Friday, 20 July 2012

भ्रष्टाचार और अन्ना आन्दोलन



Book :  Bhrashtachar Aur Anna Aandolan
Editor : Mahashveta Devi & Arun Kumar Tripathi
Publisher : Vani Prakashan

Price : `300(HB)
ISBN : 978-93-5072-245-9

Total Pages : 167
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Social Science
Publication Year : 2012


पुस्तक के सन्दर्भ में....
सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार से कैसे लड़ा जाए ? क्या उसे व्यवस्था के हाल पर छोड़ दिया जाए और यह माना जाए कि लोकतांत्रिक ताकतें और संस्थाएँ उससे एक दिन निपट लेंगी ? या आन्दोलन किया जाए ? आन्दोलन किसके नेतृत्व में चलाया जाए ? राजनीतिक दलों के नेतृत्व में या अराजनीतिक संगठनों के नेतृत्व में ? अगर वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष और दलित, पिछड़ी जातियों के नेतृव वाले दल आन्दोलन न करें तो क्या किया जाए ? क्या साम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी दलों के नेतृत्व में आन्दोलन का समर्थन किया जाए ? गैर-राजनीतिक संगठनों के आन्दोलन की सीमाएँ क्या हैं ? उन्हें कैसे बढ़ाया जाए या उन्हें दरकिनार कर दिया जाए ? क्या भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को नवउदारवादियों का नाटक मानकर उपेक्षित कर दिया जाए ? या उनके भीतर पनप रही व्यवस्था विरोध की चिनगारी को और कैसे आगे बढ़ाया जाए ? क्या उसे एक नैतिक आन्दोलन का रूप दिया जाए या किसी संस्था का निर्माण कर सन्तुष्ट हो लिया जाए ? क्या इसे एकल मुद्दा आन्दोलन मानकर उससे सीमित सफलता की ही उपेक्षा की जाए ? और लोकतांत्रिक आन्दोलन का एक रूप माना जाए ? इन तमाम सवालों का जवाब सीधा नहीं है ।  न ही एकांगी जवाब है । पर इसका उत्तर निष्क्रियता तो कतई नहीं है ।  न ही इसका यह जवाब है कि अगर सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं होती तो इस तरह के आन्दोलनों का कोई मतलब नहीं है । इस अंक के संकलित तमाम लेखों के माध्यम से अन्ना आन्दोलन की रोशनी में भ्रष्टाचार की समस्या पर विचार किया है । वह नवउदारवाद में अंतनिर्हित है पर उसके उजागर होने से वह लांछित और कमजोर होता है ।  यह नवउदारवाद के पतन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हो सकता पर उसकी एक वजह जरूर बन सकता है । 

पुस्तक के अनुक्रम
एक विधेयक से खत्म नहीं होगा भ्रष्टाचार- महाश्वेता देवी
एक आन्दोलन जो मैंने देखा- अमित सिंह
जनता के साथ तो आना ही होगा ! -अमित सिंह
अब तो सारा देश है अन्ना- सत्येन्द्र सिंह
अन्ना आन्दोलन से टूटते मिथक- अमरेश मिश्र
जन आकांक्षाएँ और कांग्रेस की बौखलाहट- प्रभात कुमार राय
नयी करवट और पुरानी राजनीति- राहुल देव
नागरिक समाज : आलतू-फालतू- पुष्पेश पन्त
माहौल बनाए रहिए- अरुण कुमार त्रिपाठी
जनता बनाम संसद की छद्म बहस -रवीन्द्र त्रिपाठी
आत्ममंथन की जरूरत- डॉ सुनीलम
नया जनादेश लेने का समय -कुलदीप नैयर
अन्ना चाहते हैं परिवर्तन -डॉ सुनीलम
अन्ना आन्दोलन का आगा-पीछा -एच.एल. दुसाध
कारपोरेट को बचाने वाली क्रान्ति-सत्येन्द्र सिंह
भ्रष्टाचार विरोध का प्रहसन -प्रेम सिंह
आसमान की ओर एक पत्थर - अनिल सिन्हा
उठाने होंगे अहम मुद्दे - मेधा पाटकर
अतिक्रन्तिकारी और अन्ना आन्दोलन -डी.आर. चौधरी
अन्ना आन्दोलन का भविष्य -डॉ . योगेन्द्र
भ्रष्टाचार का इलाज समता -डॉ. ए.के. अरुण
भारतीय राष्ट्र का सहोदर है भ्रष्टाचार - कृष्णकांत
विज्ञान जगत के भ्रष्टाचार - यादवेन्द्र पाण्डेय
घोटाले और राजनीति - सुनील
काली अर्थव्यवस्था और याराना पूँजीवाद :
नवउदारवाद के अन्तरंग दुष्फल - कमल नयन काबरा
काली अर्थव्यवस्था : दलदल में फँसा विकास - अरुण कुमार और अरुण कुमार त्रिपाठी
भारत और भ्रष्टाचार - सच्चिदानंद सिन्हा
नये बौद्धिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समूह की दरकार- किशन पटनायक


सम्पादकों के सन्दर्भ में.....

महाश्वेता देवी 
पद्मश्री, साहित्य अकादमी, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926, ढाका में हुआ । वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं । उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रमाणिकता के साथ उभारा है उन्होंने शोषण के विरुद्ध बार-बार आवाज़ बुलन्द की है । 

अरुण कुमार त्रिपाठी अरुण कुमार त्रिपाठी का जन्म 9 अक्टूबर, 1961 बस्ती (उत्तर प्रदेश) के एक किसान परिवार में हुआ लखनऊ विश्वविद्यालय से एल-एल.एम. की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मानवाधिकार, दलित, स्त्री, पर्यावरण और आदिवासी आन्दोलनों से गहरा नाता । 'जनसत्ता' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक दशक तक पत्रकारिता करने के बाद 'हिन्दुस्तान' अखबार में संयुक्त सम्पादक और 'आज समाज' में सम्पादक (विकास) रहे । आजकल स्वतन्त्र लेखन में कार्यरत । वाणी प्रकाशन की 'आज के प्रश्न' श्रृंखला में नियमित लेखन । प्रकाशित कृतियाँ -'कल्याण सिंह', 'मेधा पाटकर' और 'कट्टरता के दौर में'