Friday, 25 May 2012

अवधी ग्रन्थावली (सम्पूर्ण सात खण्डों में )



 
अवधी ग्रन्थावली के लगभग चार हजार पृष्ठों में समग्र अवधी साहित्य की पड़ताल है यानी हिन्दी की आधारभूत बोली अवधी के संरक्षण-संवर्द्धन का अनूठा और प्रथम प्रयास है  । अवध के क्षेत्र-विस्तार की अवधारणा समय-समय पर परिवर्तित होती रही है । ब्रिटिश शासनकाल में 'यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ ऑफ़ आगरा एंड अवध' और स्वतंत्र भारत में 'संयुक्त प्रान्त' के नवीन नाम 'उत्तर प्रदेश' के अंग-रूप में अवध-क्षेत्र में चौदह जिले आते हैं, फैज़ाबाद, अम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव, खीरी, लखीमपुर, सीतापुर, हरदोई, गोंडा और बहराइच । इस प्रकार अवध-क्षेत्र पूर्व में बनारस से ले कर पश्चिम में बरेली तक और उत्तर में नेपाल के सीमा-क्षेत्र से दक्षिण में इलाहाबाद तक फैला हुआ है। 

Book : Awadhi Granthawali ( Total Seven Parts)
Edited By : Jagdeesh peeyush
Publisher : Vani Prakashan 
Price  : ` 7000
Total Pages :  3165
Size( Inches) :  10 X 6.25
Category : (Granthawali)
    
Awadhi Granthawali-1
 ISBN 978-81-8143-900-0
Awadhi Granthawali-2
 ISBN 978-81-8143-902-4
Awadhi Granthawali-3
 ISBN  978-81-8143-903-1
Awadhi Granthawali-4
 ISBN 978-81-8143-904-8
Awadhi Granthawali-5
 ISBN  978-81-8143-905-5
Awadhi Granthawali-6
 ISBN  978-93-5000-147-9
Awadhi Granthawali-7
  ISBN  978-93-5000-150-9

Note:- Parts  Awadhi Granthawali 1-5 ( An Anthology of Awadhi traditional and modern literature) and Part-6 ( An Anthology of Awadhi traditional and Lokokti Khand) and Part -7 ( An Anthology of Awadhi traditional and Awadhi Dictionary)

 (खण्ड एक  : लोक साहित्य-खण्ड)
(खण्ड दो : लोक गाथा-खण्ड)
(खण्ड तीन: प्राचीन साहित्य-खण्ड)
(खण्ड चार:आधुनिक साहित्य-खंड)
(खण्ड पाँच:लोक कथा/गद्य खण्ड)
( खण्ड छह :शब्दकोश )
(खण्ड सात : लोकोक्ति खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के सन्दर्भ में....

अवधी ग्रन्थावली(खण्ड एक : लोक साहित्य-खंड)
इस खण्ड में  अवधी के लोक साहित्य पर वृहद् चर्चा की गयी है । लोक साहित्य किसी काल-विशेष का न हो कर युगों से चला आता हुआ, वह साहित्य है जो हमें जन-जीवन के बीच प्राय: मौखिक रूप से ही प्राप्त होता है । ऐसे साहित्य में हमारे समाज के लिए व्यापक सामग्री प्राप्त होती है । मनुष्य कठिन परिश्रम के बाद थोड़ा सा समय अपने मनोरंजन के लिए चाहता है । इसके लिए वह गीत गा कर, कथा सुन कर प्राप्त करता है । क्योंकि ' लोक-साहित्य' मानव के सम्पूर्ण रीति-रिवाज, आचार-विचार और उसके व्यवहार का स्वरूप है जो किसी प्रकार के बन्धन से जकड़ा हुआ नहीं होता । संस्कार-गीतों, श्रम-गीतों, त्योहार-गीतों, जातीय-गीतों, ऋतुओं-गीतों, गाथाओं आदि की विपुल सम्पदा अवधी के पास है ।
    
अवधी ग्रन्थावली (खण्ड दो : लोक गाथा-खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के इस खण्ड में  अवधी की पैंतीस गाथाओं को पहली बार एक साथ संगृहित किया गया है ।
लोकगाथा वस्तुत: मानव समाज का आदिम साहित्यिक रूप है । ऋग्वेद के कुछ संवाद सूक्तों और बारामासी गाथाओं को प्राचीनतम लोकगाथा माना जा सकता है । भारत की विभिन्न भाषाओं में जो लोकगीत पाए जाते हैं, उन्हें दो भागों में विभक्त किया जा सकता है  । पहले प्रकार के वे गीत हैं जो आकार में छोटे होते हैं, जिसमें कथानक का अभाव होता है और जिनकी प्रधान विशेषता उनकी गेयता है । दूसरे प्रकार के वे गीत हैं, जो आकार में बड़े हैं, जिनमें कथानक की प्रधानता के साथ गेयता भी है । काव्य की भाषा में इन्हें मुक्तक और प्रबंध कहा गया है । मजनूँ, भरथरी, गोपीचंद, सोरठी आदि के गीत द्वितीय श्रेणी में रखे जा सकते हैं ।

