Friday, 28 December 2012

मीराबाई और भक्ति की आध्यात्मिक अर्थनीति




Book :  MEERABAI AUR BHAKTI KI AADHYATMIK ARTHANEETI
Author :  PROF. KUMKUM SANGARI
Translator : Dr. Anupama Gupta
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 140
ISBN : 978-93-5072-311-1
Price : `295(HB)
Size (Inches) : 4
X7
Category  : Feminism/Social Science

पुस्तक के सन्दर्भ में ...
मीराबाई और भक्ति  की आध्यात्मिक अर्थनीति  
बहुचर्चित स्त्रीवादी लेखिका कुमकुम संगारी जी का मीरा तथा अन्य भक्त कवियों पर किया गया यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शोध हमें भक्ति साहित्य की विद्रोही प्रकृति के कुछ अनछुए पहलुओं से परिचित कराता है, जिसमें मीरा मध्यकाल के कठोर ब्राह्मण- राजपूत पुरुष-वर्चस्ववादी आध्यात्मिक बाजार में स्त्री  मुक्ति की सफल विक्रेता बन कर उभरती हैं। दरअसल वंश, जाति और सबसे अधिक जेंडर की पितृसत्तात्मक अवधारणाओं को सबसे सफल, कूटनीतिक आघात भक्ति धारा ने ही पहुँचाया है क्योंकि भक्ति की जमीन पर स्त्रीत्व  एक ऐसा अहम् रहित माध्यम बन कर सामने आया जिसे पहली बार पुरुष भक्तों ने भी स्वयं की खोज के एक रास्ते के रूप में अपनाया। भक्ति पितृसत्ता के ढाँचे में रहते हुए व उसी के उपकरणों, भाषा और सिद्धान्तों का प्रयोग करके विवाह तथा ईश्वर-राजा-पति-स्वामी के भावबिम्बों को परिवर्तित कर पितृसत्ता के ही विरोध में खड़ा कर देती है, चाहे सीमित रूप में ही। पितृसत्ता के आदर्शों और विवाह व दासत्व सरीखी संस्थाओं का प्रतिपादन मीरा ने उनकी लौकिक सत्ता को चुनौती देने के लिए किया। स्त्री-मुक्ति की काँपती दीपशिखा को दमनकारी मध्यकाल में मीरा जिस तरह बचा लेने में कामयाब रही हैं वही इस शोध का विषय है। कुमकुम जी द्वारा इंग्लिश में किये गये मूल शोध को हिन्दी के बृहत् पाठक वर्ग तक पहुँचाना ही हमारा प्रमुख लक्ष्य है।

लेखिका के सन्दर्भ में...
कुमकुम संगारी
कुमकुम जी वर्तमान में विस्कोंसिन-मिलवॉकी विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व मानवशास्त्र  की प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। इससे पूर्व वे भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से समकालीन अध्ययन केन्द्र तथा नेहरू स्मृति संग्रहालय व पुस्तकालय में 'Professorial Fellow'  के तौर पर कार्य कर चुकी हैं। समाज, संस्कृति और साहित्य के बीच अन्तःसम्बन्धों पर अपने व्यापक शोध के चलते कुमकुम जी अकादमिक प्रकाशन के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनके शोध विषयों में प्रमुख हैं- ब्रिटिश, अमेरिकन तथा भारतीय साहित्य, समालोचना के सिद्धान्त, धर्मान्तरण, मध्यकाल की मौखिक भक्ति परम्परायें, राष्ट्रीय व्यक्तित्व जैसे गाँधी व एनी बेसेंट, मुम्बई सिनेमा, दूरदृश्य स्मृति और साथ ही समकालीन जेंडर मुद्दे जिनमें शामिल हैं निजी कानून, घरेलू श्रम, सौन्दर्य उद्योग, लिंग चयन, सती प्रथा व साम्प्रदायिक हिंसा। उनकी पुस्तक ‘पोलिटिक्स ऑफ द पोसिबल: एसेज ऑन जेंडर, हिस्ट्री, नरेतिव्ज एंड कोलोनियल इंग्लिश’ काफी चर्चित रही है। उन्होंने कुछ पुस्तकों का सह-सम्पादन भी किया है जिनमें ‘वीमेन एंड कल्चर’, ‘रीकास्टिंग  वीमेन एसेज इन कोलोनियल हिस्ट्री’ तथा ‘फ्रॉम मिथ्स टू मार्केट: एसेज ऑन जेंडर’  मुख्य हैं।

अनुवादक के सन्दर्भ में ...
अनुपमा गुप्ता
(एम. डी. पैथोलोजी)
पेशे से चिकित्सक डॉ. अनुपमा साहित्य, हिन्दी भाषा व स्त्रीवादी  सरोकारों से अपने गहरे लगाव के कारण इस परियोजना से जुड़ीं। वे वर्धा, महाराष्ट्र से छपने वाली प्रबुद्ध  स्त्रीवादी पत्रिका ‘स्त्रीकाल’ के सम्पादक मंडल की प्रमुख सदस्या हैं और राजनीतिक, सामाजिक उद्देश्यों के लिए लेखन / अनुवाद में रुचि रखती हैं।
सम्प्रति: प्राध्यापक, महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान।