Saturday, 13 October 2012

नयी सदी के लिए चयन : पचास कविताएँ


 नयी सदी के लिए चयन पचास कविताएँ नामक  श्रृंखला के अंतर्गत चयनित कवियों एवं कवियत्रियों को सम्मिलित किया गया है 
Book : Pachas Kavitayen : Nai Sadi Ke Liye Chayan
Publisher : Vani Prakashan Size (Inches) : 5.25 X8



Poets Name


ISBN 

Price

महादेवी वर्मा  



978-93-5000-897-3 


65 `

मैथिलीशरण गुप्त



978-93-5072-303-6


65 `

अशोक वाजपेयी 


978-93-5000-705-1

65 `

अरुण कमल



978-93-5000-725-9


65 `

अज्ञेय        



978-93-5000-716-7 


65 `

उदय प्रकाश  



978-93-5000-724-2 


65 `

विनोद कुमार शुक्ल



978-93-5000-778-5  


65 `

नंदकिशोर आचार्य



978-93-5072-219-0 


65 `

अनामिका 



978-93-5000-893-5 


65 `

केदारनाथ सिंह 



978-93-5072-218-3 

65 `

कुँवर नारायण    



978-93-5000-773-0 

65 `

सविता सिंह   



978-93-5000-894-2 


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लीलाधर मंडलोई 



978-93-5000-826-3


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ममता कालिया  



978-93-5072-226-8


65 `

प्रयाग शुक्ल  



978-93-5072-217-6


65 `

रामदरश मिश्र  



978-93-5000-825-6  


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 पुस्तक:  नयी सदी के लिए चयन : पचास कविताएँ
'नयी सदी के लिए चयन: पचास कविताएँ' में सम्मिलित हस्ताक्षर और उनकी कविताएँ 
    
  
'नयी सदी के लिए चयन : पचास कविताएँके रचनाकारों के सन्दर्भ में .....
मैथिलीशरण गुप्त
पचास कविताएँ नयी सदी के लिए चयन में मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं का संपादन अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद ने किया है ।
राष्ट्र जीवन की चेतना को मन्त्र-स्वर देनेवाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के बारे में जितना भी कहा जाए कम है । मैथिलीशरण गुप्त के बारे में कहा जाता है कि जब इनके पिता जी पढ़ने के लिए इनका दाखिला शहर में करवाया । शहर में गुप्त जी घूमते रहते थे एक दिन पिता जी को यह बात पता चली तो वह मिलने गए। और कहा कि तुम पढ़ते नहीं घूमते रहते हो । इस पर गुप्त जी ने कहा कि पिता जी मैं पढ़ने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ । मैं इसलिए पैदा हुआ हूँ कि लोग मुझे पढ़े । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो गुप्त जी की बात शतप्रतिशत सही है ।
उनकी कविता सखि, वे मुझसे कहकर जाते! की पक्तियां...

सिद्धि-हेतु स्वामी गये, यह गौरव की बात,
पर चोरी-चोरी गये, यही बड़ा व्याघात ।

सखि, वे मुझसे कह कर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते ?

मुझको बहुत उन्होंने माना,
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना,

जो वे मन में लाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में-

क्षात्र-धर्म के नाते ।
सखि, वे मुझे कह कर जाते । 
      
महादेवी वर्मा 
महादेवी वर्मा की कविताओं का संपादन अनामिका ने किया है  अनामिका स्वयं इस श्रृंखला में सम्मिलित हैं।   अनामिका हिन्दी की ऐसी पहली कवयित्री हैं, जिन्होंने शिल्प, सौन्दर्य और आस्वाद के स्तर पर कविता को एक नया धरातल दिया है।  महादेवी वर्मा की कविताओं के संपादन के लिए आज के परिप्रेक्ष्य में अनामिका उपयुक्त बैठती हैं
अनामिका की 'ब्लाउज' कविता, एक एहसास कराती है कि ममत्व की परिभाषा कोई नहीं दे सकता। 'ब्लाउज'
"मेरा ब्लाउज,मेरे बच्चे का गुल्लक है।  कहीं से भी घूमता-टहलता हुआ आता है और बड़े निश्चिंत भाव से पोस्ट वहाँ कर जाता है।  चकमक पत्थर,सीपी, सिगरेट की पन्नियाँ, खिलौनों के नट-बोल्ट, सारे अखोर-बखोर   कभी- कभी मैं  ऊबकर, उसे मारने  दौड़ती हूँ अकसर तो वह भाग जाता है, और कभी पिट गया तो सुकुर-सुकुर रोता-बिसूरता नाक-आँख सब रगड़ देता हैब्लाउज से   बेचारे ब्लाउज की नन्ही-सी जान डरकर चिपक जाती है मुझसे !"

