Thursday, 7 June 2012

सम्पूर्ण बख्शी ग्रन्थावली आठ खण्डों में





हिन्दी साहित्य का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन किया गया।  धीरे-धीरे यही पत्रिका हिन्दी साहित्य की मेरुदंड बनी । आखिर वह क्या रहस्य था कि छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव खैरागढ़ में 27 मई 1894  को जन्म लेकर 'साहित्यवाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी' ने हिन्दी साहित्याकाश में एक ज्योतिर्मय अलौकिक नक्षत्र का स्थान ग्रहण किया । बख्शी जी की ज्ञान जिज्ञासा, अदम्य लालसा और साहित्यिक अभिरुचि ने उन्हें साहित्य जगत का कीर्ति स्तम्भ बनाया है । सन 1900 में देवकीनन्दन खत्री के 'चन्द्रकान्ता' और 'चन्द्रकान्ता संतति' से परिचित होकर साहित्य जगत में डुबकी लगाने के लिए व्याकुल हो गये  थे। यही व्याकुलता उन्हें साहित्य जगत में विचरण करने के लिए प्रेरित करती रही । जीवन भर बख्शी जी कथा-साहित्य का मन्थन कर रसिकों को अमृतमयी साहित्य का मर्म समझाते रहे । असीम आनन्द की प्राप्ति ही प्रत्येक मनुष्य की अदम्य लालसा होती है । हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि आनन्द की भावना हमारे मन में ही समायी रहती है । उसे खोजने के लिए हमें कहीं नहीं जाना पड़ता है । हमारी बुद्धि की सक्रियता आनन्द की सोच ही हमारे अन्तर्मन में एक अलौकिक मस्ती का भाव ला देती है । बख्शी एक सफल सम्पादक, भावुक कवि, कुशल कहानीकार, स्वस्थ आलोचक व समीक्षक, वैयक्तिक निबन्धकार, मौलिक चिन्तक और आदर्श शिक्षक थे । बख्शी को समझना इतना आसान भी नहीं है, लेकिन हमने उस धरोहर को एक पुस्तक की शक्ल में प्रस्तुत किया है । इस माध्यम से बख्शी जो को उनकी साहित्य साधना पर श्रद्धांजलि अर्पित की गयी है । प्रस्तुत है आठ खण्डों में बख्शी ग्रंथावली । 

Book : Bakshi Granthwali (Total Eight Parts)

Editor: Dr. Nalini Shrivastava

Publisher : Vani Prakashan 

Price :  `6000(HB)  
Size (Inches) : 5.50X8.75
Category  : Granthawali 

बख्शी ग्रन्थावली(सम्पूर्ण बख्शी ग्रन्थावली आठ खण्डों में) सम्पूर्ण खण्डों का मूल्य 6000 रुपये है

बख्शी ग्रन्थावली-1(कविताएँ,नाटक/एकांकी, उपन्यास)
ISBN : 81-8143-510-9
बख्शी ग्रन्थावली-2(कथा साहित्य-बाल कथाएँ)
ISBN : 81-8143-511-07
 बख्शी ग्रन्थावली-3(समीक्षात्मक निबन्ध)
ISBN : 81-8143-512-05
 बख्शी ग्रन्थावली-4(साहित्यिक निबन्ध)
ISBN : 81-8143-513-03
 बख्शी ग्रन्थावली-5(साहित्यिक, सांस्कृतिक निबन्ध)
ISBN : 81-8143-514-01
 बख्शी ग्रन्थावली-6(संस्मरणात्मक निबन्ध)
ISBN : 81-8143-515-X
 बख्शी ग्रन्थावली-7(अन्य निबन्ध)
ISBN : 81-8143-516-08
 बख्शी ग्रन्थावली-8(अन्य निबन्ध, सम्पादकीय, डायरी)
ISBN : 81-8143-517-6