अवधी ग्रन्थावली (खण्ड तीन : प्राचीन साहित्य-खण्ड)
अवधी का साहित्यिक अवदान गुरु गोरखनाथ की कुछ बानियों, अमीर खुसरो की पहेलियों से चल कर संतों के साहित्य में प्रचुरता से मुखरित हुआ है । कुतबन, मंझन, मुल्ला दाऊद के साथ ही कबीर ने अपनी पूर्वी बोली पर गर्व किया है । जायसी, तुलसी और आधुनिक कवियों ने अवधी के साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया है । इसी समृद्धि की एक विस्तृत झलक इस खण्ड में प्रस्तुत की गयी है।

अवधी  ग्रन्थावली (खण्ड चार : आधुनिक साहित्य-खण्ड)
अवधी ग्रन्थावली के इस खण्ड में आधुनिक काल के अवधी कवियों की रचनाएँ पेश की गयी हैं । इस खण्ड में अवधी के प्रमुख और प्रतिनिधि कवियों की रचनाएँ दी गयी हैं । इनमें जो नाम शामिल हैं वे हैं, बलभद्र प्रसाद दीक्षित पढीस, वंशीधर शुक्ल, रमई काका, गुरुभक्त सिंह मृगेश, द्वारका प्रसाद मिश्र, त्रिलोचन शास्त्री, पारस भ्रमर, विकल गोंडवी, आद्याप्रसाद उन्मत्त,  जुमई खां आज़ाद, विकल सकेती, श्रीपाल सिंह क्षेम, निशंक जी, रूपनारायण त्रिपाठी, हरिश्चंद पाण्डेय 'सरल', बरखा रानी, डॉ.श्याम तिवारी, डॉ ब्रजेन्द्र अवस्थी, डॉ. श्याम सुंदर मिश्र मधुप, सत्यधर शुक्ल, लवकुश दीक्षित,राम अकबाल त्रिपाठी अनजान, अरविन्द द्विवेदी, सतीश आर्य, अशोक टाटम्बरी, आद्या प्रसाद प्रदीप, मनोज जी, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत, कमल नयन पाण्डेय, रफीक सदानी, डॉ. राधा पाण्डेय, विद्याविन्दु सिंह, दूधनाथ शर्मा श्रीष, ओंकार उपाध्याय, सच्चिदानंद तिवारी शलभ, ब्रजेन्द्र खरे, नागेन्द्र अनुज, सुनील प्रभाकर, दीपक रूहानी,निर्झर प्रतापगढ़ी, कवि अमरेश, कुसुम द्विवेदी, अर्चना शुक्ल, कृष्णकांत एकलव्य, ब्रजनाथ, शोभनाथ अनाड़ी, विजय बहादुर सिंह, अक्खड़, जगदीश नीरद, लताश्री, व्यंजना शुक्ला, मोहनचंद्र त्रिपाठी, ताराचंद तन्हा, अनुराग आग्नेय, ब्रह्मसिंह चौहान, उमेश चौहान, डॉ.सियाराम, आनंद प्रकाश अवस्थी नन्हे भैया, दिनेश सिंह, जगदीश पीयूष, डॉ. सुनील सिध्दार्थ, भारतेंदु मिश्र  ।
कवियों के गीतों के साथ-साथ गज़लें भी शामिल हैं, जिससे पता चलता है कि  अवधी अपने को लगातार नया करती रही है ।
       
अवधी ग्रन्थावली ( खण्ड पाँच : लोक-कथा/गद्य खण्ड) 
लोककथाएँ क्या हैं ? कहाँ से आयीं इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत जटिल है ।  इसकी परिभाषा के रूप में हम कह सकते हैं कि ये कथाएँ मानव के भोले-भाले सरल उदगार हैं, इनमें लोक-जीवन का व्यापक चित्र उदघाटित होता है । लोककथाएँ लोकमानस की मर्मस्पर्शी  अभिव्यक्तियाँ हैं। लोककथाएँ लोक मानस  के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का संस्पर्श करती हुई उसके जीवनानुभवों की सम्यक व्याख्या करती हैं, लोकमानस के आचार-विचार,  खान-पान, रीति-रिवाज, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का स्पष्ट प्रतिबिम्ब लोक कथाओं में प्रतिबिम्बित होता है ।

