Friday, 1 June 2012

नागार्जुन की चुनी हुई रचनाएँ (सम्पूर्ण तीन खण्डों में )







बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में नागार्जुन अब एक युग का नाम हैइस युग की पहचान है। नागार्जुन की रचनाओं का समाजवादी यथार्थवाद ।  

Book - Nagarjun  : Chuni Huyi Rachnayen
Editor : Shobhakant Mishra
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 2500( All Three Parts)
ISBN : 978-93-5000-088-5
Total Pages :  1144 
Size (Inches) :  5.75X8.75
Category

Part one/ Nagarjun/ Fiction
Part Two/ Nagarjun/Hindi/Sanskrit Bangla/Maithily/poetry
Part Three/ Nagarjun/Essay/Travels/Translation/Story/Memoirs/Interview/Dibates/Letters


पुस्तक के संदर्भ में.....
Part one/ Nagarjun/ Fiction : नागार्जुन की चुनी हुई रचनाओं के इस पहले खण्ड में उनके चार कालजयी उपन्यास - रतिनाथ की चाची, बलचनमा, वरुण के बेटे और कुम्भीपाक संकलित हैंइन उपन्यासों में नागार्जुन ने भारतीय जन-जीवन की महागाथा लिखी हैइन्हें एक साथ पढ़ना भारतीय समाज के उन लोगों के बीच से गुजरना है जो आज भी सामाजिक विसंगतियों के बीच शोषण झेलते हुए बेहतर जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।  

PartTwo/Nagarjun/Hindi/Sanskrit/angla/Maithily/poetry : इस दूसरे खण्ड में नागार्जुन की चुनी हुई कविताओं का संकलन हैजिसमें एक दिलचस्प विशेषता यह भी है कि हिन्दी और मैथली कविताओं के साथ ही उनकी संस्कृत और बांग्ला कविताएँ भी पहली बार प्रकाशित हैइसमें उनकी सोच की एक-एक धड़कन है।  

PartThree/Nagarjun/Essay/Travels/
Translaion/Story/Memoirs/Interview/Dibates/Letters :
नागार्जुन की चुनी हुई रचनाओं के इस तीसरे खण्ड में उनके निबंध, कहानियाँ, संस्मरण, भाषण, यात्रा वृत्तान्त, महत्त्वपूर्ण पत्र और साक्षात्कार संकलित हैंइस खण्ड की ऐतिहासिकता इस बात में है कि नागार्जुन के विशाल लेखन का यह बड़ा भाग पहली बार संग्रह के रूप में सामने प्रस्तुत है जो उनके रचनाकार व्यक्तिव की सम्पूर्ण समझ के लिए नये दरवाजे खोलता है नागार्जुन के निबंधों की विषय-वस्तु में विविधता है तो कहानियों में चरित्र की संवेदनात्मक बारीकियाँउनके संस्मरण सम्बन्धित व्यक्ति के व्यक्तित्व को समग्रता में लाने के साथ-साथ उसका मूल्यांकन भी करते हैं।  भाषणों में प्रगतिशील विचार और सीधी सम्प्रेषणीयता हैयात्रा वृत्तांतों में यात्री नागार्जुन द्वारा देश के रम्य और बीहड़ इलाकों के साहसिक सफर की स्मृतियाँ हैंनिजी पत्रों में दोस्तों के जीवन और उनकी मानसिक-पारिवारिक समस्याओं को लेकर चिंताएँ हैं, एक हद तक उनका समाधान भीअकसर इन पत्रों में यायावर नागार्जुन की घुमक्कड़ी के अगले पड़ाव की सूचना भी हैसाक्षात्कार में हैं, उनकी दो टूक बातें। 


नागार्जुन के संदर्भ में...
सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार ।  स्वभाव से आवेगशील।  राजनीति और जनता के मुक्ति-संघर्षों में सक्रिय और रचनात्मक हिस्सेदारी लीहिन्दी और मैथिली के अप्रतिम कवि और लेखक नागार्जुन का जन्म 30 जून 1911 ग्राम तरौनी जिला दरभंगा,बिहार में हुआ । प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की । इन्होंने हिन्दी, मैथिली के अलावा संस्कृत और बांग्ला में भी काव्य-रचना की । 
मैथिली काव्य संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित। हिन्दी कविता के लिए मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'मैथिलीशरण गुप्त' सम्मान,समूची साहित्य साधना के लिए उत्तर प्रदेश एवं बिहार सरकार द्वारा 'राजेंद्र शिखर' सम्मान से सम्मानित। 5 नवम्बर 1998 को इनका देहांत हुआ ।   


