Thursday, 31 May 2012

महादेवी साहित्य (सम्पूर्ण चार खण्डों में)



"महादेवी छायावादी आन्दोलन के चार प्रमुख कवियों के बीच अकेली महिला रचनाकार हैं। उनका कृतित्व इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि उन्होंने कविता को संगीत और चित्रकला की संगति में अभिव्यक्ति दी। संगीत तो शब्दों के स्वर और छंद-लय में समाहित हो गया पर चित्र उनकी तूलिका के माध्यम से कविता के पाश्रर्व में संवेदनों को मूर्त रूप देते रहे"।
- निर्मला जैन 

Book : Mahadevi Sahitya ( Total Four Parts)
Editor : Nirmala Jain
Publisher : Vani Prakashan 

Price  : ` 4000
Total Pages :  1463
Size( Inches) : 
7.5X10.25
Category : (
Rachnawali )
Book : Mahadevi Sahitya ( Total Four Parts)

पुस्तक : महादेवी साहित्य (सम्पूर्ण चार खण्डों में)
संपादक : निर्मला जैन 
मूल्य :   4000 रुपए (सम्पूर्ण चार खण्ड )

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 
         
महादेवी साहित्य(खण्ड एक)
     ISBN  :  81-8143-678-4
 महादेवी साहित्य(खण्ड दो)
     ISBN  :  81-8143-679-2
 महादेवी साहित्य(खण्ड तीन)  
     ISBN  :  81-8143-680-6
 महादेवी साहित्य(खण्ड चार)
      ISBN  :  81-7055-742-9


महादेवी साहित्य (खण्ड एक)     
'यामा' और 'दीपशिखा' की वैयक्तिक सुख-दु:खात्मक गीत-सृष्टि कवयित्री के रूप में महादेवी की ख्याति का आधार है। माँ के मुख से सुने भक्त कवियों के पदों ने बाल्यावस्था में ही तुकबन्दियाँ करने के लिए उन्हें प्रेरित किया था। पर उन रचनाओं को देखकर यह कल्पना करना कठिन रहा होगा कि उसी लेखनी का आश्रय पाकर छायावाद की गीति-कला कभी अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त करेगी  
महादेवी का कहना था कि, 'व्यक्तिगत सुख विश्व-वेदना में घुलकर जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और व्यक्तिगत दुःख विश्व के सुख में घुलकर जीवन को अमरत्व'। उनके गीत आत्म के सर्वतोन्मुख होने में चरितार्थता पाने की ऐसी ही अथक साधना का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। महादेवी के गीत काव्य-कला के साथ संगीत और चित्रकलाओं के मेल का अद्भुत उदाहरण हैं, अपने इस कथन को कि  'कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वस्त सहयोगी होने की क्षमता रखता हैकवयित्री ने ' दीपशिखा' में प्रतिफलित किया है  

महादेवी साहित्य (खण्ड दो)
1914-1915 के आसपास की रचनाओं से 1928 की कविताओं की तुलना करने पर पाठक ब्रजभाषा कविता से खड़ी बोली में छायावाद तक, हिन्दी काव्य-यात्रा के विभिन्न चरणों को पहचान सकेंगे । 
हिन्दी कविता में महादेवी की पहचान जिन छायावादी रचनाओं के आधार पर बनी उनका रचना समय 'नीहार' से 'दीपशिखा' तक माना जाता है पर तुकबन्दियाँ उन्होंने लगभग छह वर्ष की उम्र से ही शुरू कर दी थीं। 1917-1930 के लम्बे दौर के बीच महादेवी ने जो रचा उसमें से कुछ कविताएँ बाद के संग्रहों में प्रकाशित भी हुईं पर बहुत कुछ पत्रिकाओं में ही सिमटा रहा और लगभग विस्मृत हो गया । महादेवी की काव्य-यात्रा के विकास को समझने के लिए यह रचनाएँ साक्ष्य हैंउनका यह 'तुतला उपक्रम' अपनी बाल्यावस्था में ही पशु-पक्षियों से संवाद के रूप में आरम्भ होता है। महादेवी की मानसिक बनावट में, समय के साथ आनेवाले इस अंतर ने उनकी काव्यभाषा और शिल्प में कैसा बदलाव उपस्थित किया है। इस खण्ड के माध्यम से पाठक उन्हें नए सिरे से समझने की प्रेरणा देगा ।  

