकार किया है। उनकी यह कृति दलित साहित्य के प्रतिमान’ हिन्दी दलित साहित्य को सम्पूर्णता में विश्लेषित करती है। एक तरह से यह हिन्दी साहित्य की तीसरी परम्परा’ को स्थापित करने का प्रयास है जिसमें गैर दलित आलोचकों के आक्षेपों के तर्कपूर्ण उत्तर तो हैं हीहिन्दी दलित साहित्य के इतिहास तथा उसके सौन्दर्यशास्त्र को दलित दृष्टिकोण से रूपायित भी किया गया है।

पुस्तक के अनुक्रम 
भूमिका
हिन्दी दलित साहित्य: वर्तमान परिप्रेक्ष्य 
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में दलित
दलित साहित्य की अवधारणा
दलित साहित्य के प्रेरणा स्रोत
दलित साहित्य का विकास
दलित साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता
दलित साहित्य और मार्क्सवाद
दलित साहित्य और गाँधीवाद
दलित साहित्य और अम्बेडकरवाद
दलित साहित्य और नारी
दलित साहित्य की राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक मान्यताएँ
दलित साहित्य की भाषाशैली
दलित साहित्य में बिम्ब, प्रतीक, छन्द एवं अलंकार विधान
दलित साहित्य में मिथकीय चेतना
दलित साहित्य और सौन्दर्य चिन्तन
दलित साहित्य: उपलब्धि और सम्भावनाएँ

परिशिष्ट
साक्षात्कार: श्री माताप्रसाद
साक्षात्कार: बलवन्त सिंह
सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची

लेखक के संदर्भ में...
डॉ. अम्बेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान’; उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, का सर्जना पुरस्कार; मध्यप्रदेश दलित साहित्य अकादमी, उज्जैन का अकादमी पुरस्कार’;  भारतीय दलित साहित्य अकादमी, भोपाल का राष्ट्रीय सृजन सेवा सम्मान’;  सहारनपुर महोत्सव समिति द्वारा रामधारी सिंह दिनकर सम्मान’; शिक्षक श्री सम्मान, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ आदि सम्मानों से सम्मानित डॉ. एन. सिंह का जन्म 1 जनवरी, 1956 ग्राम चतरसाली, जनपद सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होंने एम.ए. (हिन्दी), पीएच.डी. आचार्य पद्मसिंह शर्मा: व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषय पर मेरठ विश्वविद्यालय, से सन् 1980 में किया । डी. लिट्. हिन्दी के स्वातन्त्रयोत्तर दलित साहित्यकारों के साहित्य में परम्परा, संवेदना एवं शिल्पविधान विषय पर हेमवतीनन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (उत्तराखण्ड) से 2007 में।  
प्रकाशित कृतियाँ: सन्त कवि रैदास: मूल्यांकन और प्रदेय; सतह से उठते हुए; विचार यात्रा में; मेरा दलित चिन्तन; कठौती में गंगा; आचार्य पद्मसिंह शर्मा और हिन्दी आलोचना; व्यक्ति और विमर्श; सम्पुट; दर्द के दस्तावेज; यातना की परछाइयाँ; काले हाशिए पर; चेतना के स्वर; शिखर की ओर; दलित साहित्य: चिन्तन के विविध आयाम; दलित साहित्य और युगबोध; रैदास ग्रन्थावली; दृष्टिपथ के पड़ाव; दलित साहित्य: परम्परा और विन्यास; सुश्री मायावती और दलित चिन्तन। 
विशेष: ‘सुमनलिपि’ (मासिक) मुम्बई के दलित साहित्य अंक नवम्बर-1995 का अतिथि सम्पादन; ‘दर्द के दस्तावेज का मराठी में अनुवाद तथा सतह से उठते हुए का उर्दू में अनुवाद प्रकाशित; कुछ कविताओं का असमिया, तेलुगू, पंजाबी, गुजराती तथा अंग्रेजी में अनुवाद; आकाशवाणी नजीबाबाद से वार्ताओं का प्रसारण; कई विश्वविद्यालयों में व्यक्तित्व एवं साहित्य पर पीएच.डी. एवं एम. फिल. स्तरीय शोध सम्पन्न। 

