Saturday, 16 June 2012

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक और हिन्दी कहानी



'युवा पीढ़ी जो अपनी तरह से कहानी में प्रयोग कर रही है, भाषा को नयी अर्थवत्ता दे रही है । लेकिन एक जिम्मेदारी थी कि बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में सोवियत संघ के विघटन, उदारीकरण के आगमन तथा साम्प्रदायिक ताकतों के सत्ता में आने के बाद के समाज तथा उसकी युवा पीढ़ी के सपनों को वे किस रूप में आँकना चाहते हैं । बहुत कम युवा कहानीकारों के पास राजनीतिक दृष्टि है । अधिकांश कहानीकार अपने अनुभव जगत को भाषा या शिल्प के चमत्कार के साथ रूपायित कर रहे हैं।  इस युवा पीढ़ी के पास बहुत अच्छी और टटकी भाषा है पर भाषा का नयापन वैचारिक दृष्टि के अभाव में बहुत देर तक साथ नहीं देता । इस पीढ़ी पर यह आरोप कुछ हद तक सही है कि वैचारिकता के अभाव में इन्होंने कहानियों को अपनी जिद्द  के साथ लिखना आरम्भ किया इसलिए बहुत कम कहानियाँ लिखने के बाद रिक्तता का अनुभव स्वयं को होने लगा।  
पालीवाल कहते हैं कि मेरे सामने पत्रिका, उसके सम्पादक तथा कुछ विशिष्ट ख्याति प्राप्त कहानीकारों की सूची थी।  जिसे मैंने धैर्य के साथ पढ़ना प्रारम्भ किया । कुछ चर्चित कहानियों को पढ़ने पर मुझे उनमें चमत्कार के अलावा और कुछ नहीं दिखा। इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक की बीस कहानियों का चयन मात्र नहीं है । सम्भव है कि कई अच्छी कहानियाँ मेरे ध्यान में नहीं आयी हों लेकिन यह सच है कि जानबूझकर मैंने उन्हें नहीं छोड़ा। मैंने विशेषांकों, संकलनों, संग्रहों तथा पत्रिकाओं का नये अंकों में प्रकाशित कहानियों को अपनी तरह पढ़ा है ।  पढ़ते समय मेरे सामने पत्रिका या सम्पादक या कहानीकार का बहुत चर्चित होना या किसी का चहेता होना या न होना कोई मायने नहीं रख पाया ।  मेरे सामने केवल कहानी थी जिसे मैं जैसा समझ पाया उस पर लिखा जो आपके सामने है ।'-सूरज पालीवाल 

Book : Ikkisavi Sadi Ka Pahala Dashak Aur Hindi Kahani

Author : Suraj Paliwal
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `295(HB)  
ISBN : 978-93-5000-902-4
Total Pages : 164
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में....

आलोचना में समय को खोज और उतार पाना आसान काम नहीं होता। समय की प्रवृत्तियाँ इतनी व्यापक बहुविध और उलझी हुई होती हैं कि उसके भीतर से सिरे को पकड़कर उसकी गुत्थियों को सुलझा पाना अच्छों-अच्छों की साँस को फुला देता है, जिससे घबराकर लोग तुरन्त जरूरी सवालों को छोड़कर अपने 'कला राग' पर लौट आते हैं । सूरज पालीवाल के आलोचना की यह खासियत रही है कि वे अपने विश्लेषणात्मक और विचारपूर्ण गद्य लेखन में अपने समय के जरूरी और केन्द्रीय सवालों से मुँह नहीं मोड़ते । वे उनसे सीधे-सीधे भिड़ते हैं । समय की चुनौतियों को वे अखाड़े में द्वन्द्व के लिए तैयार पहलवान की तरह स्वीकार करते हैं । अपने समय की शिनाख्त करते हुए सूरज पालीवाल अपनी नजर भविष्य पर रखते हैं और वर्तमान को केंन्द्र में रखते हुए जरूरत पड़ने पर पीछे लौटने में भी कोई गुरेज नहीं करते । इस तरह उनकी आलोचना में समय अपनी समग्रता में आता है यद्यपि उसका केन्द्र वर्तमान ही रहता है । इसी तरह उनकी कथा साहित्य-विवेचना का देश, सामान्यतया हिन्दी प्रदेश रहता है किन्तु प्रसंग की जरूरत के अनुसार वे हिन्दीतर भारतीय साहित्य और विदेशी रचना संसार को सन्दर्भबद्ध करने से भी नहीं चूकते । 

लेखक के सन्दर्भ में....
डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना, पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार, प्रेमचन्द सम्मान आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत   सूरज पालीवाल का जन्म गाँव बरौठ, जिला मथुरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ । प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से प्राप्त की । दस वर्षों तक 'वर्तमान साहित्य' के सम्पादक मण्डल में तथा 'इरावती' के प्रधान सम्पादक रहे। 'स्वाधीन भारत के हिन्दी उपन्यासों में जातीय उभार के सामाजिक-राजनीतिक कारण' यू.जी.सी. की बृहत् शोध । वर्तमान में यह साहित्य विद्यापीठ, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा में अध्यक्ष एवं अधिष्ठाता हैं ।