Saturday, 23 June 2012

एम. एफ. हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी



'एम. एफ. हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी' 
हुसेन साहब ने अपनी माँ  को नहीं देखा था, हुसेन अपनी माँ की शक्ल को खोजते थे ।  वह स्त्री के अन्दर माँ के स्नेह को खोजते थे और सोचते थे कि क्या मेरी माँ ऐसी ही थी । एक बच्चे को प्यार-दुलार, ममता माँ के अलावा कोई नहीं दे सकता । हुसेन साहब ने उसे यूँ व्यक्त किया है - मक़बूल की माँ क्यों अपनी कोई निशानी नहीं छोड़ गयी ? क्या बेटे को इस दुनिया में छोड़ जाना ही काफी समझा ? क्यों बाप के जूतों में खड़ा कर उसे आँसू भरी आँखों से देखा करती ? कितनी तमन्नाएँ होंगी ? सब अपने साथ ले गयी । हुसेन साहब को कोई मराठी साड़ी इधर उधर पड़ी नज़र आये, तो उसकी हज़ारों तहों में माँ को ढूँढने लगते ।  वह ढूँढने थे माँ का चेहरा, जिसकी दो आँखों में न मालूम कितने ख़्वाब डूबे  । ढूँढते थे वह साँस जिसमें बच्चे के सारे बदन की भीनी खुशबू खिंच  कर कलेजे के अन्दर समा गयी और बाहर न निकल सकी ।  कहाँ हैं वह होंठ ? वह माँ की मोहब्बत का ज्वालामुखी ? वह ममता के जिस्म के हर पोर से उबलता बेपनाह प्यार का लावा, उनकी अंदरूनी कराहती चिंगारी दरबदर मारी मारी फिरती थी दुनिया का कोना कोना छान मारा, जंगल बयाबाँ  के नक्श को कुरेदा ।   
 
Book : M. F. Husain Ki Kahani Apani Zubani  
Author  : M. F. Husain
Distributor : Vani Prakashan
Published by : M.F. Husain Foundation 
Price : `395(PB)
Total Pages : 267
Size (Inches) : 9.28X7.25
Category  : Autobiography


पुस्तक के सन्दर्भ में.......
जब हम एक लेखक की 'आत्मकथा' पढ़ते हैं, तो वह उन्हीं शब्दों के माध्यम से अपनी कहानी कहता है जो उसने अपनी कविताओं, उपन्यासों में प्रयोग किये थे किन्तु जब एक चित्रकार या संगीतकार अपने जीवन के बारे में कुछ कहता है तो उसे अपनी 'सृजन भाषा' से नीचे उतर कर एक ऐसी भाषा का आश्रय लेना पड़ता है, जो एक दूसरी दुनिया में बोली जाती है, उससे बहुत अलग और दूर, जिसमें उसकी 'कालात्मा' अपने को व्यक्त करती है । वह एक ऐसी दुनिया है, जहाँ वह है भी और नहीं भी, उसे अपनी नहीं अनुवाद की भाषा में बात कहनी पड़ती है । हम शब्दों की खिड़की से एक ऐसी दुनिया की झलक पाते हैं , जो 'शब्दातीत' है -जो बिम्बों, सुरों, रंगों के भीतर संचारित होती है । हम पहली बार उनके भीतर उस 'मौन' को मूर्तिमान होते देखते हैं, जो लेखक अपने शब्दों के बीच खाली छोड़ जाता है । हुसेन की आत्मकथा की यह अनोखी और अद्भूत विशेषता है, कि वह अनुवाद की बैसाखी से नहीं सीधे चित्रकला की शर्तों पर, बिम्बों के माध्यम से अपनी भाषा को रूपान्तरित करती है । ऐसा वह इसलिए कर पाती है, क्योंकि उसमें चित्रकार हुसेन उस 'दूसरे ' से अपना अलगाव और दूरी बनाये रखते हैं, जिसका नाम मकबूल है, जिसकी जीवन-कथा वह बाँचते हैं, जिसने जन्म लेते ही अपनी माँ को खो दिया, जो इन्दौर के गली-कूचों में अपना बचपन  गुजारता है, बम्बई के चौराहों पर फिल्मी सितारों के होर्डिग बनाता है, कितनी बार प्रेम में डूबता है, उबरता है, उबार कर जो बाहर उजाले में लाता है उनकी तस्वीरें बनाता है धूल धूसरित असंख्य ब्योरे, जिनके भीतर के एक लड़के  की झोली, बेडौल, नि श्छल छवि धीरे धीरे 'एम. एफ. हुसेन, की प्रतिमा में परिणत होती है
हुसेन की आत्मकथा अपनी प्राणवत्ता छोटे-छोटे ब्योरों, तफसीलों में ग्रहण करती है ।  ज़रा देखिये उसकी शुरुआत, जैसे आप शब्दों के भीतर से फ़िल्म का कोई सीन देख रहे हों । 
'मिट्टी का घड़ा, चारपाई पर रखा, 
छत से लटकती लालटेन खामोश । 
तकिए के नीचे किताब का चौदहवां पन्ना खुला,
टीन के संदूक में बेजोड़ कपड़े ....
गर्द के मैले रंग की नीली कमीज़, साइकिल के टूटी चेन
मलमल का नारंगी दुपट्टा, बाँस की बांसुरी
गुलाबी पतंग के कागज़ की पुड़िया में अंगूठी

बचपन  की यह कच्ची स्मृतियाँ समय के साथ पकती जाती हैं और मुद्दत बाद यह लालटेन, यह घड़ा, मलमल का दुपट्टा आपको कभी हुसेन की किसी फिल्मी किसी पेंटिंग, किसी कविता के भीतर दुबके दिखाई दे जाते हैं ।  ज़िन्दगी के प्रवाह में बहता हुआ कोई अदना- सा टुकड़ा, कोई भूला हुआ शब्द, कोई भोला-सा चेहरा विस्मृति के अँधेरे  में गायब नहीं होता, बरसों बाद खोये हुए मुसाफिर की तरह लौटकर हुसेन की वर्कशॉप में आश्रय पा ही लेता था ।  हुसेन की 'आत्मकथा' अन्य चित्रकारों के पन्नो, डायरी, जर्नल्स से इतनी अलग दिखाई देती है, वह सीधे-सीधे अपने चित्रों के बारे में कुछ नहीं कहती वह उनके जीवन में होने वाली घटनाओं, सुदूर देशों की यात्राओं, खूबसूरत अविस्मरणीय लोगों की स्मृतियों और सबसे ज्यादा खुद अपने भीतर की भूलभुलैयों में भटकने का लेखा-जोखा है । 

लेखक के सन्दर्भ में.....
पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण सम्मानों से अलंकृत   प्रख्यात चित्रकार एम. एफ. हुसेन का जन्म 17 सितम्बर 1915, पंढरपुर, महाराष्ट्र के एक तीर्थ स्थान में हुआ था । जब वह एक वर्ष के थे, जब उनकी माता जैनब का देहांत हो गया । उनकी माता ने न कभी कोई तस्वीर खिंचवाई थी न कोई आकृति हुसेन को याद, वह हुसेन जिन्होंने कितने ही चेहरों को अमर बना दिया । यह कमी हुसेन ने अपनी सारी जिंदगी महसूस की । हुसेन के दादा ने उनकी परवरिश की । पंढरपुर छोड़ कर वह इन्दौर चले गये जहाँ हुसेन के पिता फिदा हुसेन को नौकरी मिली थी और यही से शुरू हुआ मक़बूल फिदा हुसेन का सफर ।  9 जून  2011 को  इनका  देहांत  हो  गया  ।