Tuesday, 22 May 2012

जीवन के बीचोंबीच



वाणी प्रकाशन द्वारा पोलिश के कवि, गद्यकार, नाटककार और निबन्धकार, तादेऊष रूज़ेविच, की काव्य पुस्तक 'जीवन के बीचोंबीच' का हिन्दी अनुवाद 'पोलिश और हिन्दी' दोनों माध्यम में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है । इसी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 5 की कविता ' ज़िन्दा बच गया' की पक्तियाँ आप से रूबरू होना चाहती हैं, जिसका हिन्दी अनुवाद - आग्नयेष्का कूच्क्येवीच-फ़्राश और प्रख्यात कवि कुँवर नारायण ने किया है । 


मैं चौबीस का हूँ
मेरा वध होना था
बच गया ।
खोखले हैं ये सारे पर्याय
आदमी और जानवर
प्यार और नफ़रत
दुश्मन और दोस्त
अँधेरा और उजाला ।
आदमी भी ठीक उसी तरह मारा जाता है जैसे एक जानवर
मैंने देखा है :
ट्रक पर लदे हलाल किए हुए लोग
उद्धार से परे ।
खाली शब्द हैं ये पवित्र भावनाएँ
पुण्य और पाप
सच और झूठ
सुन्दर और कुरूप
वीरता और कायरता ।.....


Book : Jeevan Ke Beechonbeech
Author  : Tadeusz Rozewicz
Editor : Ashok Vajpeyi Renata Czekalska  

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`350(HB) 
ISBN : 81-7055-837-9
Total Pages : 275
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  :  Poetry

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

सन उन्नीस सौ सत्तर के आस-पास पोलिश कवि तादेऊष रूज़ेविच की कुछ कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद कुछ पत्रिकाओं के माध्यम से भारत में आया था । उनके प्रति आकर्षण इसलिए पैदा हुआ कि उनकी कविता सीधे सच्चाई के साथ-साथ असमंजस और विडम्बना का गहरा अकाट्य-अदम्य बोध भी कराती है ।  तादेऊष रूज़ेविच के विशाल कविता संसार का समग्र आकलन करना सम्भव नहीं है । इतना भर कहना काफी है कि उनकी हिन्दी में यह किंचित व्यवस्थित उपस्थिति पोलिश कविता में उनके कद और महत्त्व के अनुरूप अगर उनकी दृष्टि संवेदना और अनुभवों को थोड़े में अगर किसी हद तक रूपायित कर पायी है तो इस उपक्रम की सार्थकता है ।

लेखक के सन्दर्भ में....
कवि, गद्यकार, नाटककार और निबन्धकार तादेऊष रूज़ेविच का जन्म 9 अक्टूबर, 1925 में हुआ । प्रमुख काव्य-कृतियाँ : अशान्ति, लाल दस्ताना, कविताएँ और चित्र, रुपहली बालियाँ, एक राजकुमार से बातचीत, हरा गुलाब,चुनी हुई कविताएँ, पत्थरतराशी, एक टुकड़ा हमेशा, रिसाइक्लिंग आदि । उनकी कविताओं का अनुवाद बीस से अधिक भाषाओँ में हो चुका है ।   


सम्पादकों के सन्दर्भ में....

'जीवन के बीचोंबीच' पुस्तक का सम्पादन, हिन्दी कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी और पोलैण्ड की हिन्दी विदुषी डॉ. रेनाता चेकाल्स्का ने किया है। 







  

खुला घर



मीलोष की कविता साहस और निर्भीकता के साथ गवाही देने वाली कविता है ।  उसमें यह उम्मीद शामिल है कि सर्वनाश असम्भव है, कि मनुष्यता अन्तत: अपराजेय है, कि कविता स्वयं भाषा और मानवीय संवेदना का अति जीवन है, कि बचना और बचाना संभव है, कि इस खूँखार हत्यारे समय में आशा और आस्था आवश्यक है ।  

Book : Khula Ghar
Author  : Czeslaw Milosz
Translator : Ashok Vajpeyi Renata Czekalska  

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`495(HB) 
ISBN : 81-8143-080-8
Total Pages : 233
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  :  Poetry

