Monday, 9 July 2012

वाणी प्रकाशन समाचार, जुलाई 2012























प्यारी ऑन्ना



प्यारी ऑन्ना
(कोस्तोलान्यी दैश्ज़ो के मूल हंगारी उपन्यास 'एदैशा
ऑन्ना' का अनुवाद) 

Book :  Pyaaree Anna (Hangarian Novel Edes Anna)
Author :  Kosztolanyi Dezso
Translator  :   Indu Mazaldan
Price : 
`375(HB)
ISBN : 978-93-5000-753-2
Total Pages : 204
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में......

ऑन्ना एदैश की कहानी एक मासूम लड़की के शोषण की कहानी है । कहानी की नायिका का पारिवारिक नाम एदैश है । वह एक ईमानदार, मेहनती और सीधी-सादी ग्रामीण लड़की है वह एक मध्यम वर्गीय परिवार में घरेलू नौकरी के लिए आती है, जो परिवार प्रथम विश्व युद्ध में हार और सामाजिक क्रान्ति वाले ऐतिहासिक घचकों से अभी बहार निकला है । तीसरा बड़ा धक्का, हंगरी के दो तिहाई भाग को, ट्रायनौन की सन्धि के अन्तर्गत दूसरे देशों में बाँट दिया जाना, अभी बाकी है । हंगरी प्रथम विश्व युद्ध में, ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य के भाग की तरह उतरा था । इस साम्राज्य की हार के बाद सभी छोटे-छोटे देश आज़ादी की मांग करने लगे थे । पहली क्रान्ति अक्टूबर 1918 में हुई थी, जिसके बाद काउंट मिहाय कारोय की सोशलिस्ट सरकार बनी, जिसने हंगरी को गणतन्त्र घोषित कर दिया पर बाहरी दबाव काफी था ।  रोमानियन फ़ौजें हंगरी में घुसने का प्रयास करने लगीं और 1919 मार्च में कारोय का स्थान बेंला कुन ने ले लिया,जो एक बोल्शविक था और जिसे रूसी सरकार का समर्थन था ।  उसके घोर अत्याचार से लाल आतंक चारों ओर छाया हुआ था ।  ज़मीन लोगों से ज़बरदस्ती ज़ब्त किये जाने लगी थी ।  अगस्त 1919 तक इसका भी अन्त हो गया और रोमानियन फ़ौजें  आखिर हंगरी में प्रवेश कर ही गयीं । प्रस्तुत उपन्यास बेला कुन के पलायन से आरम्भ होता है और रोमानियन फ़ौजों का देश में आगमन दिखता है । उपन्यास का अन्त ट्रायनॉन सन्धि से थोड़ा ही पहले होता है जब कोस्तोलान्यी दैश्ज़ों का स्वयं का जन्म-स्थान भी युगोस्लाविया के पास चला गया था । परन्तु उपन्यास इन सब राजनीतिक घटनाओं के बारे में नहीं है । ऐतिहासिक परिस्थितियों का ज़िक्र अवश्य है पर कहानी सामाजिक विडम्बनों पर आधारित है  एडमिरल होर्थी का बड़े बैण्ड बाजे के साथ बुदापैश्त में आने का केवल दृश्य मात्र है, होर्थी जो द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त के हंगरी की बागडोर सँभाले था और जिसने 'लाल आतंक' के जवाब में 'सफेद आतंक' को जन्म दिया था, उस दौर को यहाँ सिर्फ स्पर्श किया गया है  इन परिस्थियों के कारण लोगों की जो मन: स्थिति हो गयी थी, जो खालीपन और वहशीपन उनमें आ गया था  ।  इसकी झलक जरूर उपन्यास में दिखाई देती है।  अनुवाद में कुछ शब्द हंगरी भाषा में ही रहने दिये हैं । जैसे 'वरोश' का अर्थ शहर या डिस्ट्रिक होता है, 'ऊत' सड़क और 'ऊत्सा' गली को कहते हैं । 'करुत' का आशय रिंग रोड है । दो डिस्ट्रिक, जिनका ख़ास तौर पर ज़िक्र हुआ है, वे बुदा में हैं (दूना नदी बुदापैश्त को दो भागों में बाँटती है, पहाड़ी भाग बुदा है और समतल भाग पैश्त) पहला 'वार' यानी महल के आसपास का इलाका जहाँ अधिकतर ऑफिस भी हैं और दूसरा क्रिस्टीना डिस्ट्रिक जिसमें 'वेरमैज़ो' का मैदान भी है (शाब्दिक अर्थ 'खून का मैदान')  कहा जाता है  1795 में यहाँ जेकोबाइट क्रान्तिकारियों को गोली मार दी गयी थी
                                                           
लेखक के सन्दर्भ में.......
कोस्तोलान्यी दैश्ज़ो का जन्म 29 मार्च 1885 में सौबॉद्का नामक शहर में हुआ था
और यही से उन्होंने प्राथमिक और हाई स्कूल की पढ़ाई की बचपन से अकसर बीमार रहने वाले देश्ज़ों पर सबसे अधिक प्रभाव उनके दादा का पड़ा । 1848-49 स्वाधीनता संग्राम की कहानियाँ दैश्ज़ों ने अपने दादा से प्राप्त की । दैश्ज़ों प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे, जब वह 16 वर्ष के थे 'बुदापैश्त नौपलो' में इनकी पहली कविता छपी । सन 1903 में हंगारी की विख्यात 'न्यूगौत' पत्रिका से जुड़ गये । 1910 में 'एक गरीब बच्चे की शिकायतें' पुस्तक प्रकशित हुई जिसको इतनी अधिक सफलता मिली कि 1923  तक इसके छह संस्करण प्रकाशित हो चुके थे । इनकी प्रमुख कृतियों में 'ताश', 'मागिया', 'चेन चेन एस्तैर की चेन', 'चिराग', 'मेरा छोटा भाई', 'स्याही' और 'आकर्षक लोग', 'केन' , 'मोर' , 'बेकार डॉक्टर' ,'नीरो एक खूनी कवि' , 'चकोरी', 'सोने की पतंग' और 'प्यारी ऑन्ना सम्मिलित है । 3 नवम्बर 1936 में इनका देहान्त हो गया

अनुवादक के सन्दर्भ में.....
इन्दु मज़लदान माता सुन्दरी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ) अंग्रेजी विभाग में रीडर हैं
। इन्होंने हंगारी भाषा और साहित्य का काफी अध्ययन किया है । इनकी सात पुस्तकें हंगारी से हिन्दी में प्रकाशित हो चुकी हैं । जिसमें 'प्रेम राग' (हंगारी प्रेम-कविता संकलन), 'वित्त-मन्त्री का नाश्ता' (हंगारी कहानी संग्रह), शान्दोर मारॉई का उपन्यास 'शमाएँ ख़ाक होने तक सुलगती हैं', आदि  । जनवरी 2010  में इंदु  मज़दान को हंगारी के सर्वश्रेष्ठ सिविलियन ऑनर 'प्रो. कुल्तुरा हुंगारिका' से हंगारी सरकार ने अलंकृत किया था