Wednesday, 30 May 2012

सम्पूर्ण नौ खण्डों में (महासमर भव्य संस्करण) 




Book : Mahasamar( Total Nine Parts) 
Author  : Narendra Kohli
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `5400(HB)  
Total Pages : 3325
Size (Inches) : 6.50X9.75

Category  : Novel/A Story of Mahabharat


सुप्रसिद्ध कथाकार नरेंद्र कोहली ने महाभारत की घटनाओं को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण बंधन वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के लगभग 25 वर्ष होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है । इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष  2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । 
महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध, आनुषंगिक) प्रकाशित हैं ।


सम्पूर्ण नौ खण्डों का मूल्य : 5400 रूपये है और प्रत्येक खंड का मूल्य 600 रुपये
            
महासमर-बंधन (खंड एक)
ISBN  : 81-7055-142-0
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-अधिकार (खंड दो)
ISBN : 81-7055-198-6
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-कर्म ( खंड तीन)
ISBN :  81-7055-229-X
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-धर्म (खंड चार)
ISBN :  81-7055-300-8
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-अंतराल(खंड पाँच)
ISBN :  81-7055-399-7
मूल्य : 600 रुपये 
 महासमर-प्रच्छन्न(खंड छह)
ISBN : 81-7055-512-4
मूल्य : 600 रुपये 
 महासमर-प्रत्यक्ष(खंड-सात)
ISBN :  978-81-8143-940-6
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-निर्बन्ध(खंड-आठ)
ISBN :  978-81-8143-930-7
मूल्य : 600 रुपये 
महासमर-आनुषंगिक(खंड नौ)
ISBN   :  81-7055-264-8
मूल्य : 600 रुपये 





डॉ.गोपाल राय के शब्दों में लेखक और पुस्तक के सन्दर्भ में ...
"नरेंद्र कोहली अपने समकालीन साहित्यकारों से पर्याप्त भिन्न हैं  । उन्होंने प्रख्यात कथाएं लिखी हैं वे  सर्वथा  मौलिक हैं । वे आधुनिक हैं, किन्तु पश्चिम का अनुकरण नहीं करते । भारतीयता की जड़ों तक पहुँचते हैं, किन्तु पुरातनपंथी नहीं हैं । नरेन्द्र कोहली ने महाभारत को महासमर के रूप में अपने युग में पूर्णत: जीवंत कर दिया है । इस उपन्यास में उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्ण विराटता के साथ अत्यंत मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया है । जीवन के वास्तविक रूप से संबंधित प्रश्नों का समाधान वे अनुभूति और तर्क के आधार पर देते हैं । इस कृति में आप महाभारत पढ़ने बैठेंगे और अपना जीवन पढ़ कर उठेंगे । प्रसिद्ध रूसी भाषाशास्त्री तातियाना ओरांस्काया इसकी तुलना लेव ताल्स्ताय के उपन्यास 'युद्ध और शांति' से करती हैं । 'महासमर' की कथा मनुष्य के उस अनवरत युद्ध की कथा है, जो उसे अपने बाहरी और भीतरी शत्रुओं के साथ निरंतर करना पड़ता है । संसार में चारों ओर लोभ और स्वार्थ की शक्तियाँ संघर्षरत हैं । बाहर से अधिक उसे अपनों से लड़ना पड़ता है । लोभ ,त्रास और स्वार्थ के विरुद्ध धर्म के इस सात्विक युद्ध को नरेंद्र कोहली एक आधुनिक और मौलिक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं ।" 


प्रत्येक खंड के बारे में संक्षिप्त परिचय ...
महासमर-बंधन (खंड एक)
'बंधन' शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के मनोविज्ञान तथा जीवन-मूल्यों की कथा है  । घटनाओं की दृष्टि से यह सत्यवती के हस्तिनापुर में आने तथा हस्तिनापुर से चले जाने के मध्य की अवधि की कथा है, जिसमें जीवन के उच्च आध्यात्मिक मूल्य जीवन की निम्नता और भौतिकता के सम्मुख असमर्थ होते प्रतीत होते हैं और हस्तिनापुर का जीवन महाभारत के युद्ध की दिशा ग्रहण करने लगता है  महासमर-बंधन (खंड एक) स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि  किस प्रकार शांतनु, सत्यवती तथा भीष्म के कर्म-बन्धनों से हस्तिनापुर बँध चुका है और भीष्म भी उससे मुक्त होने की स्थिति में नहीं थे

महासमर-अधिकार (खंड दो)
'अधिकार' की कहानी हस्तिनापुर में पांडवों के शैशव से आरम्भ हो कर वारणावत के अग्निकांड पर जा कर समाप्त होती है वस्तुत: यह खंड अधिकारों की व्याख्या, अधिकारों के लिए हस्तिनापुर में निरंतर होने वाले षड्यंत्र, अधिकार को प्राप्त करने की तैयारी तथा संघर्ष की कथा है

महासमर-कर्म ( खंड तीन)
'कर्म' की  कथा युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के पश्चात की कथा है इस राज्याभिषेक के पीछे मथुरा की यादव शक्ति है वारणावत से जीवित बच कर पांडव पांचालों की राजधानी काम्पिल्य पहुँचाने की योजना इस कथा खंड का महत्त्वपूर्ण पक्ष है  ।


