Saturday, 19 May 2012

हंस लम्बी कहानियाँ




वाणी प्रकाशन को बेहद खुशी है कि प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव के सम्पादन में जुलाई 1986 में शुरू हुई 'हंस' पत्रिका ने वर्ष 2011 में अपने प्रकाशन के 25  वर्ष पूरे किये हैं । जो अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है । हंस की एक विशेषता रही कि कहानी केन्द्रित पत्रिका होते हुए भी उसने साहित्य की मुख्य धारा में सशक्त हस्तक्षेप कर उसकी दिशा बदलकर रख दी । दो भागों में प्रकाशित 'हंस लम्बी कहानियाँ' पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है

Book : Lambee Kahaniyan- I & II  
Series Editor : Rajendra Yadav
Editor : Archana Verma  

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`750 each part (HB) 
Part One : ISBN : 978-93-5000-816-4
Part Two  : ISBN : 978-93-5000-817-1
Total Pages 840
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Collection of Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में....

'हंस :  लम्बी कहानियाँ'  के सन्दर्भ में प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव के विचार "जिसे हम कहानी कहते हैं, अंग्रेजी में वही' शॉर्ट स्टोरी' है, लेकिन शॉर्ट स्टोरी वह नहीं जिसे हिन्दी के कथा-साहित्य में हम लघुकथा कहते हैं । उपन्यास की तुलना में कहानी का आगमन हिन्दी में खासा देर से हुआ ।  कहानी का पदार्पण तब तक नहीं हुआ था जब तक पत्र-पत्रिकाओं का छपना शुरू नहीं हो गया । कहानी का जन्म और प्रसार पत्रिकाओं के प्रकाशन की शुरुआत के साथ जुड़ा है और पत्रिकाओं में उपलब्ध स्थान की सीमाओं ने कहानी के विस्तार को सीमित और परिभाषित किया है । 'हंस'  के पहले अंक से ही लम्बी कहानी को एक नियमित स्थायी स्तम्भ की तरह शामिल करने का मंतव्य यही था कि कहानी अपनी गुंजाइशों को चरम तक पहुँचा पाए क्योंकि बुनियादी कहानी का सरल विधान वर्णन पर आधारित होता है जबकि कहानी के लम्बे रूपों में नाटकीय संरचना के बीच तत्त्व दिखाई देते हैं । लगभग दस वर्ष तक चलने वाले इस स्तम्भ में लगभग सवा सौ लम्बी लम्बी कहानियाँ छपीं । कभी द्रुत में सामाजिक सरोकारों, दृष्टिकोण की बहुलताओं और टकराहटों को सरपट नापती हुई, कभी विलम्बित में धीरे-धीरे खुलती, फैलती अपने कथ्य के कोनों अँतरों को भरती लास्य में आलस और शिथिल । लम्बी कहानी के सबल और समर्थ कथारूप के तरह स्थापित हो चुकी है, यह आज की युवा रचनाशीलता को देखते स्वयं प्रमाणित है ।"
विश्व साहित्य में नॉवेल्ला की तरह आज हिन्दी में भी लम्बी कहानी समसामयिक यथार्थ के अनुकूल रचनाविधान की तरह अपनी जगह बनाती हुई दिखाई दे रही है । शायद गर्वोक्ति न होगी, तथ्य का बयान कभी गर्वोक्ति
नहीं होती, कि 'हंस' के दस साल लम्बे इस विधा पर जिनका विशेषाधिकार दिखाई देता है, जिनकी छाया शेष परिदृश्य पर न केवल मौजूद, बल्कि मौसम बनाने में भी सक्रिय है वे 'सूखा', 'और अन्त में प्रार्थना', 'कॉमरेड का कोट', 'आर्तनाद', 'तिरिया चरित्तर','जल-प्रान्तर', 'झउआ-बैहार','साज़-नासाज़' जैसी कहानियाँ हंस के पृष्ठों पर ही नमूदार हुई थीं
 
श्रृंखला सम्पादक के सन्दर्भ में.....
प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त, 1929 आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ । आगरा से एम.ए. करने के बाद मथुरा, झाँसी, कोलकाता होते हुए दिल्ली में ।  पहली रचना 'प्रतिहिंसा' 1947 में 'चाँद' के भूतपूर्व सम्पादक श्री रामरखसिंह सहगल के मासिक 'कर्मयोगी' में प्रकाशित । पिछले 25  वर्षों से साहित्यिक पत्रिका 'हंस' का सम्पादन करते हुए दलित और स्त्री विमर्श को हाशिये से साहित्य की मुख्य धारा में लाने के ऐतिहासिक योगदान ।  प्रसार भारती बोर्ड में रहे ।  उपन्यास , कहानी संग्रह, समीक्षा निबन्ध, सम्पादन, अनुवाद, आदि विधाओं में लेखन । 'सारा आकाश', 'उखड़े हुए लोग', 'शह और मात', 'एक इंच मुस्कान' (मन्नू भंडारी के साथ) जैसे चर्चित उपन्यासों के लेखक

संकलन  सम्पादक के सन्दर्भ में......    

अर्चना वर्मा का जन्म 1946  इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ । पिता के तबादले वाली नौकरी के कारण उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में घूमते हुए बचपन बीता और आरम्भिक शिक्षा सम्पन्न हुई । एम.ए. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में की । 1966  से दिल्ली में मिराण्डा हाउस में हिन्दी विभाग से सम्बद्ध । हिन्दी की प्रमुख कथा पत्रिका 'हंस' के साथ पिछले बीस वर्षों से सम्पादकीय सहयोगी के रूप में सम्बन्ध ।  दो कहानी संग्रह, दो कविता संग्रह, एक किशोर उपन्यास, एक आलोचना की किताब प्रकाशित ।    

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