Tuesday, 28 August 2012

'योजनाओं का शहर'



'योजनाओं का शहर' के पृष्ठ संख्या 11, 'आदमीनामा' से -

'जब भी कहा जाता है मुझसे कि
पता नहीं आप आदमी हैं कि क्या हैं 
तो मुझे लगता है कि आदमी होकर भी 
अपने को आदमी कहलवा लेना आसान नहीं है 

इसका एक रास्ता यह है कि 
आप अपने को आदमी मानना ही छोड़ दें 
और तोता बन जाएँ 
जो सामने पड़ें उसी की भाषा दोहराते जाएँ 
या फिर एकदम चुप हो जाएँ और 
शरीर को इस तरह झुकाएँ की मेज़ नज़र आएँ 
दूसरों को रखने दें टांगें अपनी पीठ पर 

जो जितना कम आदमी रहता है 
वह उतना ज्यादा आदमी समझा जाता है 
उसकी तारीफ़ में कहा जाता है...
क्या आदमी है !
                                -संजय कुंदन 


Book :  Yojnaon Ka Shahar
Author : Sanjay Kundan
Price : `200(HB)
ISBN : 978-93-5072-207-7
Total Pages : 96
Size (Inches) : 5.50X8.50
Category  : Poetry

पुस्तक के सन्दर्भ विष्णु नागर जी के विचार...
नब्बे के दशक में जो कवि हिन्दी कविता की दुनिया में उभरकर सामने आये, उनमें निश्चय ही एक उल्लेखनीय नाम संजय कुंदन का है। संजय ने इस कविता-संग्रह ‘योजनाओं का शहर’ तक आते-आते अपनी कविता में जो सहजता, मार्मिकता तथा शब्दों की अपस्फीति हासिल की है, वह खासतौर पर ध्यान देने योग्य है। यह कविता विशेष रूप से पिछले दो दशकों की तमाम मुश्किलों का सबसे विश्वसनीय ढंग से बखान करने वाली कविता है मगर खुद यह कविता मुश्किल नहीं है। यह कविता मुश्किल इसलिए नहीं है क्योंकि यह सबसे विश्वसनीय है। यह कविता हिन्दी कविता की उस बीमारी से भी मुक्त है जहाँ कवि हर छोटी-छोटी बात पर अतीत की खोल में घुसकर वर्तमान को गरियाना शुरू कर देता है। संजय की लगभग सारी कविताओं में आप देखेंगे कि उसमें वर्तमान जैसा है और कवि जिस तरह उसका सामना कर रहा है, जिस तरह उसे देख-समझ रहा है, जिस तरह उसमें फँसा-दबा-खड़ा-तना है, वह साफ-साफ यहाँ दीखता है। पहली ही बार शायद इस कविता में इस बात का खुलासा भी हुआ है कि आज का नौकरी-तंत्र कितना वीभत्स बन चुका है, जिसमें एक साधारण कर्मचारी को किसी भी बहाने, कभी भी दरवाजा दिखाया जा सकता है। किसी से कहा भी जा सकता है कि दरअसल आप इंसान तो बेहतर हैं लेकिन नौकर अच्छे नहीं हैं। आपको इस हद तक डरा दिया जा सकता है कि आप ऑफिस का पेपरवेट या कंप्यूटर माउस या आलपिन बनने का सपना देखने लग जाएँ ताकि अपने अधिकारी की नजर में चढ़ जाएँ। आपकी इसलिए छँटनी की जा सकती है कि आपकी कमीज, अधिकारी की कमीज से सफेद क्यों है, कि आपने इस उठाईगीरे या उस हत्यारे की तारीफ क्यों नहीं की?
दरअसल संजय की कविता आज की साधारण-सामान्य जिन्दगी का दस्तावेज है। एक निम्नवर्गीय शहरी का जीवन नल आने के इन्तजार में कैसे खप और बदल जाता है, यह कविता इस बात की गवाही देती है। यह कविता साधारण आदमी के जीवन से दाल के गायब हो जाने जैसी मामूली बात भी करती है। यह कविता नमक, माचिस, गुड़ की बात भी करती है। यह उस आदमी को अपराधी बना दिए जाने की बात करती है जो कभी अक्सर किनारे बैठकर नदी में कंकड़ फेंकता हुआ देखा जाता था, जो छठ के मौके पर नंगे पैर सिर पर टोकरी उठाए हाँफते हुए गंगा तट तक जाता था, जो ईंट के विकेट के आगे चौके-छक्के उड़ाता हुआ नजर आता था। यह कविता इस तरह साधारण के तमाम असाधारण विवरणों से भरी हुई है लेकिन अपनी असाधारणता को भी साधारणता के साथ धारण किए हुए, बिना शोर किए, बिना चीखे-चिल्लाये। वह असाधारण को इस तरह साधारण करती है कि जो साधारण बार-बार दिखने के कारण न दिखने जैसा लगने लगा था, वह दिखने लग जाता है लेकिन कवि उसे इस तरह नहीं दिखाता कि देखो-देखो, यह मैं हूँ जो आपको दिखा रहा हूँ बल्कि कवि तो चुपके से आपके और यथार्थ के बीच न आने की भरपूर कोशिश करता है। आप इस कविता की मार्मिकता से भी जब गुजरते हैं तो ऐसे नहीं कि आपको मार्मिकता का टूरिज्म कराया जा रहा है बल्कि इस तरह जैसे वह वहाँ पहले से मौजूद हो, बस ये है कि आपने संयोग से उसे कविता के बहाने देख लिया है। इस कविता में व्यंग्य भी जहाँ-तहाँ बिखरा पड़ा है लेकिन वह बड़बोला नहीं है, हाँ बोलता जरूर है। इसमें एक कविता है ‘हाँ बोलने के बारे में’, जो दरअसल न बोलने की जरूरत के बारे में है। यही बात इन सारी कविताओं पर भी लागू होती है। यह हाँ के विरुद्ध इनकार की कविता है।

लेखक के सन्दर्भ में...
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमन्त स्मृति सम्मान से पुरस्कृत संजय कुंदन का जन्म , 7 दिसम्बर 1969, पटना (बिहार) में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी साहित्य) पटना विश्वविद्यालय से किया । इनकी प्रकाशित कृतियों में  'कागज के प्रदेश में', 'चुप्पी का शोर' (कविता संग्रह); 'बॉस की पार्टी' (कहानी संग्रह); 'टूटने के बाद' (उपन्यास) सम्मिलित हैं । वर्तमान में दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’, दिल्ली में सहायक सम्पादक हैं ।

मीडिया रिपोर्ट
 25 अगस्त 2012 दैनिक भास्कर, (अखबार) में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा की  लिंक  http://epaper.bhaskar.com/new-delhi/194/25082012/cph/1/  


'योजनाओं का  शहर' (कविता संग्रह) से मोहल्ले में पानी (कविता) समयमान (पत्रिका) के सितम्बर, 2012 का  अंक https://www.facebook.com/photo.php?fbid=4677212571414&set=a.1344581497720.2049315.1326722260&type=1&theater

प्रभात खबर (अख़बार) 30 सितम्बर 2012 http://prabhatkhabar.com/node/213755


अमर उजाला (अख़बार) 7 अक्टूबर  2012 (
इस लिंक के http://epaper.amarujala.com/svww_index.php पृष्ठ संख्या 13 में प्रकाशित समीक्षा )