Tuesday, 19 June 2012

'बुनियाद'




वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारतीय टेलीविजन इतिहास का मील स्तम्भ 'बुनियाद' । 'बुनियाद' डेढ़ सौ से भी ज्यादा कड़ियों तक चलने वाला लोकप्रिय धारावाहिक रहा है । इसकी लोकप्रियता को देखते हुए वाणी प्रकाशन ने इसे 'बुनियाद' और   'बुनियाद II' एवं 'बुनियाद III, के रूप में प्रकाशित किया है । पाठकों  के समक्ष 'बुनियाद' पुस्तक की शक्ल में प्रस्तुत है ।    

'दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में 'बुनियाद' को देश के लाखों-करोड़ों दर्शकों ने देखा और सराहा । उसकी  इस सफलता को लेकर मेरी  खुशी स्वाभाविक है, खासकर इसलिए भी कि इसके माध्यम से मैंने जो कहा, लोगों ने उसे पूरे मन से सुना समझा । लेकिन 'बुनियाद' पर काम करते हुए जिन मित्रों का सहयोग मिलता रहा, वह न मिलता तो ऐसी सफलता संदिग्ध थी । खासतौर से लेखन-कार्य में सलाहकार रहीं सुप्रसिद्ध कथाकार कृष्णा सोबती तथा शोध-कार्य के लिए डॉ. पुष्पेश पन्त के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ ।  दृश्यालेख को पुस्तक-रूप देने में श्री भूपेन्द्र अबोध ने जो कार्य किया उसके लिए मैं उनका भी आभारी हूँ ।'  - मनोहर श्याम जोशी( The  Father fo Indian Television soap opera)

Book : Buniyaad ( Total 3 Parts)
Author Manohar Shyam Joshi 

Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 848
Size (Inches) : 
5.75X8.75
Category  : Novel

S.No.
Books
ISBN
Price `
1.
Buniyad
81-8143-671-7
300
2.
Buniyad-II
978-93-5000-956-7
395
3.
Buniyad -III
978-93-5000-957-4
395

पुस्तक के सन्दर्भ में जी.पी.सिप्पी (बुनियाद के निर्माता) के विचार....
" 'बुनियाद' की कहानी एक परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी है । एक ऐसा परिवार, जो विभाजन के समय लाहौर में भड़क उठे दंगों की तबाही में उजड़ने-बिखरने के बाद, पाँच दशकों तक समय के थपेड़ों का मुकाबला कर आज फिर से खुशहाली की मंजिल तक पहुँचा है ।  जब 'हमलोग' बन रहा था, तब एक बार मनोहर श्याम जोशी से मुलाक़ात हुई थी । बड़े क़ाबिल और पढ़े-लिखे आदमी लगे । जब 'बुनियाद' की बात आई तो सबसे पहले उन्हीं का ख्याल आया ।"

पुस्तक के संदर्भ में प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार सुधीश पचौरी के विचार......
"अपने तमाम फ़िल्मी लटकों-झटकों के बावजूद हमारे लाख नाक-भौं सिकोड़ने के बावजूद जिस निरन्तरता से 'बुनियाद' ने एक-से -एक चरित्र हमें दिए, वैसे दूरदर्शन ने अब तक के इतिहास में न दिए होंगे । हवेलीराम का दृढ़ आदर्शवाद, लाजो का धरती जैसा 'माँ' - रूप और विभाजन की विभीषिका को पृष्ठभूमि  बनाकर चलती हुई कहानी, तमाम उत्तर भारत के आधुनिक मध्यवर्ग की नींव की तरह हमें छूती रही ।  अगर दूरदर्शन वाले इस सीरियल से मनमानी छेड़छाड़ न करते और जोशी-सिप्पी को थोड़ी अधिक आजादी देते तो यह आज़ादी के बाद के परिवार का और इस तरह समाज का राजनीतिक-सांस्कृतिक अध्ययन बन गया होता । फिर भी, इतने दबावों, आपाधापी और सेसरों के बाद, 'बुनियाद'  सीरियलों के इतिहास में एक निशान छोड़ने वाला है ।"

