Saturday, 28 July 2012

'अभेद आकाश'


'अभेद आकाश' 
मणि कौल से उदयन वाजपेयी की बातचीत 

'अभेद आकाश' मणि कौल और उदयन वाजपयी के बीच वर्षों से चल रहे संवाद का फल है । यह पुस्तक बड़े ही पारम्परिक अर्थ में गुरु शिष्य संवाद है । गुरु शिष्य संवाद ही हमारे देश में सुदीर्घ परम्परा रही है । शिष्य गुरु के सामने प्रश्न करता है, गुरु शिष्य के स्वभाव के अनुकूल उसका उत्तर देता है । यह संवाद गूढ़ कहे जा सकते हैं । क्योंकि इसके सहारे गुरु शिष्य के स्वभाव को उदयन वाजपेयी ने खोलने का प्रयास किया है । 'अभेद आकाश' में उदयन वाजपेयी वाजपेयी कहते हैं कि "पुस्तक में अधिकांश प्रश्न मेरी स्वयं और जगत को, गुरु और ब्रह्माण्ड को जानने की आकांक्षा से उत्पन्न हुए हैं । मणि ने भी उनके उत्तर इस तरह दिए हैं कि मैं अपने प्रश्नों के भीतर सार्वभौमिक जिज्ञासा का आयाम अनुभव कर सकूँ ।" पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है अभेद आकाश।    

Book : Abhed Aakash 
Author :  Udayan Vajpeyi & Mani Kaul
Price : `195(HB)
ISBN : 978-93-5072-302-9

Total Pages : 112
Size (Inches) : 6.50X8.05

Category  : Cinema

पुस्तक के सन्दर्भ में उदयन वाजपेयी के विचार..... 
मणि कौल अपनी हर कृति में सृजन के अनोखे मार्ग खोजते हैं। अपने इन अन्वेषणों पर वे उतने ही निराले ढंग से बात भी करते हैं। अगर आप उन्हें ध्यान से सुनें तो उनकी बातों में उनकी दुर्बोध कही जाने वाली फिल्मों को समझने के सूत्रा मिल जाया करते हैं। उनकी फिल्मों को दुर्बोध कहने का शायद यह आशय है कि उनकी फिल्मों में ऐसा कुछ पाया जाता है जो ग्रहण करना आसान नहीं जान पड़ता। फिल्मों को जिन तरीकों से  देखने की हमारी आदत बन गयी है, मणि की फिल्में देखते समय ये तरीके कारगर सिद्ध नहीं हो पाते। शायद ये फिल्में हमसे फिल्में देखने के नये ढंग की अपेक्षा रखती हैं और मेरा अनुभव है कि अगर हम थोड़े धीरज से उनकी फिल्में  देखें तो ये फिल्में हमें देखने के नये तरीके खुद ही प्रदान करती हैं। दुर्बोध होना कला के लिए नया नहीं है। दुर्बोध कलाकृतियों की एक समृद्ध परम्परा है । हिन्दी के पाठकों में आज बेहद लोकप्रिय कवि निराला को भी दुर्बोध माना जाता था। निराला की जटिल कविताओं को तोड़ मरोड़ कर सरल बनाकर प्रस्तुत करना हिन्दी साहित्य का सबसे प्रिय व्यापार रहा है। हास्यास्पद यह है कि यह व्यापार खुद निराला के समय में भी प्रर्याप्त प्रचलित था।
निराला अपनी कविताओं के दुर्बोध होने को जानते थे और उसके कुपाठ से विचलित भी होते थे इसिलए वे समय-समय पर लिखे अपने पत्रों में स्वयं अपनी कविताओं की समझ के मार्ग खोला करते थे । यह कितना ही करुण क्यों न जान पड़े लेकिन उन पत्रों के बिना निराला को समझना शायद असम्भव है। मणि कौल से यह बातचीत भी उनकी दुर्बोध फिल्मों और दर्शकों के बीच सृजनात्मक सेतु बनाने के उद्देश्य से की गयी है। ज़ाहिर है कि यह किताब उनके लिए है जो फिल्में देखते हैं और उनसे अनुभव की अपेक्षा रखते हैं, नहीं और जिन्हें हॉल से बाहर आने के पहले ही ‘अच्छी है’ या ‘बुरी है’ जैसी बातें आत्म-सन्तोष प्रदान नहीं कर पातीं। इस किताब के पीछे मणि से सालों से चलते अपने संवाद को स्वयं अपने लिए एक बार फिर उपलब्ध कर लेना भी एक कारण रहा है। मेरे जीवन में इस संवाद का ऐसा अनन्य स्थान रहा है जिसे याद करने तक से मुझे सुख होता है। मैं भोपाल में हफ्तों मणि के आने की प्रतीक्षा करता था, आज भी करता हूँ। उनसे बात करना इस बात का सुन्दर उदाहरण है कि जैसे एक कलाकार बात करते समय तक दूसरों को उनके सत्य के करीब छोड़ आता है। ये बातचीत अक्टूबर 1991 में बम्बई में मणि के घर पर ही पाँच या छह हिस्सों में सम्पन्न हुई थी।
उन दिनों मणि ललिता जी (ललिता कृष्ण) के साथ ईडियट का सम्पादन कर रहे थे। टेपरिकार्डर लेकर उनसे बात करना थोड़ा अटपटा जान पड़ता था। लेकिन अनेक मानवेतर वस्तुओं की तरह जल्द ही टेपरिकार्डर अपनी मौजूदगी को छिपा लेता और मणि सहजता से अपने लगावों, विचारों और स्मृतियों में डूब जाते। संगीत, चित्राकला, साहित्य, दर्शन, उनकी बातों में निरन्तर आते रहते हैं। इन सभी पर मणि रसिक ही नहीं, रसज्ञ की तरह विचार करते हैं। सिर्फ विचार के स्तर पर नहीं, उनके कृतित्व में भी अन्य कलाओं से चल रहे संवाद को अनुभव किया जा सकता है। यहाँ फ़िल्म अपना स्थान तमाम पारम्परिक और आधुनिक कलाओं की बिरादरी में बनाती है।  मणि की फिल्में कहीं शास्त्रीय संगीत से, कहीं साहित्य से, कहीं अन्य फिल्मों से, कहीं चित्राकला से संवाद करती चलती हैं। इन अनेक स्तरीय संवादों के सहारे ही वे चुपचाप अपनी परम्परा को टटोलती बल्कि जाग्रत करती हैं। हमें उम्मीद है कि यह किताब मणि की फिल्मों की इन गूढ़ फुसफुसाहटों को समझने में मदद देगी। 
अभेद आकाश मणि की फिल्मों के शायद बुनियादी तत्वों में से एक है। उनकी फिल्मों  और, जैसा कि आप लक्ष्य करेंगे, उनकी बातें स्पेस (आकाश) को विभाजित रूप में नहीं बरतती। उनकी फिल्मों के लिए आकाश का ‘अच्छे-बुरे’ या ‘पवित्रा-अपवित्रा’ में विभाजन झूठ है, मानवीय धारणाओं का स्पेस पर प्रक्षेपण है। इसलिए इन फिल्मों में इस मिथ्या विभाजन का अस्वीकार है। यहीं से ये फिल्मों हर उस व्यक्ति के लिए दुर्बोध होना शुरू हो जाती हैं जिसके लिए वनस्पतियाँ तक नैतिक और अनैतिक के दो कठघरों में कैद हैं और इसलिए जिसका अपने ‘होने’ का अनुभव तक अपने ही बनाये आवरणों के पीछे विलुप्त हो गया है।