प्रत्येक खण्ड का संक्षिप्त परिचय
बख्शी ग्रन्थावली-1(कविताएँ,नाटक/एकांकी, उपन्यास) : साहित्य जगत में 'साहित्यवाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी' का प्रवेश सर्वप्रथम कवि के रूप में हुआ था । कहा जाता है कवि का व्यक्तित्व जितना सर्वोपरि होगा साहित्य के लिए उतना ही महत्वपूर्ण भी । बख्शी जी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं ।  उनकी रचनाओं में उनका व्यक्तित्व स्पष्ट परिलक्षित होता है ।  बख्शी जी मनसा, वाचा, और कर्मणा से विशुद्ध साहित्यकार थे । मान प्रतिष्ठा पद या कीर्ति की लालसा से कोसों दूर निष्काम कर्मयोगी की भाँति पूरी ईमानदारी और पवित्रता से निश्छल भावों की अभिव्यक्ति को साकार रूप देने की कोशिश में निरन्तर साहित्य सृजन करते रहे । उपन्यास के प्रेमी पाठक होने पर भी अपने को असफल कहते । लेकिन इनके उपन्यासों को पढ़ कर कोई यह नहीं कह सकता कि बख्शी जी असफल उपन्यासकार हैं । इस खण्ड में पाठकों के समक्ष उनकी  कविताएँ, नाटक/एकांकी, उपन्यास और कुछ अनूदित रचनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं । 
    
बख्शी ग्रन्थावली-2(कथा साहित्य-बाल कथाएँ)इस खण्ड में बख्शी जी का कथा साहित्य और बाल कथाएँ संकलित हैं बख्शी जी की 'बालकथा माला' में छोटी-छोटी कहानियाँ हैं  वे कहानियाँ अध्ययन की परिपक्वता एवं लोक कथाओं पर आधारित जीवन को सही दिशा दिखाने में सक्षम कथा-साहित्य संग्रह हैं । 1916 में बख्शी जी की पहली मौलिक कहानी 'झलमला' सरस्वती में प्रकाशित हुई थी । बख्शी जी के कथा-साहित्य में छत्तीसगढ़ की संस्कृति रची-बसी है। त्योहारों की झलक बख्शी जी के कथा-साहित्य में सर्वत्र दिखाई देती है । छत्तीसगढ़ में 'अखती' (अक्षय तृतीय) का त्योहार मनाया जाता है । बख्शी जी की 'गुड़िया' कहानी में उसका जीवन्त रूप दिखाई देता है । 'एक कहानी की रचना' में बख्शी जी रोबिंसन क्रूसो की तुलना करते हुए छत्तीसगढ़ की महानदी एवं यहाँ के काल्पनिक वातावरण और 'हलचली' (कमरछठ) त्योहार की चर्चा करते हुए विषम परिस्थिति में उसकी उपयोगिता को सिद्ध करते हैं । बख्शी जी की लेखनी ही ऐसा विशिष्ट कौशल कर सकती है कथा-साहित्य और बाल कथाओं के माध्यम से बख्शी जी ने जीवन को सत्य की छाँव में रखने का प्रयास किया है

बख्शी ग्रन्थावली-3(समीक्षात्मक निबन्ध): शोध और समीक्षा सर्जनात्मक विधा है । और साहित्य का विशिष्ट अंग है और आलोचना के सिद्धान्तों की परिधि में ही रहकर साहित्यिक कृतियों की समीक्षा की जाती है । बख्शी जी ने 'यदि मैं लिखता' शीर्षक से हिन्दी की कुछ प्रमुख रचनाओं पर रचनात्मक ढंग से अपनी समीक्षाएँ प्रस्तुत की हैं । बख्शी जी ने समीक्षा के आधार पर कृति के उद्देश्यों की रक्षा करते हुए एक नवीन कृति प्रस्तुत करना बख्शी जी के साहित्य की प्रमुख विशेषता है । सृजनात्मक समीक्षा की पद्धति हिन्दी के अन्य समीक्षकों में लगभग नगण्य है, पुन: सृजन की यह विशेषता बख्शी जी के निबन्ध और साहित्य में अन्त तक बनी रही । बख्शी जी साहित्यकार के रचनात्मक धर्म के लिए उसी समीक्षा को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिसमें तुलना के माध्यम से किसी घटना वस्तुस्थिति या पात्र के चरित्र का वैशिष्ट्य निरुपित किया जा सके । इस प्रसंग में बख्शी जी ने विश्व कथा-साहित्य और काव्य के सैकड़ों सन्दर्भ प्रस्तुत किये हैं किसी कृति की कमियों की ओर संकेत करते समय बख्शी जी अपूर्व तर्क और मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय देते हैं । उनकी सहमति से असहमति नहीं प्रगट की जा सकती । इन सारी विशेषताओं के कारण बख्शी जी के ये निबन्ध हिन्दी साहित्य में अलग अस्तित्व रखते हैं । समीक्षा में बख्शी जी ने और पाश्चात्य साहित्य समीक्षा के सैद्धान्तिक पक्ष का आडम्बर  न दिखाते हुए सुन्दर तुलनात्मक समीक्षा का रूप उपस्थित किया है । तुलनात्मक समीक्षक के जनक के रूप में उन्हें देखा जाये तो गलत न होगा