महासमर-धर्म (खंड चार)

इस खंड में बताया गया है कि पांडवों को राज्य के रूप में खाण्डवप्रस्थ मिला, जहाँ न कृषि है, न व्यापारसम्पूर्ण क्षेत्र में अराजकता फैली हुई है  इस  खंड में  उस युग के चरित्रों  तथा उनके धर्म का विश्लेषण भी किया गया है अर्जुन और कृष्ण ने अग्नि के साथ मिलकर खांडववन को नष्ट कर डाला क्या यह धर्म था? जरासन्ध जैसा पराक्रमी राजा भीम के हाथों कैसे मारा गया और उसका पुत्र क्यों खड़ा देखता रहा ?  अंत में हस्तिनापुर में होने वाली द्यूत-सभा ।  धर्मराज होते हुए भी क्यों युधिष्ठिर द्यूत में सम्मिलित हुए ?


महासमर-अंतराल (खंड पाँच)
इस खंड में द्यूत में हारने के पश्चात् पांडवों के वनवास की कथा है कुंती, पाण्डु के साथ शत-श्रृंग पर वनवास करने गई थी लाक्षागृह के जलने पर, वह अपने पुत्रों के साथ हिडिम्ब वन में भी रही थी महाभारत की कथा के अंतिम चरण में, उसने धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुर के साथ भी वनवास किया था किन्तु अपने पुत्रों के विकट कष्ट के इन दिनों में वह उनके साथ वन में नहीं गयी वह न द्वारका गयी, न भोजपुर वह हस्तिनापुर में विदुर के घर पर क्यों रही ? इस प्रकार अनेक प्रश्नों के उत्तर निर्दोष तर्कों के आधार पर अंतराल में प्रस्तुत किये हैं
महासमर-प्रच्छन्न (खंड छह)
पांडवों का अज्ञातवास, महाभारत-कथा का एक बहुत आकर्षक स्थल है दुर्योधन की गृध्र दृष्टि से पांडव कैसे छिपे रह सके ? अपने अज्ञातवास के लिए पांडवों ने विराटनगर को ही क्यों चुना पांडवों के शत्रुओं में प्रछन्न मित्र कहाँ थे और मित्रों में प्रच्छन्न शत्रु कहाँ पनप रहे थे ? ऐसे ही अनेक पश्नों को समेटकर आगे बढती है, महासमर के इस छठे खंड प्रच्छन्न की कथा


महासमर-प्रत्यक्ष (खंड सात)
इसमें युद्ध के उद्योग और फिर युद्ध के प्रथम चरण अर्थात भीष्म पर्व की कथा है कथा तो यही है कि पांडवों ने अपने सारे मित्रों से सहायता माँगी कृष्ण से भी इस खंड में कुंती और कर्ण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ है और कुंती ने प्रत्यक्ष किया है कर्ण की महानता को ।   बताया है उसे कि वह क्या कर रहा है, क्या करता रहा है ।   बहुत कुछ प्रत्यक्ष हुआ है, महासमर के इस सातवें खंड प्रत्यक्ष में । 


महासमर-निर्बन्ध (खंड आठ)
निर्बन्ध, महासमर का आठवाँ खंड है इसकी कथा द्रोण पर्व से आरम्भ होकर शांति पर्व तक चलती है कथा का अधिकांश भाग तो युद्धक्षेत्र में से होकर ही अपनी यात्रा करता है किन्तु यह युद्ध केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं है यह टकराहट मूल्यों और सिद्धान्तों की भी है और प्रकृति और प्रवृत्तियों की भी  ।  इस खंड में पांडवों के लिए माया का बंधन टूट गया है वे खुली आँखों से इस जीवन और सृष्टि का वास्तविक रूप देख सकते हैं अब वे उस मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहाँ वे स्वर्गारोहण भी कर सकते हैं और संसारारोहण भी । 


महासमर-आनुषंगिक (खंड नौ)
महासमर का यह नवम और विशेष खंड है।  इसे आनुषंगिक कहा गया, क्योंकि इसमें महासमर की कथा नहीं,  उस कथा को समझने के सूत्र हैं ।   हम इसे महासमर का नेपथ्य भी कह सकते हैं यह सामग्री पहले 'जहाँ है धर्म, वहीँ है जय' के रूप में प्रकाशित हुई थी अनेक विद्वानों ने इसे महासमर की भूमिका के विषय में देखा है अत: इसे महासमर के रूप में ही प्रकाशित किया गया है  ।  प्रश्न महाभारत की प्रासंगिकता का भी है अत: उक्त विषय पर लिखा गया यह निबंध, जो ओस्लो (नार्वे में मार्च 2008 की एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया था, इस खंड में इस आशा से सम्मिलित कर दिया गया है, कि पाठक इसके माध्यम से 'महासमर' को ही नहीं ' 'महाभारत' को भी सघन रूप से ग्रहण कर पाएंगे । 


लेखक के संदर्भ में....

नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970  में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में । बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन ।  1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है। इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष  2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं । महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है।जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये। इसी महासमर के अंतर्गततीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं ।


28  अप्रैल 2012 , नवभारत टाइम्स में नरेन्द्र कोहली