Monday, 4 June 2012

समय के सवाल




Book : Samaya Ke Sawal
Author: Pratap Sehgal
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `195(HB)  
ISBN : 81-8143-327-0
Total Pages : 131
Size (Inches) : 
5.50X8.75
Category  : Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में ....

विचारों का संसार बहुत बड़ा है और हम इस संसार में जितना ही प्रवेश करते हैं, स्वयं को उतना ही अज्ञानी पाते हैं । विचारों के प्रवेश-द्वार पर ही ठिठके रहने से भी मनीषा के किसी हिस्से में खलबली रहती है, वही खलबली विचार-संसार में प्रवेश करने के लिए प्रेरित करती है । सर्जनात्मक स्तर पर विचार ही अनुभव के साथ मिलकर किसी विधा की शक्ल लेता है । 
प्रताप सहगल कवि, नाटककार एवं कथाकार के रूप में ख्यात हैं । धारा के विरुद्ध  तैरने में उन्हें आनन्द आता है 'समय के सवाल' किताब में उनके ऐसे ही लेखों का संग्रह है, जो कई अर्थों में धारा के विरुद्ध लगते हैं । आज जब भारतीय समाज कमोबेश प्रदत्त को स्वीकार कर चुका है, प्रताप लेखक के रूप में उस प्रदत्त को स्वीकार नहीं करते । लेखक में परख विश्लेषण और पहचान की प्रकिया निरन्तर चलती रहती है । यही इन लेखों का मूल मंत्र भी है । अनुपस्थिति की खोज हो या कर्मवाद के बहाने, दलित लेखन के सामने यह सवाल हो या रंगभूमि के बहाने, इन तमाम तथा दूसरे लेखों में वे प्रश्न भी उठाते हैं, कुछ उत्तर भी खोजते हैं, लेकिन अपने खोजे हुए उत्तरों के प्रति उनके मन में संदेह रहता है । पिछले दो दशकों में प्रश्न उठाने के बजाय 'स्वीकार करो', 'अनुकरण करो' की राजनीति ही हावी है, लेखक जितने सवाल दूसरों से करता है उतने ही अपने आप से । 
इस पुस्तक में दो संक्षिप्त टिप्पणियों सहित कुल तेईस लेख संकलित हैं । खण्ड एक में ऐसे लेख हैं जो साहित्य के माध्यम से वक्त की नब्ज़ को टटोलने की कोशिश करते हैं, कहीं उन सवालों से दो-चार होते हुए लेखक ने आम व्यक्ति की परेशानियों को व्यक्त किया है । इस खण्ड में भारतीय समाज में पाखंड की भूमिका के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक कारण हैं, तो कहीं परम्परा से प्राप्त दर्शन एवं चिंतन को बिना परखे, बिना उसकी चीर-फाड़ किये स्वीकार कर लेने की हड़बड़ी है ।  कुछ स्वार्थवश इन्हीं सन्दर्भों पर पहला खण्ड आधारित है ।  
दूसरे खण्ड में उन लेखों को रखा है जो कहीं तो नाट्य-चिंतन से सम्बन्धित हैं तो कहीं लम्बी कविता की पहचान से । तीसरे खण्ड में वह लेख सम्मिलित किये गए हैं, जो सेमिनारों और गोष्ठी में बहस का मुद्दा बने हैं ।  सभी खण्ड एक पुस्तक की शक्ल में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं । जो पाठक को सार्थकता के अनुभव के साथ जोड़ देते हैं । 

लेखक के सन्दर्भ में....
साहित्यकार सम्मान (हिन्दी अकादमी दिल्ली), सौहार्द सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ), सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार (साहित्य कला परिषद), अपनी-अपनी भूमिका पर शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत, आदिम आग एवं अनहद नाद पर हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत, राजभाषा सम्मान (भारत सरकार), हिन्दी सेवी राजभाषा सम्मान(रोटरी क्लब, दिल्ली) आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत कथाकार प्रताप सहगल का जन्म 10 मई 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में ) हुआ । रोहतक (हरियाणा) से प्राथमिक शिक्षा ली  सन 1955 में इनका परिवार दिल्ली में बसा  सन 1970 में प्रताप सहगल ने एम.ए. (हिन्दी) दिल्ली विश्वविद्यालय उत्तीर्ण करने के बाद जाकिर हुसैन कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर नियुक्ति ली  अनहद नाद, प्रियकांत (उपन्यास), अब तक (कहानी-संग्रह), समय के सवाल, रंग-चिन्तन, समय के निशान(आलोचना) प्रकाशित हैं 