बख्शी ग्रन्थावली-4(साहित्यिक निबन्ध):  बख्शी लिखते हैं, 'यह सौभाग्य की बात है कि साहित्य के क्षेत्र में एकमात्र अर्थ सिद्धि के उद्देश्य से साहित्य का काम नहीं चल सकता । साहित्य में असन्तोष के लिए स्थान नहीं है । साहित्य आनन्द की सृष्टि है ।' साहित्य वही श्रेष्ठ है जिसमें रचनाकार के जीवन दर्शन सम्बन्धी अटूट आत्मविश्वास की अप्रतिम धारा प्रवाहित है । ऐसे साहित्य की रचना अविराम साधक में होती है । जहाँ शब्दों का मूल्य नहीं होता बल्कि उन शब्दों के भीतर छिपे हुए अर्थपूर्ण व्यक्तित्त्व का मूल्य सर्वोपरि है । बख्शी के साहित्यिक निबन्धों को पढ़ने से पाठकों का सहजता से विश्व-साहित्य से परिचय हो जाता है । कारण बख्शी जी साहित्यिक निबन्धों में अनेक विश्व प्रसिद्ध कथा, कविता एवं निबन्धों का सार तत्व प्रस्तुत करते हैं । साहित्यिक गतिविधियों के तुलनात्मक अध्ययन में बख्शी एक असाधारण प्रतिभा स्तभ्म हैं। बख्शी जी की लेखनी साहित्य की सभी विधाओं पर चली परन्तु यह मूलत: वरिष्ठ निबन्धकार के रूप में साहित्य जगत में प्रसिद्ध हैं । इनके निबन्धों में कथा रस व कथाओं में निबन्धात्मक तत्त्व नज़र आते हैं । यही कारण है कि इनके निबन्ध आत्मकथात्मक निबन्ध कहलाते हैं । 'स्मृति' नामक निबन्ध में बख्शी जी शैशवकालीन बातों का स्मरण करते हुए तत्कालीन सामाजिक, साहित्यिक, राजनैतिक परिवेश की झाँकी प्रस्तुत करते हैं । बख्शी जी का अधिकांश निबन्ध साहित्य आत्मप्रकाशन की पृष्ठभूमि पर स्थित है । इस खण्ड में उनके साहित्यिक निबन्ध को प्रस्तुत किया गया है

बख्शी ग्रन्थावली-5(साहित्यिक, सांस्कृतिक निबन्ध) : 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती का सम्पादकीय कार्य प्रारम्भ किया था। हिन्दी साहित्य के नन्दनवन को बनाने में भारतेन्तु हरिश्चंद्र, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और अन्य प्रबुद्ध विद्वानों का अवदान व परिश्रम तथा जागरूक बुद्धिमत्ता का ही प्रतिफल है । उसी साहित्यिक नन्दनवन में द्विवेदी जी के स्नेह संरक्षण व कुशल मार्ग निर्देशन में बख्शी रूपी कल्पतरु का भी विकास हुआ जिनकी रचनाओं के सौरभ से हिन्दी साहित्य की मंजूषा सुरभित हुए बिना न रह सकी । यही कारण है कि बख्शी जी आचार्य द्विवेदी जी के उत्तराधिकारी माने जाते हैं । बख्शी जी ने अपनी साहित्यिक कृतियों का संस्थापन किया है ।  'विश्व-साहित्य', 'हिन्दी साहित्य विमर्श', 'हिन्दी कथा-साहित्य','पचतंत्र','नवरात्र', 'समस्या और समाधान' , 'प्रदीप' आदि में इनके  साहित्यिक निबन्धों की विशिष्ट मीमांसा है । बख्शी जी के निबन्धों में जीवन की छोटी-बड़ी अनेक घटनाओं के प्रसंग अतीत की स्मृति का सरस लेखा-जोखा करते हैं। इनके निबन्धों में विधवा-समस्या, गृह-जीवन में असंतोष आदि निबन्ध जीवन की सच्चाइयों को सरलता से प्रतिबिम्बित करते हैं । 'समाज सेवा' इनका प्रसिद्ध निबन्ध है । इस खंड में इनके साहित्यिक, सांस्कृतिक निबन्ध कालजयी हैं हिन्दी साहित्य में इन विषयों पर इसी प्रकार की ऊर्जा व आत्मीयता से युक्त रचनाएँ देखने को नहीं मिलतीं
  