Friday, 18 January 2013

'वाक्'-12






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'वाक्' नए विमर्शों का त्रैमासिक 


सम्पादक- सुधीश पचौरी 
प्रबंध संपादक -अरुण महेश्वरी 
संपादन सहयोग -उमा शंकर चौधरी

'
वाक्'-12 के इस अंक में प्रस्तुत है ...

आलेख
उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श और पद्मावत’ -राजकुमार
द्वैधता का द्वंद्व बनाम उन्मुक्त दलित-विमर्श -नरेन्द्र कुमार आर्य
जाने हम दफ्न हों बोसीदा किताबों में कहां -सुषमा भटनागर
समकालीन हिंदी कविता: यानी 1960 के बाद की हिंदी कविता -देव शंकर नवीन

पत्र
अज्ञेय के पत्र शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल
और मुक्तिबोध के नाम
गजानन माधव मुक्तिबोध और फणीश्वरनाथ 
रेणु के पत्र अज्ञेय के नाम

पुनःपाठ
त्रिवेणी की तीसरी वेणी: तोड़ती पत्थर -श्रीराम त्रिपाठी
पंचलाइट के बहाने अंधेरों और वर्जनाओं से लड़ने की कोशिश -ज्योति चावला

आत्मकथा
बोलेंगे कि बोलता है-सूरजपाल चौहान

कहानी
सपने -चरण सिंह पथिक
देह भी बोलती है-दिनेश कर्नाटक 

कविताएं
पवन करण की कविताएं
निर्मला पुतुल की कविताएं
हरिओम की कविताएं

समीक्षा
अकूत कहिश: आदिवासियों की यातना कथा-परमानंद श्रीवास्तव
अस्मिता के लिए संघर्ष करती कहानियां -वंदना

विशेष सदस्यता अभियान पर पाठकों के लिए विशेष छूट।

'
वाक्
नए विमर्शों का त्रैमासिक
मूल्य : एक अंक 75/-रुपये
व्यक्तिगत वार्षिक शुल्क : 400 रुपये ( चार अंक) डाक व्यय सहित 

ऑफर : 3 वर्ष की सदस्यता (12 अंक)
-'
वाक्' की तीन वर्षीय सदस्यता के लिए आपको देना होगा 1200 रुपये जिसपर आप प्राप्त कर सकते हैं अपनी मनपसन्द 800 रुपये की (सजिल्द) पुस्तकें बिल्कुल मुफ्त। 

ऑफर : 5 वर्ष की सदस्यता (20 अंक) 
-5
वर्ष की सदस्यता के लिए आपको देना होगा 2000 रुपये । जिसपर आप प्राप्त कर सकते हैं अपनी मनपसन्द 1200 रुपये की (सजिल्द) पुस्तकें बिल्कुल मुफ्त। 

ऑफर : आजीवन सदस्यता ( 48 अंक )
-'
वाक्' की आजीवन सदस्यता सिर्फ 4000 रुपये में प्राप्त करें। साथ ही दो वर्ष की सदस्यता उपहार स्वरुप यानि 12 वर्षों तक लगातार आप को 'वाक्' मिलती रहेगी।

विशेष सदस्यता अभियान का लाभ उठायें।
मनीआर्डर/बैंक ड्राफ्ट/चैक 'वाक्' नयी दिल्ली के नाम निम्न पते पर भेजें। 
वाणी प्रकाशन 
21-
, दरियागंज, नयी दिल्ली -110002
फ़ोन नं- 011-23273167