मछली-मछली कितना पानी




Book : Machhli-Machhli Kitna Pani
Author: Pratap Sehgal

Publisher : Vani Prakashan 
Price : `175(HB)  
ISBN : 978-93-5000-720-4
Total Pages : 110
Size (Inches) : 
5.50X8.75

Category  : Collection of Stories


पुस्तक के सन्दर्भ में....
अपने हिस्से की धूप, अपने हिस्से की छाँव, अपने हिस्से का पानी, अपने हस्से की हवा और अपने हिस्से का सुख हर आदमी ढूँढ रहा है । इसी खोज में छिपे हैं उसके दर्द और संघर्ष । दर्द और संघर्ष के साथ ही जुड़े हैं उसके स्वप्न । इसी स्वप्न पर आधारित पुस्तक की पहली कहानी 'मछली-मछली कितना पानी' जोकि पुस्तक का नाम भी है, कहानी में है एक विशेष बात, एक विशेष सच्चाई, इस सच्चाई में लेखक भी सम्मिलित है ।
प्रताप सहगल की इन कहानियों में अपने हिस्से की जगह खोजते और उस खोज में स्थितियों से जूझते, लड़ते और टूटते बनते हुए पात्र हैं ।  लेखक स्वयं पिछले पचपन वर्षों से दिल्ली जैसे महानगर में पनपे बड़े मध्यवर्ग का हिस्सा है । सम्भवत: तभी इन सभी कहानियों का लोकेल महानगर और महानगरों में जीवन जीता मध्यवर्ग ही है । मध्यवर्गीय जीवन के विभिन्न हालात में अवस्थित इन पात्रों की कई-कई मनोदशाएँ और उन मनोदशाओं की कई-कई परतें इन कहानियों में ध्वनित होती हुई पाठक को अपने समानान्तर अनुभवों से जोड़ देती हैं । प्रताप सहगल का कवि और नाटककार कहानियों की बुनावट में कहीं परोक्ष तो कहीं प्रत्यक्ष रूप में हस्तक्षेप करता नज़र आता है । इससे इन कहानियों में कहीं कविता का उत्कर्ष तो कहीं नाटक की त्वरा  भी झलकने लगती है, जिससे कहानी में रोचकता शुरू से अन्त तक बनी रहती है । इन कहानियों के न केवल विषय बल्कि उन विषयों का ट्रीटमेंट भी अलग-अलग तरीके से हुआ है एक लम्बे अरसे के बाद प्रताप सहगल का कहानी-संग्रह आपके समक्ष प्रस्तुत है

पुस्तक का अनुक्रम 
मछली-मछली कितना पानी
क्रास रोड्स
मुक्ति
बाब
अण्डा
जुगलबन्दी
एक और कुकुरमुत्ता
वह आदमी
चलो कहीं घूम लेते हैं
टाइम-पास
सरदार नच्छत्तर सिंह

लेखक के सन्दर्भ में....

साहित्यकार सम्मान (हिन्दी अकादमी दिल्ली), सौहार्द सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ), सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार (साहित्य कला परिषद), अपनी-अपनी भूमिका पर शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत, आदिम आग एवं अनहद नाद पर हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत, राजभाषा सम्मान (भारत सरकार), हिन्दी सेवी राजभाषा सम्मान(रोटरी क्लब, दिल्ली) आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत कथाकार प्रताप सहगल का जन्म 10 मई 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में ) हुआ । रोहतक (हरियाणा) से प्राथमिक शिक्षा ली सन 1955 में इनका परिवार दिल्ली में बसा  सन 1970 में प्रताप सहगल ने एम.ए. (हिन्दी) दिल्ली विश्वविद्यालय उत्तीर्ण करने के बाद जाकिर हुसैन कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर नियुक्ति ली अनहद नाद, प्रियकांत (उपन्यास), अब तक (कहानी-संग्रह), समय के सवाल, रंग-चिन्तन, समय के निशान(आलोचना) प्रकाशित हैं