महादेवी साहित्य (खण्ड तीन)
'यामा' और 'दीपशिखा' की संवेदनशील करुणामयी कवयित्री की रचनाशीलता का बहिर्मुखी प्रवाह उनके संस्मरणात्मक साहित्य में मिलता है ऐसे अनेक पात्र जो सामाजिक विधान के अति साधारण 'सामान्यों' की श्रेणी में आयेंगे महादेवी की करुणा के स्पर्श से इतने सजीव और मर्मस्पर्शी हो गए हैं कि उनसे परिचय के बाद पाठक के लिए उन्हें भुलाना संभव नहीं हो सकतामहादेवी ने अनेक पीड़ितों को अपनी लेखनी के स्पर्श से आत्म के वृत्त में कुछ ऐसे समेट लिया है कि वे उनके परिचित कम परिवारी ही अधिक प्रतीत होते हैं ।  अपने पात्रों के अंतर्बाह्य व्यक्तित्व को पाठक की कल्पना के समक्ष साकार खड़ा कर देने में वे जितनी सिद्धहस्त हैं, उतनी ही उनके परिवेश, उनकी स्थिति के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों और समाज की विवेचना और यथावश्यक आलोचना करने में समर्थ हैंवह अपने पत्रों का स्मरण और आत्मीयता से करती हैं ।  
इस खण्ड में सम्मिलित अनुक्रम के अंतर्गत आप निम्नलिखित संस्मरणात्मक साहित्य पढ़ सकते हैं । 
अतीत के चलचित्र के अंतर्गत......
रामा, भाभी, बिंदा, सबिया, बिट्टो, दो फूल, घीसा, सबला, अलोपी, बदलू, लछमा,
स्मृति की रेखाएँ के अंतर्गत.......
भक्तिन, चीनी फेरीवाला, पर्वत पुत्र, मुन्नू की माई, ठकुरी बाबा, बिबिया, गुंगिया
पथ के साथी के अंतर्गत........
कवीन्द्र, दद्दा, सुभद्रा, निराला भाई, सुँघनी साहु, पन्त जी, कवि बापू
मेरा परिवार के अंतर्गत ......
नीलकंठ, गिल्लू, सोना, दुर्मुख, गौरा, नीलू, निक्की, रोज़ी और रानी 
स्मारिका के अंतर्गत.....
पुण्य स्मरण, जवाहर भाई, राजेन्द्र बाबू, संत राजर्षि, परिशिष्ट 

 महादेवी साहित्य (खण्ड चार)
महादेवी साहित्य के इस खंड में उनका चिंतनपरक विवेचनात्मक लेखन संकलित है।   इन लेखों में चारों ओर के जीवन और समाज के प्रति गहरे सरोकार और प्रखर बौद्धिकता से संपन्न उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष उजागर होता है जो अपने समय में पूरी तरह स्थित है। विभिन्न संदर्भों में समय-समय पर रचित इन लेखों का विषय-विस्तार विस्मयकारी हैइनमें संस्कृति जैसे अवधारणात्मक विषय से लेकर राष्ट्र भाषा शिक्षा परम्परा, सामयिक समस्या जैसे प्रस्तुत विषयों पर उनकी गहरी पकड़ का परिचय मिलता है । पर इनकी चिंता का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र है'नारी जीवन' उन्होंने 'श्रृंखला की कड़ियाँ' से आरम्भ कर 'नए दशक में महिलाओं का स्थान' तक आधुनिक समाज में नारी जीवन के अनेक पक्षों और समस्याओं पर विचार किया है । कविताओं की वेदना-विगलित आत्मस्थ विरहिणी, यहाँ स्त्री के अधिकारों, घर और बाहर के जीवन में उसकी भूमिका, उसके अर्थ-स्वातंत्र्य, हिन्दू पत्नी की दृष्टि से उसकी हैसियत जैसे नाजुक विषयों पर जितनी बेबाक और मुखर पैरोकार के रूप में सामने आती है, वह आज किसी भी 'नारीवादी' के लिए स्पर्धा का विषय हो सकता हैउनका साहित्य-चिंतन बड़ी सफलता से उस 'मिथ' को तोड़ता है, जिसके कारण लम्बे समय तक छायावादी लेखन को पलायनवाद और वायवीपन के आक्षेप को झेलना पड़ा। महादेवी ने अपने काव्य-संग्रहों की भूमिकाओं में, व्यापाक परिप्रेक्ष्य में छायावादी भाव-बोध और रचना दृष्टि का विस्तृत-विवेचन करते हुए उसका अपना पक्ष प्रस्तुत किया 

संपादक के संदर्भ में.......
निर्मला जैन का जन्म 1932 दिल्ली में हुआ। इन्होंने एम.ए., पी.एच. डी., डी. लिट की उपाधि दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की 1956 से 1970, स्थानीय लेडी श्रीराम कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष । 1970-81, दिल्ली विश्वविद्यालय ( दक्षिण परिसर) हिन्दी विभाग में रीडर । 1981-84, तक हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष। 1984-96 तक प्रभारी प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय ( दक्षिण परिसर ) 1962 से अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना, अनुवाद और संपादन में  संलग्न ।