Saturday, 26 May 2012

साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा




वरिष्ठ लेखक जवरीमल्ल पारख द्वारा लिखित पुस्तक, 'साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा' 



वाणी प्रकाशन की वेबसाइट से इस पुस्तक की जानकारी के लिए इस लिंक पर जाए http://vaniprakashan.in/Sajha_Sanskriti,Sampradayik_Aatankvaad_Aur_Hindi_Cinema%28HB%29-p/1266.html

Book : Sajha Sanskriti, Sampradayik Aatankvaad 
            Aur Hindi Cinema 
Author  : Javrimal Parakh
Publisher : Vani Prakashan 
Price : 
`450(HB)  
ISBN : 978-93-5000-946-8
Total Pages : 271
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Cinema 


पुस्तक के सन्दर्भ में .........
हम जब किसी धार्मिक समुदाय की बात करते हैं, तो इस बात को भूल जाते हैं कि वह समुदाय एक आयामी नहीं होता  ।  उसमें  भी वे सभी भेद- विभेद होते हैं  जो दूसरे धार्मिक समुदायों में होते हैं  । एक अभिजात मुसलमान और एक गरीब मुसलमान का धर्म भले ही एक हो ,लेकिन उनके हित एक से नहीं होते । यदि ऐसा होता तो ('मुगले आज़म' फ़िल्म के सन्दर्भ में ) अकबर सलीम की शादी ख़ुशी-ख़ुशी अनारकली से कर देता,क्योंकि सलीम और अनारकली का धर्म तो एक ही था  दूसरा पहलू देखें  तो यदि सलीम किसी राजपूत स्त्री से विवाह करना चाहता तो क्या अकबर एतराज़  करता ? नहीं , इतिहास हमें बताता है मुग़ल और राजपूत दोनों का धर्म अलग जरुर था,लेकिन दोनों का सम्बन्ध अभिजात वर्ग से था  यह विचार का विषय है कि 1947 से पहले और 1947 के बाद भी लगभग दो दशकों तक मुसलमान समुदाय पर जो भी फ़िल्में बनीं, वे प्राय: अभिजात वर्ग का प्रस्तुतीकरण करती थीं  इन फ़िल्मों की साथर्कता सिर्फ इतनी  थी कि इनके माध्यम से सामंती पतनशीलता को मध्ययुगीन आदर्शवादिता से ढंकने की कोशिश जरुर दिखती थी । इन फ़िल्मों  के माध्यम से मुसलमान की एक खास तरह की छवि निर्मित की गयी जो उन करोड़ों  मुसलमान से मेल नहीं खाती थी,जो हिन्दुओं  की तरह खेतों और कारखानों में काम करते थे , दफ्तरों में क्लर्की करते थे या स्कूलों -कॉलेजों में पढ़ते थे  जो  न तो बड़ी -बड़ी हवेलियों में रहते थे , न खालिस उर्दू बोल पाते थे और न ही शेरो शायरी कर पाते थे  इन ढहते सामंती वर्ग के यथार्थ को पहली बार सही परिप्रेक्ष्य में ख्वाजा अहमद अब्बासी  ने 'आसमान महल ' (1965) के माध्यम से पेश किया था ।  लेकिन इस फ़िल्म  को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल सका । इसके बाद ' गरम हवा ' (1973) ने बताया कि  मुसलमान भी वैसे ही होते हैं जैसे हिन्दू ।  इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा ।  राजेंद्र सिंह  बेदी ( दस्तक ),सईद अख्तर मिर्ज़ा ( सलीम लंगड़े  पे मत रो, नसीम ), श्याम बेनेगल ( मम्मो ,हरी -भरी ), मनमोहन देसाई ( कुली ), शमित अमीन ( चक दे इंडिया ) और कबीर खान (न्यूयार्क ), करण जौहर ( माई नेम इज़  खान ) और  कई अन्य फ़िल्मकारों ने उन आम मुसलमानों को अपना पात्र बनाया जिन्हें कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है 


लेखक के सन्दर्भ में.....
जवरीमल्ल पारख का जन्म 1952 में जोधपुर , राजस्थान में हुआ था  । इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय से 1973 में  बी.ए. आनर्स और 1975 में एम.ए . हिंदी प्रथम श्रेणी से उतीर्ण  करने के बाद , प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में 'नयी कविता का अंत:संघर्ष'  विषय पर पीएच.डी.की उपाधि  सन 1984, में जवाहर लाल नेहरु  विश्वविद्यालय नयी दिल्ली से प्राप्त की । 1975 से 1987 तक  रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय में व्याख्याता रहे ,1987 से 1989 तक इंदिरा गाँधी  राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय  नयी दिल्ली में व्याख्याता रहे । 1989 से 1998 तक रीडर और 1998  से प्रोफेसर , 2004 से 2007  तक मानविकी विद्यापीठ  के निर्देशक पद पर कार्य किया 
सम्प्रति :-  इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर पद पर कार्यरत 
सिनेमा सम्बन्धी पुस्तकें : हिंदी  सिनेमा का समाजशास्त्र, लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ । साहित्य सम्बन्धी पुस्तकें- आधुनिक हिंदी साहित्य : मूल्यांकन और पुनमुल्यांकन, संस्कृति और समीक्षा के सवाल, नयी कविता का वैचारिक परिप्रेक्ष्य।  