अशोक वाजपेयी
अशोक वाजपेयी पचास वर्ष से अधिक कविता रचना में सक्रिय रहे हैं और आज हिन्दी कविता में अग्रणीय हस्ताक्षर हैं   अपने को संसार का गुनगायक और कविता का निर्लज्ज पक्षधर कहनेवाले  इस कवि ने घर-परिवारप्रकृति, कलाओं, मृत्यु, प्रेम आदि पर लिखा है   वह न केवल मूर्धन्य हिन्दी कवि-आलोचक, अनुवादक, संपादक हैं बल्कि भारत की एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति भी हैं।  अशोक वाजपेयी की कविताओं की कुछ पक्तियां ..
" तुम ऋतुओं को पसंद करती हो और आकाश में किसी न किसी की प्रतीक्षा करती हो तुम्हारी बांहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे कितने जीवित जल तुम्हें घेरते ही जा रहे हैं  और तुम हो कि फिर खड़ी हो   अलसायी, धूप-तपा मुख लिये एक नये झरने का कलरव सुनतीं -एक घाटी की पूरी हरी महिमा के साथ !"

अरुण कमल 
लगभग चार दशकों के कवि-श्रम का प्रितिनिधित्व करतीं सुपरिचित कवि अरुण कमल की कविताएँजीवन-अनुभव एवं शिल्प की विविधता तथा विस्तार,भाषा के सम्पूर्ण वर्ण-कर्म के सिद्ध व्यवहार एवं सर्वथा नये अनूठे बिम्बों की श्रृंखला का दस्तावेज है।  अरुण कमल की प्रत्येक कविता जीवन का नया आविष्कार एवं भाषा का नया परिष्कार है। 
अरुण कमल की कविता 'सखियाँ' इस प्रकार है ...."माथे पर जल भरा गगरा लिये, ठमक गयी अचानक वह युवती।  मुश्किल से गर्दन जरा-सा घुमायी, दायाँ तलवा पीछे उठाया और सखी ने झुककर खींचा रैंगनी कांट और चल दीं फिर दोनों सखियाँ माथे पर जल लिये "

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेयकी कविताओं का संपादन कृष्णदत्त पालीवाल ने किया है। वह अज्ञेय पर लिखते रहे हैं । हिन्दीसाहित्य में वरिष्ठ आलोचक हैं। वह कहते हैं कि अज्ञेय आज आधुनिकों में प्राचीन हैं और प्राचीनों में आधुनिक। 'अज्ञेय' की कविताओं के संपादन को सही रूप में कृष्णदत्त पालीवाल ने दिया है। क्योंकि 'अज्ञेय' एक हस्ताक्षर हैं और हस्ताक्षर को हस्ताक्षर ही समझ सकता है।  
हिंदी साहित्य के इतिहास में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय एक अति महत्वपूर्ण और अपरिहार्य नाम है।  प्रयोगवाद और नई कविता को हिंदी साहित्य में उन्होंने प्रतिष्ठित किया है।  कविता के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, निबंध, समालोचना, पत्रकारिता, यात्रावृत्तांत आदि साहित्य की सभी विधाओ में उनका योगदान उच्चतम रहा है 
 अज्ञेय-साहित्य की एक विशेषता है, उनमें आधुनिकता का बोध है  उस आधुनिकता बोध में भारत की साहित्यिक-सांस्कृतिक  परंपरा के साथ पाश्चात्य साहित्य तथा विचारधाराओं का विलक्षण सामंजस्य है  
अज्ञेय के एक छोटी सी कविता 'साँप' जो उन्होंने दिल्ली में  15 जून 1954 को लिखा था   साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।  एक बात पूछूं -(उत्तर दोगे) तब कैसे सीखा डंसना, विष कहाँ से पाया

