Tuesday, 7 August 2012

दलित चेतना की पहचान


Book :  Dalit Chetana Ki Pahchan
Editor :  Dr. Suryanarayan Ransubhe
Price : `395(HB)
ISBN : 978-93-5072-247-3
Total Pages : 200
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Dalit Literature
Publication Year: 2012


पुस्तक के सन्दर्भ में डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे के विचार..... 
भारतीय सवर्ण मानसिकता की एक विशेषता यह है कि जो भी दलित या उपेक्षित द्वारा लिखा जाता है, वह स्तरीय नहीं होता  यह निर्णय वे उस रचना को पढ़ने से पूर्व ही ले लेते हैं  । परिणामत: उस रचना की ओर वे पूर्वग्रह दृष्टि से देखने व सोचने लगते हैं । लेखक किस जाति का है, इस आधार पर कृति की श्रेष्ठता या कनिष्ठता निश्चित की जाती है । ऐसे लोगों से साहित्यिक बहस या संवाद हो भी तो कैसे ? विदेश के किसी रचनाकार की किसी निकृष्ट रचना को अगर कोई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार (बुकर आदि ) प्राप्त हो जाए  तो उस निकृष्ट रचना को भी श्रेष्ठ रचना के रूप में पढ़ने की प्रवृत्ति आज भी हममें मौजूद है । हमारे यहाँ अगर किसी सवर्ण की रचना में कुछ अश्लील शब्दों का प्रयोग हो, तो वह जायज है और अगर दलित की रचना में ऐसे शब्द अनायास आ जाएँ, तो अश्लील ! यहाँ निरन्तर दोहरे मानदंडों का प्रयोग किया जाता है । इसी कारण पूरी निष्ठा के साथ हमारे बीच जीने वाले किसी व्यक्ति या समूह के जीवन को पूरी सच्चाई के साथ जब कोई दलित लेखक सशक्त ढंग से व्यक्त करता है, तो भी उसे नकार दिया जाता है  । उस पर बहस भी नहीं की जाती  ।  इस मानसिकता को क्या कहें ?
इस देश में आज भी ज्यादात्तर ऐसे समीक्षक है जो अपनी भाषा में लिखी रचनाओं को लेखक की जाति को ध्यान में रखकर ही परखते  हैं । सामान्य पाठक तो रचना की गुणवत्ता को ही प्रमाण मानकर उसे स्वीकारता अथवा नकारता है । परन्तु जो समीक्षक, परीक्षक निर्णायक हैं अथवा जो तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, वे अभी तक जातिवादी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाए हैं  । प्रादेशिक अथवा राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देनेवाली अथवा पहचान बनानेवाली जितनी भी इकाइयाँ या प्रसार माध्यम हैं, क्या वे व्यक्ति अथवा रचना की ओर प्रदेश, भाषा, जाति, धर्म के परे जाकर देख रहे हैं -आज यही यक्ष प्रश्न हमारे सामने है  जिसे आपके समक्ष पुस्तक 'दलित चेतना की पहचान' के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है 

सम्पादक के सन्दर्भ में.......
डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे का जन्म सन 1942 में हुआ । इनकी प्रकाशित कृतियाँ में,  'कहानीकार कमलेश्वर : सन्दर्भ और प्रकृति', 'आधुनिक मराठी साहित्य का प्रवृत्तिमूलक इतिहास', 'देश-विभाजन और हिन्दी कथा साहित्य', 'डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर (जीवनी)', 'जीवनीपरक साहित्य', 'उन्नीसवीं सदी और हिन्दी साहित्य', 'बीसवीं सदी और हिन्दी साहित्य',  'अनुवाद का समाजशास्त्र', 'दलित साहित्य : संवेदना और स्वरूप', 'पत्रकार : डॉ.भीमराव आम्बेडकर', 'आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास', आदि पुस्तकों के लेखक हैं