पुस्तक के सन्दर्भ में......
संसार में अनिवार्य रूप से मौजूद बुराई और मानवीय यातना को अपनी कविता के केन्द्र में रखनेवाले पोलिश कवि चेस्लाव मीलोष बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विश्व-कविता के अधिकतर उलझे परिदृश्य में एक अनिवार्य नाम रहे हैं ।  इस समय वे सम्भवत: विश्व-कविता के सबसे जेठे सक्रिय कवि हैं ।   अपनी जातीय ईसाई परम्परा से मीलोष ने मनुष्य में अनिवार्यत: मौजूद बुराई का तीखा अहसास पाया था ।  उन्हें पोलैण्ड में पहले नाज़ी और बाद में साम्यवादी तानाशाहियों द्वारा दमित-शोषित किये जाने के दुखद ऐतिहासिक अनुभवों ने मीलोष को इस बुराई को उसकी सारी विकृतियों और उसमें लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण साझेदारी या उनके बारे में अवसरवादी चुप्पी के साथ नजदीक से देखने-समझने का अवसर दिया ।  कविता उनके लिए  इसके विरुद्ध संघर्ष की रणभूमि बनी । 
1911  में जन्मे  मीलोष पिछली शताब्दी में उन महान लेखकों में से हैं, जिन्हें लगभग सारी जिन्दगी अपने देश और भाषा से निर्वासित रहना पड़ा है  ।  उनकी कविता बार-बार हमारे समय में बुराई की शक्तियों द्वारा लोगों के पोषक सम्बन्धों जैसे परिवार, धर्म, पड़ोस, साझी विरासत के ध्वंस की चेष्टाओं के प्रति सचेत रहने की कविता है  ।  उसमें पोलैण्ड में नाजियों द्वारा किये गये यहूदियों के नरसंहार और साम्यवादी सत्ता द्वारा किये गये दूसरे संहारों की तीखी स्मृति सदा सक्रिय है  ।  

लेखक के सन्दर्भ में.....
कवि, आलोचक, उपन्यासकार, अनुवादक चेस्लाव मीलोष का जन्म 1911 में लिथुआनिया में हुआ ।  इन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार 1980 में दिया गया । इनकी काव्यकृतियाँ : पालालगे समय में कविता, तीन जाड़े, दिन का उजाला, कविता पर प्रबन्ध, नामहीन शहर, जहाँ सूरज उगता और जहाँ अस्त होता है, मोती के बारे में स्तुति, अप्राप्य पृथ्वी, वृत्तान्त, नदी किनारे, गली का कुत्ता, यह, दूसरा स्थान, आरफियस और यूरीडीसी । 
अन्य पुस्तकें : क़ैदी दिमाग़, सत्ता हथियाते हुए, इस्सा की घाटी, सुपरिचित यूरोप, महाद्वीप, निजी कर्त्तव्य, उलरो का देश, मातृभूमि की खोज में, मीलोष का कखग । 
विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित मीलोष को कैलिफोर्निया, मिशीगन, हार्वर्ड, लूथ्लीन, याग्येलोन्यन, वीतोल्द महान, रोम, बोलोन आदि अनेक विश्वविद्यालयों  द्वारा मानद उपाधियों से विभूषित किया गया है । उन्हें गुगेनहाइम नोइश्टाड पुरस्कार, लिथुआनिया का सर्वोच्च पुरस्कार आदि अनेक अलंकरण मिले हैं । वर्तमान में पोलैण्ड की सांस्कृतिक राजधानी क्रोकूव में मीलोष इन दिनों रहते हैं । 

अनुवादकों के सन्दर्भ में......
'खुला घर' का हिन्दी अनुवाद कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी और पोलैण्ड की हिन्दी विदुषी डॉ. रेनाता चेकाल्स्का ने किया है । 

दो नोबेल पुरस्कार विजेता कवि



वाणी प्रकाशन अपने पाठकों को एक साहित्य से दूसरे साहित्य से जोड़ने की प्रक्रिया में संलग्न है । अनुवाद एक ऐसा माध्यम है जिससे एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से मिलती है, जिससे साहित्य का आदान-प्रदान होता है । वाणी प्रकाशन का उद्देश्य है कि पूरी दुनिया में लोग हिन्दी साहित्य को जानें ।  लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि हम अन्य राष्ट्रों के साहित्य को भी जानें समझें । आपके समक्ष एक पुस्तक के माध्यम से, दो नोबेल पुरस्कार विजेता कवि जिसमें एक काव्य संकलन 'मेरे चेहरे के नुकूश', जिसे,चेस्लाव मीलोष ने लिखा है । दूसरा काव्य संकलन 'किसी को हटाना होगा यह मलबा' इसे,विस्वावा शिम्बोर्स्का ने लिखा है । प्रस्तुत है ।

Book : Do Nobel Puraskar Vijeta Kavi
            Mere Chehre Ke Nukoosh : Czeslaw Milosz
            Kisi Ko Hatana Hoga Yah Malaba : Wislawa Szymborska
Author  :
Czeslaw Milosz And Wislawa Szymborska
Translator  : Vishnu Khare  
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`125(HB) 
ISBN : 81-7055-828-x
Total Pages : 103
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  :  Poetry


