Wednesday, 13 June 2012

पाकिस्तान डायरी




कहते हैं, दुःख मेरे हों या तेरे दुःख की भाषा एक है। आँसू तेरे हों या मेरे आँसू की परिभाषा एक है । इसी को एक रूप देते हुए वाणी प्रकाशन ने ज़ाहिदा हिना द्वारा लिखित पुस्तक 'पाकिस्तान डायरी' प्रकाशित की है । इसमें उन करोड़ों लोगों की बात है जो एक-दूसरे के सुख-दु:ख को समझना चाहते हैं । जिनके रिश्ते एक-दूसरे से हैं देश बँट गया पर उनके रस्म-ओ-रिवाज़ का आज तक बँटवारा न कर सका है । पाकिस्तान डायरी वैसे तो दैनिक भास्कर, अखबार में छपती ही है । आपके समक्ष किताब की शक्ल में प्रस्तुत है ।             

Book : Pakistan Diary
Author : Zahida Hina
Publisher : Vani Prakashan
Price : `395(HB) 
ISBN : 81-8143-539-7
Total Pages : 150
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Diary

पुस्तक के सन्दर्भ में.....
भोपाल से ज़ाहिदा हिना के पास राजकुमार केसवानी ने फ़ोन किया था ।  उन्होंने ज़ाहिदा हिना से  दैनिक भास्कर में हर हफ्ते 'पाकिस्तान डायरी' लिखने की बात कही। हिना कहती हैं कि मुझे महसूस हुआ जैसे वह मुझसे कह रहे हों कि सियासत पर तो बहुत कुछ छपता रहा है, लेकिन करोड़ों की तादाद में तो वे लोग हैं, जो एक-दूसरे के सुख-दुख समझना चाहते हैं, जिनके रिश्ते एक-दूसरे से हैं, जिनके इतिहास और जिनके रस्म-ओ-रिवाज का आज भी बँटवारा न हो सका ।   सिंध है जिसकी सरहदें राजस्थान से जुड़ी हैं, दोनों तरफ का पंजाब है, उर्दू बोलने वाले हैं, जो हिन्दुस्तान के हर कोने से आये हैं । ये लोग एक-दूसरे के साथ अमन-चैन से रहना चाहते हैं । वह कहती हैं कि यूनाइटेड नेशन के आँगन में रखा हुआ पिस्तौल, जिसकी नाल को शिल्पकार ने गिरह लगा दी है । अगर  मैं अपने शब्दों के माध्यम से किसी एक बन्दूक की नाल को भी गिरह लगा दूँ तो समझूँगी कि जिन्दगी सफल हो गयी । 
'बचपन से हम सभी चाँद तक पहुँचने के लिए दिल ही दिल में कैसी सीढ़ियाँ बनाते हैं, 'दैनिक भास्कर' में छपने वाली 'पाकिस्तान डायरी' भी एक ऐसी ही सीढ़ी है, जिसे मैंने शब्दों से बनाया है और इससे होकर हिन्दुस्तानी जनता के दिलों में उतरने की कोशिश की । बताना चाहा है कि आपके और हमारे दुःख एक जैसे हैं । इन दुखों से निबटने का एक ही तरीका है कि हर बन्दूक की नाल में हम गिरह लगा दें और तोप की नाल में एक फाख्ता रख दें - अमन का फाख्ता ।'पाकिस्तान डायरी' अगर किताब की शक्ल में आप तक पहुँच रही है तो इसका श्रेय अरुण माहेश्वरी को जाता है जो इतवार के रोज उसे पढ़ते हैं और खुश होते हैं।  अब उन्होंने दूसरों को भी इस ख़ुशी में शामिल करने का फैसला किया है । मैं अपनी तरह के सोचने वालों की बात को हिन्दुस्तान के शहरों-कस्बों और देहातों तक फैलाऊँ ।  मेरे लिए इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती थी ।'- ज़ाहिदा हिना 

लेखिका के सन्दर्भ में......
ज़ाहिदा हिना का जन्म भारत में 5 अक्टूबर 1946 जिला सासाराम, बिहार में हुआ था भारत के विभाजन के बाद उनके पिता मोहम्मद अबुल खैर पाकिस्तान के कराची में बस गये नौ वर्ष की उम्र में ज़ाहिदा की पहली कहानी प्रकाशित हुई । उन्होंने कराची विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । 60 के मध्य दशक में उन्होंने कैरियर के रूप में पत्रकारिता को चुना । सन 1970  में उन्होंने प्रसिद्ध कवि जॉन एलिया से शादी कर ली । ज़ाहिदा हिना 1988 से 2005 तक दैनिक जंग (अखबार) से जुड़ी रहीं। उन्होंने पाकिस्तान रेडियो, बीबीसी उर्दू और वाइस ऑफ़ अमेरिका के लिए कार्य किया है। 2006 के बाद से वह 'दैनिक भास्कर' के एक साप्ताहिक स्तम्भ 'पाकिस्तान डायरी' लिखती हैं, जो काफी लोकप्रिय है । उनका  उपन्यास 'न जुनूं रहा न परी रही' देश के विभाजन और खूनी रिश्तों के बिखर जाने की उदास कर देने वाली तस्वीर है । सन 2004 में वाणी प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया था । सन 2001 में ज़ाहिदा हिना को राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के हाथों सार्क लिटरली अवार्ड  मिला