मणि कौल
 के सन्दर्भ में...

मणि कौल देश के श्रेष्ठ फिल्मकारों में रहे हैं। उनकी फिल्मों और फिल्म दृष्टि ने भारत के अनेक सृजनशील फिल्मकारों को नयी दिशा दी है। उनका बचपन राजस्थान के कुछ शहरों में बीता। उन्होंने पुणे के भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान में अध्ययन किया। अपनी पहली ही फिल्म ‘उसकी रोटी’ से वे फिल्म दर्शकों और आलोचकों की दृष्टि में गहरे तक पैठ गये। यह पैठ आज तक कायम है। उनकी कुछ और फिल्में हैं: 
आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी, माटी मानस, सिद्धेश्वरी, अहमक (ईडियट),  कश्मीर थ्रू माई आईज़, बादल द्वार (क्लाउड डोर), लाइट एपेरेल, नौकर की कमीज़, और आई एम नो अदर आदि। इनके अलावा भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण छोटी फिल्में बनाईं। उनकी फिल्में दुनिया के सभी जाने माने फिल्म समारोह में ससम्मान दिखायी जाती रही हैं। मणि अद्वितीय धु्रपद गायक और गुरु थे। उन्होंने महान धु्रपद गुरु ज़िया मोहिउद्दीन डागर से वर्षों तक धु्रपद की शिक्षा ग्रहण की। वे वर्षों तक अपने अनेक देशी-विदेशी शिष्यों को धु्रपद की शिक्षा देते रहे। आज मणि के कई शिष्य ध्रुपद गायन कर रहे हैं। मणि कौल भारतीय कलाओं के सम्भवतः श्रेष्ठ समकालीन शास्त्राकार थे। उनके विचारों का कई लेखकों और कलाकारों के कृतित्व पर गहरा असर है। मणि का 6 जुलाई 2011 को कैंसर से जूझते हुए देहावसान हुआ।


उदयन वाजपेयी के सन्दर्भ में...

कवि, कथाकार, निबन्धकार और अनुवादक उदयन वाजपेयी मणि कौल के शिष्य हैं। 
उनके दो कविता संग्रह (‘कुछ वाक्य’ और ‘पागल गणितज्ञ की कविताएँ’), तीन कहानी संग्रह (‘सुदेशना’, ‘दूर देश की गन्ध’ और ‘सातवाँ बटन’), दो निबन्ध संग्रह (‘चरखे पर बढ़त’ और ‘पतझर के पाँव की मेंहदी’), आदिवासी परधान कला पर ‘जनगढ़ कलम’ आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।  इनकी कविताओं के ओड़िया, तमिल, बांग्ला, फ्रांसीसी, पोलिश, स्वीडिश आदि कई भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हैं। इनकी दो पुस्तकें ओड़िया अनुवाद में और एक फ्राँसीसी अनुवाद में प्रकाशित है।  कुमार शहानी की फिल्म ‘चार अध्याय’ और ‘विरह भरयो घर आँगन कोने’ के लिए लेखन किया है । भवभूति के नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ की रंग निर्देशक कावालम नारायण पणिक्कर के लिए हिन्दी में पुनर्रचना । कावालम नारायण पणिक्कर के रंगकर्म पर आधारित पुस्तक ‘थियेटर ऑफ रस’ का सम्पादन। इन दिनों साहित्य, कला और सभ्यता की पत्रिका ‘समास’ का सम्पादन कर रहे हैं

मीडिया रिपोर्ट 

जनसत्ता (अखबार), 23 सितम्बर 2012 (रविवारीय अंक) 
http://epaper.jansatta.com/58402/Jansatta.com/23-September-2012#page/6/2