उदय प्रकाश 
उदय प्रकाश हिन्दी के उन कवियों में से हैं जिनके यहां यथार्थ एहसासभर नहीं है  बल्कि उनकी कविताओं में यथार्थ अपने तीखेपन के साथ उपस्थित हो कर  समाज की पड़ताल करता है  उदय प्रकाश की कविताओं में यह सच्चाइयां कभी विचार बनकर उभरती हैं और कभी बिम्बों के माध्यम से उजागर होती हैं। यह एक ऐसे कवि हैं जिनके पास अपनी बात रखने की दिलकश शैली है  उदय प्रकाश की कविता 'मरना' की पक्तियाँ...
"आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता  आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता  कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है।"

कुँवर नारायण 
कुँवर नारायण, हिन्दी कविता के ही नहीं,बल्कि समूचे भारतीय साहित्य की बीसवीं शताब्दी के अग्रणी एवं अन्यतम लेखक हैं  श्रृंखला में यह देखना प्रीतिकर और प्रासंगिक है कि अपने जीवन के आठवें दशक में कुँवर नारायण पूर्णतया सृजनरत रहते हुए संवेदनाओं की ऐसी ठोस ज़मीन पर खड़े नज़र आतें हैं।  धीरज, विवेक, आत्मसजगता, जिजीविषा, संघर्ष और करुणा ऐसे बीज शब्द हैं, जिनसे कुँवर नारायण का रचना संसार आज तक उत्कर्ष पाता रहा है 
कवि-कुँवर नारायण की कविता 'सवेरे-सवेरे' की पक्तियां .....
"
कार्तिक की एक हँसमुख सुबह।  नदी-तट से लौटतीं गंगा नहा कर सुवासित भीगी हवाएँ, सदापावन माँ सरीखी अभी जैसे मंदिरों में चढ़ा कर खुशरंग फूल   ठण्ड से सीत्कारती घर में घुसी हों, और सोते देख मुझको जगती हों- सिरहाने रख एक अंजलि फूल हरसिंगार के नर्म ठंड़ी उँगलियों से गाल छूकर प्यार से, बाल बिखरे हुए तनिक सँवार के ...."

प्रयाग शुक्ल 
प्रयाग शुक्ल की कविता पिछले पाँच दशकों से स्मृति और वर्तमान-क्षण को मानों एक साथ आलोकित करती रही है   उसमें प्रकृति, मनुष्य, समाज-परिवार और बृहत्तर जीवन से जुड़े कई मर्म हैं तो कई अछूते बिम्ब और सारग्राही संधान भी हैं।
प्रयाग शुक्ल की कविता 'जल' की पक्तियां ......
"हर क्षण साथ हैं, रश्मियाँ सूर्य-चन्द्र की हर क्षण आकाश!  हवा, हर क्षण धरती भी, पैरों के नीचें! जल- वही नहीं है साथ हर क्षण कहीं तल-अतल में है दूर, नदी-समुंद्र-बादल-ताल में, उसे लाना ढोना उगाहना उचिलापना पड़ता है- हाँ, वह खींचता है अपनी ओर हर क्षण वही सींचता  जल!!"

सविता सिंह 
सविता सिंह की कविता हमारे ऐतिहासिक समय में नयी स्त्री के नए स्वप्नों और सामर्थ्य से भरपूर कविताएँ हैं।
सविता सिंह कविता 'स्त्री सच हैकी पक्तियां ......
"चारों तरफ नींद है प्यास है हर तरफ, जागरण में भी उधर भी जिधर स्वप्न जाग रहे हैं, जिधर समुन्दर लहरा रहा है  दूर तक देख सकते हैं  समतल पथरीले मैदान हैं, प्राचीनतम- सा लगता विश्व का एक हिस्सा और एक स्त्री है लांघती हुई प्यास"