बख्शी ग्रन्थावली-6(संस्मरणात्मक निबन्ध): बख्शी जी ने अपने संस्मरणात्मक निबन्धों में बाल्यकाल से लेकर अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के संस्मरण लिखे हैं। बख्शी जी के संस्मरणपरक निबन्धों की विशेषता यह है कि यह विशेष व्यक्तियों पर सीमित न होकर लोकजीवन के अतिशय सामान्य व्यक्तियों तक फैले हुए हैं ।  अतएव इनमें वैचारिक विविधता है ही साथ ही साथ जीवन के विविध पक्षों का लोकार्पण भी सम्भव हो सका है । मानवीय जीवन की ऐसी ताजी स्मृतियाँ हिन्दी के अन्य संस्मरणमूलक निबन्धों में नहीं मिलती हैं । बख्शी ने जीवित व्यक्तियों के सम्बन्ध  में भी अपनी प्रतिक्रियाएँ लिखकर अपने निबन्धों को और प्रामाणिक बनाया है । बख्शी की रचनाओं में कहीं भी न तो किसी व्यक्ति की आलोचना मिलती है और न जीवन के प्रति निराशा का भाव । इस दृष्टिकोण के कारण इनके  संस्मरणमूलक निबन्ध पाठकों के लिए प्रेरणास्रोत्र एवं मार्गदर्शक का काम करते हैं । हिन्दी साहित्य में इस प्रकार के निबन्धों का सर्वथा अभाव है । बख्शी के संस्मरणात्मक निबन्ध हर दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं

बख्शी ग्रन्थावली-7(अन्य निबन्ध)
:
  बख्शी जी निबन्ध कला के सौन्दर्यीकरण के लिए एक ही निबन्ध को अनेक शैलियों में अनेक बार लिखते थे । बख्शी के निबन्धों में स्टीवेंसन, सोमरसेट मॉम, ए.जी. गार्डनर और मातेन शैली का विशेष प्रभाव है । बख्शी जी के निबन्धों की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि इन निबन्धों को पढ़ने से पाठकों के हृदय को एक आत्मीयता ऊर्जा मिलती है, लिखने की ललक का अंकुरण होता है । बख्शी जी निबन्ध साहित्य का जीवन पर सरल स्वाभाविक प्रभाव मानते थे । उसे दैनिक चर्चाओं का अंग भी कहते थे । जिस प्रकार हमारे दैनिक जीवन में किसी एक ही वस्तु के भाव-विचार, घटना आदि की प्रमुखता नहीं रहती वरन वह सबकुछ मिला-जुला रूप होता है । उसी तरह बख्शी जी के निबन्ध भी उनके अपने जीवन के विशेषकर अध्यापकीय जीवन के अंग रहे हैं । उनमें जीवन की सच्ची कथाएँ ताजी प्रतिक्रियाएँ व एक विशिष्ट नैतिकता विद्यमान है। बख्शी के निबन्ध सम-सामयिक होते हुए भी उससे सर्वथा पृथक हैं । वे राष्ट्रीय काव्य-धारा और राष्ट्रीय आन्दोलनों के प्रति अपना उदार दृष्टिकोण रखते हैं