मीडिया रिपोर्ट्स

दैनिक भास्कर 26 मई 2012 शनिवार की प्रकाशित समीक्षा 
http://epaper.bhaskar.com/detail.php?id=146184&boxid=52625520937&ch=cph&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05%2F26%2F2012&editioncode=194&pageno=7&view=image

रविवार 17 जून 2012 प्रभात खबर में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा http://epaper.prabhatkhabar.com/epapermain.aspx?pppp=8&queryed=11&eddate=6/17/2012%2012:00:00%20AM



सपनों की मंडी






नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया द्वारा मीडिया फेलोशिप के तहत शोध व य़ू.एन.-एफ .पी .ए.-लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित कृति 'सपनों की मंडी' । रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार से पुरस्कृत पत्रकार,लेखिका गीताश्री ने मानव तस्करी की वास्तविकता को पेश किया है । प्रस्तुत है 'सपनों की मंडी' का दैनिक भास्कर में, शनिवार 26 मई 2012 की प्रकशित समीक्षा । आप इस लिंक के माध्यम से यह समीक्षा पढ़ सकते हैं  ।  

http://epaper.bhaskar.com/detail.php?id=146184&boxid=52625520781&ch=cph&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=05%2F26%2F2012&editioncode=194&pageno=7&view=image


इस लिंक के मध्यम से आप वाणी प्रकाशन की वेबसाइट से पुस्तक की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । http://vaniprakashan.in 


प्रस्तुत है 'सपनों की मंडी' के लोकार्पण पर कवरेज करती मीडिया की रिपोर्ट।





Book : Sapanon Ki Mandi
Author  : Geetashri
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `200(HB)  
ISBN : 978-93-5072-161-2
Total Pages : 148
Size (Inches) : 
5.75X8.75
Category  : Feminism/Social Science


पुस्तक के सन्दर्भ में.........
हिन्दी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर-साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, जो हुआ है, उसमें विषय विशेष की सूक्ष्मता से पड़ताल नहीं की गयी है । सपनों की मंडी के माध्यम से लेखिका गीताश्री  ने तकरीबन एक दशक तक शोध एवं  यात्राओं और उनके अनुभवों के आधार पर मानव तस्करी के कारोबार पर यह किताब लिखी है । इस किताब में ख़ास तौर पर आदिवासी समुदाय की लड़कियों की तस्करी, उनके शोषण और नारकीय जीवन का खुलासा किया है । किताब में कई चौंका देने वाले तथ्यों से पाठक रूबरू होते हैं  । लेखिका ने सभ्य समाज और आदिवासी समाज के बीच जो अंतर है उसकी एक समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या की है । किताब में जिंदगी के उस अंधेरे हिस्से की कहानी है, जिसमें एक बाज़ार होता है  ।  कुछ खरीददार होते हैं ।  कुछ बेचने वाले होते हैं और फिर मासूम लड़कियों का सौदा ।  लेखिका कहती हैं कि ताज्जुब तो तब होता है जब बेचने वाला कोई सगा निकलता है ।  लेखिका स्पष्ट तौर पर कहना चाहती हैं  की, सपनों की मंडी में मासूम लड़कियों के सपनों के सौदे की  कहानी है । सपनों की कब्र से उठती हुई उनकी चीखें हैं ।


पुस्तक बताती है, क्या है ट्रैफिकिंग ? 
ट्रैफिकिंग का आशय बहला-फुसलाकर या जबरन, महिलाओं  या किशोरियों का आगमन, जिसमें उनका विभिन्न स्तरों पर शोषण किया जाता है । उनसे जबरन मज़दूरी और वेश्यावृत्ति करना । इसमें उन्हें किसी भी रूप में खरीदना, बेचना और एक स्थान से दूसरे स्थान पर उनकी इच्छा के विरुध्द ले जाना शामिल है ।



यूएन की रिपोर्ट ?

सन 2007 में पेश संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों को पंजाब और हरियाणा में बेचने का चलन बढ़ा है । बिकने के बाद वहां बेटा पैदा करने तक उनका यौन शोषण किया जाता है ।  यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट फंड द्वारा तैयार की गयी ' हयूमन ट्रैफिकिंग एक्सप्लोरिंग वलनेरबिलिटीज एंड रिसपोंसेज इन साउथ एशिया' नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर लिंगानुपात वाले गरीब जिलों से कम लिंगानुपात वाले अमीर राज्यों में लड़कियों की मानव तस्करी होती है ।


लेखिका के सन्दर्भ में.....
गीताश्री का जन्म मुजफ्फरपुर ( बिहार ) में हुआ । सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पत्रकार ( वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं । सम्प्रति : आउटलुक (हिन्दी ) दिल्ली में सहायक संपादक