ममता कालिया 
ममता कालिया ने आज भले ही गघ लेखन की विधाओं में अपना स्थान बना लिया हो, मूलत: वह कवयित्री हैं। ममता की कविताएँ बहुत लम्बी नहीं होतीं, वे प्रत्यंचा सी तनी हुई, पाठक की चेतना पर असर डालती हैं इनकी कविताओं में स्त्री-विमर्श अपनी पॉजिटिव शक्ति के साथ उभरता है
ममता कालिया की कविता ' सुख' की पक्तियां ...
"
इस सारे सुख को नाम नहीं देंगे हम, छोर से छोर तक माप कर यह नहीं कहेंगे
हम....बाहर आ जायेंगे।"

विनोद कुमार शुक्ल 
पिछले चार दशकों से  कविता लिखते हुए, विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी के सर्वाधिक जागरूक और निर्भीक-निस्संकोच कवि नज़र आते हैं  "प्रतिमाएं पत्थर की हैं" कविता की पक्तियां ....."प्रतिमाएं पत्थर की हैं मूर्तियों में आनंद पत्थर का सुख पत्थर का है, इस सुख में मुस्कराहट पत्थर की हमारी चितवन के सामने पत्थर है ..हम दोनों आलिंगन में पथराये 



केदारनाथ सिंह 
केदारनाथ की कविताओं में महानगर-कस्बों से लेकर सुदूर ठेठ देहात तक का वर्णन होता है।  केदारनाथ कविता के माध्यम से कहते है " उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए"


लीलाधर मंडलोई 
मंडलोई समकालीन हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाने जाते हैं उनके आठ कविता संग्रह और दो चयन प्रकाशित। साहित्यिक अवदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मान व पुरस्कारों से पुरस्कृत। इनकी कविताओं में सतपुड़ा के जंगल, दृश्य, मौसम, पशु-पक्षी, नदी, तालाब, लोग पाते हैं। वे प्रकृति और मनुष्य के अद्भुत रिश्तों पर बात करते हुए, सृष्टि की अपरिहार्यता को रेखांकित करती हैं। इनकी कविताएँ संसार की पीड़ा यातना और आगत त्रासदी के प्रति भी सचेत करती हैं।


रामदरश मिश्र 
रामदरश मिश्र गमले के फूल नहीं, एक ख़ास जमीन में उगे हुए पेड़ हैं, जिनके फूलों की महक लोक-जीवन की लय के साथ-साथ व्यक्ति जीवन की लय के अन्वेषण में भी है
इनकी कविता का ख़ास स्वभाव यह है कि वह पाठक के साथ-साथ चलते-चलते अंत में एक विस्मयकारी प्रभाव दे जाती है जबकि शुरू में नहीं लगता है कि एक प्रभाव जमा रही है। दरअसल कविताएँ प्रभाव छोड़ती नहीं चली जातीं बल्कि प्रभावों को जमा करती चली जाती हैं जो अंत में घनीभूत होकर ठोसावस्था में  हृदय और मस्तिष्क पर उभरती हैं। 


नंदकिशोर आचार्य
नंदकिशोर आचार्य अनेक विधाओं में सृजनशील श्री आचार्य को मीरा पुरस्कार, बिहारी पुरस्कार, भुवनेश्वर पुरस्कार, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, नरेश मेहता स्मृति सम्मान आदि 
अलंकरणों से सम्मानित हैं। अपने समय में रहते हुए भी एक सार्वकालिक दृष्टि से उसे बींध देना आचार्य कि कविता का एक विरल गुण है। इनकी कविता 'आती है जैसे मृत्यु' कि पंक्तियाँ ..."आयीं तुम 
आती है जैसे मृत्यु 
नष्ट करती हुई
जो कुछ नश्वर है मेरे भीतर 
बनाती हुई स्मृति मुझे 
अपने आने की-
अक्षर 
कवयित्री अनामिका कहती हैं कि आचार्य जी की कविताएँ 'ध्रुपद गायन शैली का महीन ग्राफांकन हैं, जहाँ कुछ बीज शब्द और बीज विम्ब 'तोम-तनमन, 'तोम-तोम' , भाव से बार-बार लौटते हैं