नोट : यह ऑफर सीमित अवधि 31 मार्च 2013 तक वैध है।

Thursday, 10 January 2013

उम्र से लम्बी सड़कों पर गुलज़ार



Book :  UMRA SE LAMBI SADAKON PAR : GULZAR
Author :  BINOD KHAITAN
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 408
ISBN : 978-93-5072-395-1(HB)
ISBN : 978-93-5072-407-1(PB)
Price : `595(HB)/`250(PB)
Size (Inches) :
5.75X8.75
First Edition : 2013
Category  : Poetry/Criticism


पुस्तक के सन्दर्भ में...
फिल्मों ने गुलज़ार को शोहरत दी, लेकिन इसी वजह से उनके गीतों में अंतर्निहित काव्य-तत्त्व के साथ न्याय नहीं हो सका। आम तौर पर फिल्मी दुनिया को संदेह से देखने वाली समीक्षा-दृष्टि ने यह समझने की ज़हमत  नहीं उठाई कि  गुलज़ार की कविता चाहे जिस संदर्भ से पैदा होती हो, उसमें हमारे वक़्त के साये दिखते हैं, हमारे ज़माने  की परछाइयाँ बनती हैं। रूपक-मेटाफ़र का इस्तेमाल गुलज़ार की  वह ताक़त है जो भारतीय भाषाओं के बड़े कवियों के बीच उनकी जगह बनाती है। वे कभी अमृता प्रीतम की याद दिलाते हैं, कभी साहिर को आगे बढ़ाते हैं, कभी शैलेन्द्र की सादगी का आभास देते हैं। उनकी कविता कभी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की तरह संसार की साधारण स्थितियों को अद्भुत और असाधारण बनाती है, कभी ग़ालिब  के मुख़्तसर मिसरों की तरह ज़िन्दगी की जटिलताओं को जुबान  देती है और कभी विनोद कुमार शुक्ल की तरह महीन रास्तों पर जाती है। उनके गीतों को समझना अपनी कविता के संसार को कुछ और समृद्ध करना है। इस गुलज़ार को संजीदगी से लेने की, मुकम्मल तौर पर समझने की ज़रूरत है और यह किताब ये काम बख़ूबी करती है।
शायर गुलज़ार के फिल्मी गीतों के आकर्षण का दायरा बड़ा है। इसकी ज़द में आकर इन गीतों की काव्यात्मक गूँज को विनोद खेतान आत्मसात करते रहे और इनमें कविता-तत्त्व रेखांकित करते रहे। उन्हें लगा कि ज़ार-ज़ार  रोने और ज़ोर ज़ोर से हँसने वाली, हर बात को अतिनाटकीय ऊँचाइयों तक ले जाने वाली फिल्मों की दुनिया में एक शख़्स ऐसा है, जिसे मालूम है कि ख़ामोशी भी बोलती है...कि बहते आँसुओं से ज़्यादा तकलीफ़ पलकों पर ठहरे मोती पैदा करते हैं...कि रुलाइयों से ज़्यादा असरदार भिंचे हुए होठों के पीछे छिपे मौन दुख होते हैं। इसलिए अलग माध्यम के बावज़ूद गीतकार गुलज़ार शायर गुलज़ार के सहयात्री  हैं-पाँच दशकों से।
इस किताब से गुज़रते  हुए अकसर लगता है कि गुलज़ार ने फिल्मों को कम बोलकर ज़्यादा कहने का सलीक़ा दिया है। उनके गीतों का यह सफ़र लमहों का हो, इसकी गूँज सदियों तक सुनाई पड़ती है। इस सफ़र में एहसास साथ चलते हैं, ख़याल बाँहें पकड़े होते हैं और मंजिलें मानी नहीं रखतीं। ये सड़कें लम्बी हैं- उम्र से लम्बी।