पुस्तक के संदर्भ में प्रभात रंजन के विचार.....
" 'बुनियाद' अगर सीधे शब्दों में कहें तो हिन्दुस्तान की आज़ादी के साथ हुए बँटवारे में सरहद के इस पार आ गये लोगों की दास्तान है - उनकी 'बुनियाद' की यादगार, लेकिन दारुण गाथा । 'बुनियाद' इतिहास नहीं है, न ही उसका वैसा दावा रहा, बल्कि वह स्मृति के सहारे रची गयी कथा है । स्मृति, जो सामूहिक है - सरहद के इस और उस पार । उसकी इसी सामूहिकता ने उसे बेजोड़ बनाया और ऐतिहासिक भी । 'बुनियाद' का ताना-बाना भले ही इतिहास से जुड़ी स्मृतियों के सहारे बुना गया है, लेकिन उसकी सफलता का भी इतिहास बना।
'बुनियाद' डेढ़ सौ से भी ज्यादा कड़ियों तक चला और अपने समय में सबसे ज्यादा दिनों तक सफलतापूर्वक चलने वाला धारवाहिक था । वे भारत में टेलीविजन की लोकप्रियता के शुरूआती दिन थे । तब भारत में टेलीविजन और दूरदर्शन एक-दूसरे के पर्याय समझे जाते थे । ऐसे बहुतेरे लोग मिल जाएँगे, जो यह कहते पाये जा सकते हैं कि उन्होंने 'बुनियाद' देखने के लिए ही टेलीविजन ख़रीदा । 'बुनियाद' इस कारण भी याद रहता है कि उसकी पारिवारिकता, प्रसंगों की मौलिकता और समकालीनता ने कैसे उसके किरदारों को घर-घर सदस्य बना दिया था । मास्टरजी, लाजोपी, वृषभान, वीरांवाली जैसे पात्र लोगों की आपसी बातचीत का हिस्सा बनकर 'टेलीविजन दिनों' के आमद की सूचना देने लगे थे । 'उजड़े' हुए परिवारों के 'आबाद' कहानी के रूप में जिस तरह इस कथा का ताना-बना बुना गया था, उसमें लेखकीय स्पर्श काफी मुखर था । इसी धारावाहिक के बाद इस तरह की चर्चा होने लगी थी कि टेलीविजन लेखकों को अपनी अभिव्यक्ति का पर्याप्त मौका देता है, कि यह लेखकों का माध्यम है ।
मनोहर श्याम जोशी टेलीविजन के पहले सफल लेखक थे । ऐसे लेखक जिनके नाम पर दर्शक धारावाहिक देखते थे ।  उस तरह से वे आखिरी भी रहे ।  टेलीविजन-धारावाहिकों ने लेखकों को मालामाल चाहे जितना किया हो, उन्हें पहचानविहीन बना दिया । मनोहर श्याम जोशी के दौर में कम-से कम उनके लिखे धारावाहिकों को लेखक के नाम से जाना जाता रहा । 'बुनियाद' उसका सफलतम गवाह है । टेलीविजन धारावाहिक के पात्रों से दर्शकों का अद्भूत तादात्म्य स्थापित हुआ । 'हमलोग' की बड़की को शादी के ढेरों बधाई तार मिले थे , तो बुनियाद के दौरान लाहौर में लोगों ने यह अनुभव किया कि हमारा पड़ोसी हिन्दू परिवार लौट आया है ।"

लेखक के सन्दर्भ में.......
भारतीय सोप ओपेरा के जनक मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को अजमेर (राजस्थान) में हुआ था । लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक हुए। वहीं से 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये थे। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद इन्हें प्राप्त हुआ । प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फिल्म विज्ञापन- सम्प्रेषण सभी के लिए सफलता पूर्वक कार्य किया

केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन 1967 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने । टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतन्त्र  लेखन किया। इन्होंने हम लोग के अलावा 'बुनियाद', 'हमराही' ,'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' व 'जमीन-आसमान' जैसे चर्चित धारावाहिकों के साथ उन्होंने 'हे राम', 'पापा कहते हैं' ,'भ्रष्टाचार' आदि अनेक फिल्मों की भी पटकथाएँ लिखीं।  'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें वर्ष 2005  में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।  30  मार्च 2006 को उनका निधन हो गया ।