ज्ञानेंद्रपति की कुछ पक्तियों के माध्यम से संपादक शोभाकांत के संदर्भ में....
शोभाकांत का जन्म, जून 1945 ग्राम तरौनी जिला दरभंगा, बिहार में हुआ । "यायावर का झोला जैसे संग चलने को तैयार सजग तैयार शोभाकांत, कवि पिता की जाग के सिरहाने कंधे पर झोला टाँगे चिर प्रवासी पिता के उर का घर भरने वाली दन्तुरित मुस्कान। तनिक खेद मिली प्रसन्नता की पान-पगी, मुस्कराहट बन चहरे पर बसी हुई शोभाकांत। कवि नागार्जुन उर्फ यात्री के पुत्र ही नहीं मित्र अपनी बाधित पैरों में अबाध उगाध यात्रोत्साह लिए दुबले तन में जठर ही नहीं किसी दावा का भी, दाह लिए"। 




तीन सौ रामायण



  Book- Teen Sau Ramayan
  Author : A. K. Ramanujan
  Translated : Dhawal Jaiswal
  Foreword : Apoorvanand
  Publisher : Vani Prakashan
  Price :
` 125
 ISBN : 978-93-5072-172-8
 Total Pages : 80
 Size (Inches) :  5.5X8
 Category  : Criticism/History



पुस्तक के सन्दर्भ में ....
तीन सौ रामायण बहुभाषाविद, लोकवार्ताकार, अनुवादक, कवि और  अध्यापक रामानुजन द्वारा संसार में रामकथा की अद्भुत विविधतापूर्ण व्याप्ति और इसके भीतर छिपे अर्थ-संसार के विराट-संभावना लोक का अत्यंत ही संवेदनशील दृष्टि से किया गया उदघाटन है। सहस्रों वर्षों से अनेकानेक संस्कृतियों की अनेक पीढ़ियां धर्मों की बाधाओं से परे इस कथा में अपने जीवन अर्थों का सृजन करती आई हैं। यह देख कर आश्चर्य होता है कि इस कथा में कितना लचीलापन रहा है
रामानुजन इस लेख में राम-कथा की विविधता के माध्यम से अर्थ-निर्माण और अनुवाद की प्रक्रिया पर भी विचार करते हैं

 पुस्तक में पढ़ने वाले तथ्य....
   तीन सौ रामायण : पाँच उदारहण और अनुवाद पर तीन विचार 
वाल्मीकि और कंबन : दो अहल्याएँ
अहल्या का प्रकरण : वाल्मीकि
अहल्या का प्रकरण : कम्बन
जैन वर्णन
लिखित से मौखिक की ओर...
एक दक्षिण-पूर्व एशियाई उदाहरण
भिन्नता के क्रम
अनुवाद पर विचार
क्या होता है जब आप सुनते हैं!

लेखक के सन्दर्भ में .....

ए.के. रामानुजन का जन्म  सन 1929 में मैसूर के एक कन्नड़-भाषी तमिल परिवार में हुआ था । उन्होंने अंग्रेजी की शिक्षा मैसूर विश्वविद्यालय और इंडियाना यूनिवर्सिटी में ली। यूनिवर्सिटी आव शिकागो में विलियम ई. कोलिवन प्रोफेसर  के रूप में काम करते हुए उनकी अकादमिक रुचियाँ अधिकाधिक अंतरानुशासनिक होती गईं उन्होंने क्लासिकल तमिल और मध्यकालीन कन्नड़ से अनुवाद किये उन्होंने कन्नड़ में प्रयोगशील कविता (होक्कुलाल्ली हुविल्ला,कुंतोबिले, आदि ) लिखी, भारत भर से लोकगाथाएं एकत्र कीं, अंग्रेजी से कन्नड़ में और कन्नड़ से अंग्रेजी में कथा - साहित्य का अनुवाद किया और खुद कन्नड़ में एक उपन्यासिका लिखी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले 1993 में उनका देहांत हो गया
अनुवादक के सन्दर्भ में......