बख्शी ग्रन्थावली-8(अन्य निबन्ध, सम्पादकीय, डायरी)
: बख्शी जी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उत्तराधिकारी माने जाते हैं । बख्शी जी के व्यक्तित्व में सम्पादक, अध्यापक तथा निबंधकार समान रूप से ही सशक्त रहे हैं । सरस्वती पत्रिका के सम्पादक के रूप में बख्शी जी ने सर्वाधिक ख्याति और प्रतिष्ठा अर्जित की । मूलत: बख्शी जी का साहित्यकार का स्थापन सम्पादकीय कार्य से प्रारम्भ हुआ ।
सरस्वती के सम्पादक के रूप में जहाँ एक ओर इन्होंने श्री सुमित्रानन्दन पन्त की कविताएँ प्रकाशित कर द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मक काव्य को छायावादी काव्य का परिधान पहनाया वहीं दूसरी ओर प्रेमचन्द, इलाचन्द्र जोशी व सुदर्शन आदि की कहानियाँ प्रकाशित करने में अपना योगदान दिया
। इनका सम्पादकीय लेखन केवल साहित्यिक विषयों तक ही सीमित न होकर जीवन की सामयिक महत्ता के सभी प्रसंगों से भी सम्बन्धित रहा है । बख्शी जी की डायरी में हम उन तारीखों से गुजरते हुए उनके रोजमर्रा की जिन्दगी की धड़कनों को महसूस करते हैं । इनकी डायरियाँ बख्शी के साहित्य के प्रति समर्पण को रेखांकित करती हैं ।  उनका सम्पूर्ण जीवन डायरी में परिलक्षित होता है बख्शी की डायरी साहित्य का अमूल्य दस्तावेज है

साहित्यवाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के सन्दर्भ में......
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई 1894,
राजनाँदगाँव के जिला खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) में हुआ था 14वीं शताब्दी में बख्शी जी के पूर्वज श्री लक्ष्मीनिधि राजा के साथ मण्डला से खैरागढ़ में आये थे और तब से यहीं बस गये। बख्शी के पूर्वज फतेह सिंह और उनके पुत्र श्रीमान राजा उमराव सिंह दोनों के शासनकाल में श्री उमराव बख्शी राजकवि थे

पदुमलाल बख्शी की प्रायमरी की शिक्षा खैरागढ़ में ही हुई । 1911 में यह मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में बैठे । हेडमास्टर एन.ए. गुलामअली के निर्देशन पर उनके नाम के साथ उनके पिता का नाम पुन्नालाल लिखा गया। तब से यह अपना पूरा नाम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखने लगे । मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में यह अनुत्तीर्ण हो गये । उसी वर्ष 1911 में इन्होंने साहित्य जगत में प्रवेश किया । 1912 में इन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की । उच्च शिक्षा के लिए इन्होंने बनारस के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में प्रवेश लिया ।  1916  में ही इनकी नियुक्ति स्टेट हाई स्कूल राजनाँदगाँव में संस्कृत अध्यापक के पद पर हुई। बख्शी जी  1920 में सरस्वती (पत्रिका) के सम्पादक बनकर इलाहाबाद गए ।  सन 1929 में बख्शी जी ने स्वयं सरस्वती के सम्पादकीय पद से त्यागपत्र दे दिया और खैरागढ़ चले आये।  सन 1930  में  राजनाँदगाँव के स्टेट हाई स्कूल में  नियुक्त हुए । सन 1934 तक वहाँ काम करते रहे।  इस समय यह हिन्दी साहित्य जगत में साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे । सन 1935  में खैरागढ़ के विक्टोरिया हाई स्कूल में अंग्रेजी शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए।  सन 1949  में उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मलेन द्वारा साहित्य वाचस्पति से विभूषित किया गया । सन 1960  में सागर विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें डी. लिट. की उपाधि प्रदान की गयी। दिग्विजय महाविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहते हुए 28 दिसम्बर 1971 को इनका स्वर्गवास हुआ । 

सम्पादक के सन्दर्भ में......
डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष हिन्दी, सेंट थामस कॉलेज, भिलाई( छ.ग.)