पुस्तक के सन्दर्भ में.......
मेरे चेहरे के नुकूश : चेस्लाव मीलोष, के काव्य 'प्रेम' पृष्ठ संख्या 22 की कुछ पक्तियाँ आप के सामने प्रस्तुत हैं :
प्रेम का अर्थ है अपने को उस तरह देखना सीखना
जैसे कोई दूर की चीजों को देखता है
क्योंकि तुम अनेक के बीच सिर्फ एक वस्तु हो

और जो भी उस तरह देखता है अपने हृदय को,
बिना जाने, कई रोगों से अच्छा करता है -
एक पक्षी और एक वृक्ष उससे कहते हैं : सखा । ...........
किसी को हटाना होगा यह मलबा : विस्वावा शिम्बोर्स्का के काव्य 'एक प्राचीन प्रस्तर युगीन प्रसवन-प्रतिमा' पृष्ठ संख्या 79 की कुछ पक्तियाँ...
बड़ी माता का चेहरा नहीं है
बड़ी माता को चेहरे की जरूरत क्यों होगी ।
चेहरा शरीर के तईं वफादार नहीं रह सकता ।
चेहरा शरीर को परेशान करता है, वह अदैवीय है ।
बड़ी माता की शकल उसका फूलता हुआ पेट है
जिसके बीच में एक अंधी नाफ़ है । .......

लेखकों के सन्दर्भ में.....
चेस्लाव मिलोश

कवि, आलोचक, उपन्यासकार, अनुवादक चेस्लाव मीलोष का जन्म 1911 में लिथुआनिया में हुआ ।  इन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार 1980 में दिया गया । इनकी काव्यकृतियाँ : पालालगे समय में कविता, तीन जाड़े, दिन का उजाला, कविता पर प्रबन्ध, नामहीन शहर, जहाँ सूरज उगता और जहाँ अस्त होता है, मोती के बारे में स्तुति, अप्राप्य पृथ्वी, वृत्तान्त, नदी किनारे, गली का कुत्ता, यह, दूसरा स्थान, आरफियस और यूरीडीसी । 

अन्य पुस्तकें : क़ैदी दिमाग़, सत्ता हथियाते हुए, इस्सा की घाटी, सुपरिचित यूरोप, महाद्वीप, निजी कर्त्तव्य, उलरो का देश, मातृभूमि की खोज में, मीलोष का कखग । 
विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित मीलोष को कैलिफोर्निया, मिशीगन, हार्वर्ड, लूथ्लीन, याग्येलोन्यन, वीतोल्द महान, रोम, बोलोन आदि अनेक विश्वविद्यालयों  द्वारा मानद उपाधियों से विभूषित किया गया है । उन्हें गुगेनहाइम नोइश्टाड पुरस्कार, लिथुआनिया का सर्वोच्च पुरस्कार आदि अनेक अलंकरण मिले हैं । वर्तमान में पोलैण्ड की सांस्कृतिक राजधानी क्रोकूव में मीलोष इन दिनों रहते हैं । 



विस्वावा शिम्बोर्स्का
पोलिश कविता में विस्वावा शिम्बोर्स्का का वही स्थान और सम्मान है जो सम्मान हिन्दी में महादेवी का है । उनका पहला कविता-संग्रह 1952 में प्रकाशित हुआ था ।  1996 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । चेस्लाव मीलोष की तुलना में उन्होंने कम कविताएँ लिखी हैं किन्तु स्वीडी अकादमी ने उनकी कला को 'सशक्त' बताते हुए उसके वैदग्ध्य, उल्लास, परानुभूति और आविष्कार कौशल को पहचाना है ।  अपनी कुशाग्र रचनाशीलता, पोलिश भाषा पर विलक्षण अधिकार और मानव अस्तित्व के मूलभूत मसलों पर बेबाक टिप्पणियों के कारण शिम्बोर्स्का पोलैंड की सर्वाधिक लोकप्रिय कवयित्री बन गयी हैं ।    

अनुवादक के सन्दर्भ में.....
विष्णु खरे

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश में जन्मे कवि, आलोचक, पत्रकार, फिल्म समीक्षक विष्णु खरे पिछले 41  वर्षों से मुख्यत: अंग्रेजी और अंशत: जर्मन से हिन्दी में कविता का अनुवाद कर रहे हैं और महाकाव्यों से लेकर महाकवियों तक के अनुवाद कर चुके हैं ।