धवल जायसवाल दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन करते हैं उनके आलोचनात्मक निबंधों के दो संग्रह प्रकाशित हैं








मन का तुलसी चौरा





चर्चित पत्रकार और लेखक एवं संसद सदस्य (राज्यसभा) तरुण विजय की पुस्तक ललित निबंधो के संकलन पर आधारित 'मन का तुलसी चौरा' पर रमेशचंद्र शाह के विचार- " देश का मन और जल दोनों गंदला गये हैं, दिल्ली में यमुना का आचमन तो दूर, स्पर्श तक नहीं किया जा सकता पीढ़ियों से अपने धार्मिक संस्कार सुरक्षित रखे सूरीनाम और त्रिनिदाद के लोग काशी गये तो गन्दगी से भरी गलियाँ,..और ईश्वरोपासना की पहली ही सीढ़ी पर जाति के जुगुप्साजनक अहंकार का परिचय अब कोई विधर्मी नहीं, जो हमारी गंगा, जमुना या मंदिरों को गन्दा करने आते हों।  यह काम हम खुद करते हैं"। 

Book : Man Ka Tulasi Chaura
Author : Tarun Vijay
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 495
ISBN : 978-93-5072-227-5
Total Pages :  314
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : 
Social Studies

पुस्तक के संदर्भ में.....
लेखक कहता है कि लेखनी के आँगन में आकर यथार्थ के खुरदरेपन का जो बहुधा मरणान्तक अहसास हुआ उसने हिन्दू-मुस्लिम दायरों के भीतर गहरे पैठे हुए पाखंड, आत्मवंचनाएँ, दोहरे चरित्र और पूज्य फरिश्तों के खड़िया वाले पाँव दिखा दिए और उन पर बेलाग लिखना भी तय करवा दिया हमारे झंडों के रंग जो भी हों पर अगर हमारे मन कलुषित, खिड़कियाँ बंद और इतिहासबोध संकीर्ण हैं तो संस्कृति और सभ्यता की खुदाई हो सकती है, रक्षा नहीं । धन और पद के अहं में डूबे महंतों के चाटुकारितासिक्त दरवाजों के खुलने और बंद होने का रिवाज समाज और देश तो तोड़ता ही है, जोड़ता नहीं । लेखक व्यंग्य कसते हुए कहता है कि गंगा विलुप्त प्राय:, यमुना तिरस्कृत, हिमालय प्रदूषित और हम चले हैं, विश्व बचाने- यह कैसे चल सकता है ? जब-जब मिर्चपुर हुए, भारत हारा हर सोमनाथ विध्वंस के पीछे गज़नी से पहले, क.मा. मुंशी के ही शब्दों में, शिवराशि या शिवराशियों का ही योगदान रहा है और हैखेमेबाजियों से परे जो वेदना और आक्रोश का भारतीय संसार है, वह इन्द्रधनुषी है, एक रंगीय नहीं ।  यूरोपीय सभ्यता के संदर्भ में लेखक पं. विद्यानिवास मिश्र की बात करता है कि ' यूरोपीय सभ्यता को सबसे गहरा प्रतिरोध भारत ने ही दिया, किन्तु विश्व में यूरोपीय संस्कृति को सर्वाधिक सहानुभूति के साथ समझने वाले भी भारतीय ही हुए

लेखक के संदर्भ में....
पत्रकार, लेखक एवं संसद सदस्य (राज्यसभा) तरुण विजय देहरादून  (उत्तराखंड) के निवासी हैं विश्व के अधिकांश देशों में भ्रमण और जनजातीय क्षेत्रों में पाँच वर्ष कार्य किया । पाकिस्तान के साथ भारतीय संपादकों में सबसे पहले अमन के एजेंडा अभियान को शुरू किया हिन्दी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकों का लेखन तथा साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए अनेक पुरस्कार प्राप्त । कैलास-मानसरोवर यात्रा पर सचित्र पुस्तक ' साक्षात शिव से संवाद' का गुजराती, मराठी, बांग्ला, संस्कृत तथा अंग्रेजी में अनुवाद।