प्रख्यात गीतकार, कवि एवं फिल्मकार गुलज़ार के सन्दर्भ में...
गुलज़ार  एक संजीदा शायर और लोकप्रिय फिल्मकार तो हैं हीउनकी रचनाशीलता के खाते में ढेरों कला-माध्यमों की उपलब्धियाँ दर्ज हैं। एक तरफ वे प्रभावशाली कहानीकार और बेहतरीन गीतकार हैं तो दूसरी ओर वे एक मँजे हुए संवाद और पटकथा लेखक भी हैं। 1934 में दीना (अब पाकिस्तान) में जन्मे गुलज़ार ने बिमल रॉय के सहायक के रूप में अपना फिल्मी सफ़र आरम्भ कियाजो पाँच दशक बाद आज भी जारी है।
उनकी कविताएँ- जानमएक बूँद चाँदकुछ नज़्मेंकुछ और नज़्मेंसाइलेंसेज़पुखराजचाँद पुखराज काऑटम मूनत्रिवेणीरात चाँद और मैंरात पश्मीने  कीयार जुलाहे और पन्द्रह पाँच पचहत्तर में संकलित हैं। कहानियों/गद्य-लेखन के महत्त्वपूर्ण संग्रह हैं- चौरस रातरावी पारड्योढ़ी और पिछले पन्ने। मेरा कुछ सामानछैंया-छैंया, 100 लिरिक्स और मीलों से दिन में फिल्मी गीत प्रकाशित हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कुछ बेहद गम्भीर लेखन किया हैजिसमें बोस्की का पंचतंत्र भी शामिल है और बच्चों के लिए लिखी गुरुदेव की रचनाओं पर आजकल विशेष काम कर रहे हैं। वरिष्ठ मराठी कवि कुसुमाग्रज की कविताओं का अनुवाद प्रकाशित है। मेरे अपनेआँधीमौसमकोशिशख़ुशबूकिनारानमकीनमीरापरिचयअंगूरलेकिनलिबासइजाज़त,  माचिस और हू-तू-तू जैसी सार्थक फिल्मों का निर्देशन किया। इनमें से कई पटकथाएँ पुस्तक रूप में आयीं। मिर्जा ग़ालिब पर एक प्रामाणिक टी.वी. सीरियल बनाया और दूरदर्शन के लिए गोदान पर लम्बी फिल्म के अतिरिक्त प्रेमचंद की कई कहानियों पर फिल्में बनायी।
वे पद्म भूषणसाहित्य अकादेमी पुरस्कारइंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज़  शिमला की लाइफ़टाइम  ऑनररी फेलोशिप सहित तमाम अन्य अलंकरणों से समादृत हैं। फिल्मों में सक्रियता और विशिष्टता के प्रमाण-स्वरूप उन्हें ऑस्करग्रैमीफिल्मफेयर (21 बार) एवं नेशनल फिल्म अवार्ड (बार) मिले हैं। आजकल गीतसंवाद एवं पटकथा लेखन करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण अनुवाद कार्य में संलग्न हैं।



लेखक के संदर्भ में...
पेशे से चिकित्सक-प्राध्यापक विनोद खेतान की अभिरुचियाँ मूलतः साहित्यिक- सांस्कृतिक रही हैं। कॉलेज के दिनों में लेखन के साथ-साथ हस्तलिखित अनियमित लघु पत्रिका का सम्पादन करते थे और आज भी लिखते रहते हैं- नियमित-अनियमित। कविताओं के अलावा साहित्य और समाज से जुड़े मुद्दों पर अकसर गद्य-लेखन भी। उनकी लेखकीय तरलता और बौद्धिकता ध्यान खींचती रही है। धर्मयुगरविवारआलोचनाजनसत्ता तथा कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपती रही हैं। साल 2001 में आये उनके पहले कविता-संग्रह बार बार यायावर ने पाठकों तथा कई सुधी समीक्षकों का ध्यान खींचा और डॉ. नामवर सिंह जैसे आलोचक ने कहा कि जिन गिने-चुने पहले कविता-संग्रहों ने उनका ध्यान आकर्षित किया उनमें बार बार यायावर भी है। उनका दूसरा कविता-संग्रह प्रकाशन के लिए लगभग तैयार है। बिहार के एक छोटे कस्बे बैरगनिया से आये विनोद खेतान दिल्ली में रहते हैं।