Saturday, 7 July 2012

प्रतिरोध की संस्कृति'




मानवीय समाज यूँ तो सामंजस्य पर टिका होता है किन्तु प्रतिरोध उसका एक महत्त्वपूर्ण वैयक्तिक एवं सामाजिक भाव होता है । दमित समूह, समुदाय  एवं संस्कृतियाँ अपने ऊपर सतत हो रहे दमन के विरुद्ध प्रतिरोध कर रही होती हैं । यह प्रतिरोध कई बार उनकी स्वत: स्फूर्ति अभिव्यक्ति होती है और कई बार स्त्रातजिक । लेकिन दोनों ही रूपों में ये प्रतिरोध का भाव उनके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक प्रारूपों में अभिव्यक्त हो रहे होते हैं । यह पुस्तक भारतीय समाज के विभिन्न अधीनस्थ एवं प्रताड़ित समूहों के प्रतिरोध का विवेचन करती है हालाँकि यह पिछले 10 -15  वर्षों  में  लेखक के लिखे लेखों का संग्रह है । इस पुस्तक में साहित्यिक कलारूपों में निहित प्रतिरोध के कई भावों की विवेचना की गयी है । इसमें अनके साहित्यिक मुद्दों एवं साहित्य से जुड़े विमर्शों को शामिल किया गया है । आशा के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है 'प्रतिरोध की संस्कृति'
Book : Pratirodh Ki Sanskriti
Author : Badri Narain

Publisher : Vani Prakashan
Price : `250(HB)  
ISBN : 978-93-5072-206-0
Total Pages : 104
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Social Studies

पुस्तक के सन्दर्भ बद्री नारायण के विचार......

1980 के बाद भारतीय समाज में व्यापक परिवर्तन हुए हैं । सोवियत रूस का पतन, नयी आर्थिक व्यवस्था के तहत बाजार का विस्तार, भूमण्डलीकारण की प्रक्रिया, कम्प्यूटर एवं कॉरपोरेट के अनन्त विस्तार आदि ने पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी एक नया समाज गढ़ने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है । मेट्रोपोल, शहर, कस्बा एवं सस्ते पाइरेटेड सी.डी. ने एक 'मेट्रोपोल पब्लिक संस्कृति' का विस्तार किया है ।बैलगाड़ी, ऊँट के साथ-साथ मेट्रो एवं लो-फ्लोर बसों से बनते भारत पर कोई मुग्ध हो सकता है पर इसने हमारे समाज में अमीरी-गरीबी, नगरीय एवं ग्रामीण, मेट्रोपोल एवं टाउन के फर्क को न केवल नए सन्दर्भों में पुन: रचित किया जा रहा है बल्कि इनके फर्क को अत्यन्त तीखा कर दिया है । किन्तु दुखद यह है कि यह फर्क साहित्य, सांस्कृतिक  विमर्श एवं राजनीति में न ठीक से रेखांकित किया जा रहा है और न ही इसके अहसास से उपजी रचनात्मकता एक वैकल्पिक प्रतिरोध को सृजित करने की दिशा में बढ़ पा रही है । सबसे चिन्ताजनक यह है कि सामाजिक परिवर्तन की राजनीति करने वाली शक्तियाँ बढ़ती गरीबी एवं सामाजिक अन्याय के विस्तृत होते अमानवीय संसार के खिलाफ कोई लोकप्रिय राजनीति विकसित नहीं कर पा रही हैं। एन. जी. ओ. नुमा राजनीति एवं वैचारिक विमर्श नये शक्ति केन्द्रों के  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एवं इस बढ़ती खाई को द्विध्रुवियाताओं के नकार, अन्त: संवादीपन की तलाश, प्रितिरोधविहीन अस्मिताओं का सामंजस्य जैसे पदों से भारत जैसे देश में अभिजात्य, कॉरपोरेट एवं धनिकों की संस्कृति एवं साहित्य में मानवीय चेहरा एवं संवादी स्वर खोजने की कोशिश कर रही है । ऐसी विचार. व्याख्या एवं राजनीति एक ही साथ कई जगहों पर भूमण्डलीकृत नागरिक चेतना के साथ-साथ फैनेटिक राष्ट्रवादी चेतना के रूप में भी अवतरित हो रही है ।  ये प्रक्रियाएँ केवल समाज, राजनीति एवं आर्थिक जगत में ही नहीं चल हैं बल्कि साहित्य एवं संस्कृति की दुनिया में भी हरेक स्तर पर शक्ति संरचनाओं के अनेक रूपों का सृजन कर रही हैं । भौगोलिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केन्द्रों की वासी ये शक्ति संरचनाएँ साहित्य एवं संस्कृति की दुनिया में 'पैट्रोंन' एवं 'पेट्रेनाइज्ड' के नये रूप  उत्पादित कर रही हैं । इन सबने मिलकर साहित्य एवं संस्कृति के विचार एवं व्याख्या की दुनिया में नये संकट पैदा किये हैं    



लेखक के संदर्भ में......
भारत भूषण पुरस्कार, बनारसी प्रसाद भोजपुर सम्मान एवं 'केदार' सम्मान, कविता संकलन, स्पन्दन कृति सम्मान, बिहार सरकार राजभाषा विभाग की ओर से राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान और कविता के लिए प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से सम्मानित  बद्री नारायण का जन्म 1965  भोजपुर (बिहार) में हुआ । यू.जी.सी., आई.सी. एस.एस. आर., आई.सी. एच. आर., इंडियन इंस्टीयूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला, इंटरनेशनल इंस्टीयूट ऑफ़ एशियन स्टडीज, लाइडेन यूनिवर्सिटी , द नीदरलैंड, मैसौन द साइंसेज द ला होम, पेरिस, फुलब्राइट एवं स्मट्स के फैलो रहे हैं । वर्तमान में यह गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के सेन्टर फॉर कल्चर, पॉवर एंड चेंज में सामाजिक इतिहास/ सांस्कृतिक नृतत्वशास्त्र विषय के प्रोफेसर हैं । गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के मानव विकास संग्रहालय एवं दलित रिसोर्स सेन्टर के प्रभारी हैं ।