अवधी ग्रन्थावली(खण्ड छह : शब्दकोश)
हिन्दी में शब्दकोशों की परम्परा एक हजार वर्ष पुरानी है । विशेष महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दी का पहला शब्दकोश बनाम व्याकरण ग्रन्थ-दामोदर पंडित का 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' मूलत: अवधी में लिखा गया था । शब्दकोश-निर्माण के लिए एक विशिष्ट प्रविधि अपनायी गयी है । क्योंकि शब्दों की कई कोटियाँ होती हैं, जैसे- तत्सम, तद्भव, देशज और आयातित इसलिए इन चारों स्रोतों को सबसे पहले भली-भाँति खंगाला गया है । शब्द-संग्रह के लिए एक ओर प्रकाशित साहित्य के  उपयोग के साथ भाषा- भाषियों का सर्वेक्षण भी किया गया है ।

अवधी ग्रन्थावली (खण्ड सात : लोकोक्ति खण्ड)
अवधी लोकजीवन में लोकोक्तियाँ उस उद्यान की तरह विद्यमान हैं, जहाँ चमत्कार का प्रकाश है, स्वाभाविकता की हरीतिमा है और आडम्बरहीनता का गौरव है । वहाँ न ठगई का भय है, न कल्पना की भूलभुलैया ।लोकोक्तियाँ अवधी किसानों, ग्रामीणों एवं सभ्यता-संस्कृति के प्रसाद से वंचित लोगों की वह वाणी है, जिसका सहारा पाये बिना कवि की प्रतिभा कुंठित रह जाती है ।
इसमें शब्द-योजना है, सलंकारता  है और एक विशेष प्रकार की लावण्यता एवं चटपटापन । लोकोक्तियों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है मानव जीवन में कोई ऐसी गतिविधि नहीं जो इसके चक्र से बाहर हो, क्योंकि इनमें दुःख-सुख, हर्ष-विषाद, रुचि-अरुचि, ग्लानि-प्रमाद आदि सभी कुछ जन-जीवन का सन्निहित होता है । आचार-विचार, रीति-रिवाज इत्यादि का ज्ञान-विज्ञान अपने यथार्थ रूप में दृष्टिगत हो जाता है। लोकोक्ति-साहित्य संभवत: उतना ही पुराना है जितनी मानव-भाषा । लिखित साहित्य के प्रादुर्भाव से पूर्व ही लोकोक्तियों का जन्म हो चुका था ।

संपादक के सन्दर्भ में ......
जगदीश पीयूष
'तथागत' और 'सुयोधन' नामक हिन्दी खंड काव्य और 'पानी पर हिमालय' जैसी कालजयी कृतियों के रचनाकार जगदीश पीयूष का जन्म 6 अगस्त 1950 को अमेठी में हुआ । वहीँ पर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की । अवधी बोली भाषा के प्रति 35 वर्षों से रचनात्मक सक्रियता । अवधी और लोक साहित्य से संदर्भित अनेक पुस्तकें । अवधी कविताओं के संग्रह 'अँधेरे के हाथ बटेर' पर उ.प्र. हिन्दी संस्थान का जायसी सम्मान । साहित्य सेवा के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । अवधी अध्ययन का द्वार खोलने वाली पुस्तक 'अवधी साहित्य :सर्वेक्षण और समीक्षा' भारतीय व विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में स्वीकृत । आठवें विश्व हिन्दी सम्मलेन   (न्यूयॉर्क, अमेरिका) के अवसर पर विश्व हिन्दी सम्मान से सम्मानित ।

पुस्तक : अवधी ग्रन्थावली (सम्पूर्ण सात खण्डों में ) विशेष सहयोगी
प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित के संदर्भ में ..
लखनऊ विश्वविद्यालय के निवर्तमान हिन्दी विभागाध्यक्ष । प्रो.सूर्यप्रसाद अवधी के विलुप्तप्राय साहित्य को सहेजने में पूरे  मन से सक्रिय रहते हैं ।
डॉ. आद्याप्रसाद सिंह 'प्रदीप' के संदर्भ में ....
गाँव रानपुर पलिया, तहसील कादीपुर सुलतानपुर के निवासी 63 वर्षीय  डॉ. आद्याप्रसाद सिंह 'प्रदीप' पिछले 45 वर्षों से अवधी की सेवा कर रहे हैं ।