Thursday, 17 May 2012

ओम थानवी जी का साक्षात्कार


 बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोदड़ो के लेखक ओम थानवी जी ने 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को  श्रदांजलि अर्पित की है अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थेएक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए इन्होंने इसका सही रूप  'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है, 16 मई 2012 के 'तहलका'(हिंदी), पत्रिका में प्रकाशित 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के सन्दर्भ में ओम थानवी जी का साक्षात्कार 

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अ-संन्यास

 
हिन्दू परम्परा में संन्यास की तरह गृहस्थ धर्म को भी मूल्य प्रदान किया गया है । भारतीय और मानवशास्त्रीय साहित्य में इस बात के प्रचुर प्रमाण उपलब्ध हैं कि हिन्दू समाज गृहस्थ जीवन को सबसे अधिक महत्त्व देता है । इसके अलावा मध्ययुगीन भारत के सभी भक्ति आन्दोलन भी आत्मसंयमित सांसारिकता का गुणगान करते हैं ।  विख्यात समाजशास्त्री त्रिलोकी नाथ मदन की यह चर्चित रचना संन्यास और गार्हस्थ्य की विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सम्बन्ध की मानवशास्त्रीय खोज करती है । पाँच अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में संन्यास की बजाय सांसारिकता को सद्जीवन मानने का पारम्परिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की चेष्टा की गयी है ।  
 
Book : Asanyas Hindu Sanskriti : Kuchh Vishay Kuchh Vyakhyayen 
Author : Triloki Nath Madan
Translator : Rajiv Kumar 

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`350(HB) 
ISBN : 978-93-5000-098-1
Total Pages 202
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Social Science

पुस्तक के सन्दर्भ में......
प्रोफेसर त्रिलोकी नाथ मदन द्वारा रचित यह विख्यात पुस्तक हिन्दुओं के गृहस्थ जीवन के बारे में है । सामाजिक मानवशास्त्र की इस रचना के अनुसार संन्यास हिन्दू धर्म का सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक आदर्श जरूर है, लेकिन गृहस्थ की भाषा में अनूदित होकर यही संन्यास  सांसारिक बंधनों में जीते हुए आत्मनियंत्रित और विरक्ति का भाव ग्रहण कर लेता है । इस लिहाज से ये सांसारिक सम्बन्ध अपने-आप में बुरे नहीं हैं । मनुष्य को सिर्फ इन सम्बन्धों का दास होने से बचना है। उसका लक्ष्य है सम्पूर्ण भोग-विलास और सम्पूर्ण त्याग के बीच के बिन्दु की तलाश करना । 
गृहस्थ की परिभाषा में सद्जीवन एक सांसारिक जीवन है।  पुस्तक के सभी अध्याय इसी विषय वस्तु का विस्तार हैं । सबसे पहले गार्हस्थ्य सम्बन्धी विचारधारा की व्याख्या की गयी है, जिसमें धनधान्य से परिपूर्ण उत्तम जीवन और साथ ही मानसिक वैराग्य का वर्णन है । दूसरे अध्याय में गृहस्थ की जीवन-शैली में मांगलिकता और शुद्धता का महत्व आँका गया है । तीसरे अध्याय में वैराग्य और श्रृंगारिकता के बीच सन्तुलन बनाने और दोनों के द्वैध से मुक्त होने के प्रयास की चर्चा है ।  चौथा अध्याय शिव (उत्तम ) की सत्ता स्वीकारता है और कामनाओं को सदाचरण के अधीन रखने का समर्थन करता है । पाँचवें अध्याय के मुताबिक उत्तम जीवन की सर्वोत्कृष्ट साक्षी उत्तम मृत्यु है, जिसका व्यक्ति को निर्भय होकर वर्णन करना चाहिए । 

यह परम्परा हमें बताती है कि उत्तम जीवन की परिभाषाएँ समय के साथ बदलती हैं, नये नैतिक मूल्यों  का आविर्भाव होता है और उनके  साथ नयी चिन्ताएँ जन्म लेती हैं ।  इस प्रकार आधुनिक भारतीय को पश्चिम प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता, विकास और लोकतंत्र के विचारों के सन्दर्भ में अपने जीवन को परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है ।  लेकिन एक संस्कृति की परम्पराओं का निर्वाह दूसरी संस्कृति में आसानी से नहीं होता ।  आधुनिक हिन्दू को इसीलिए खंडित मानस का तनाव झेलना पड़ता है । हिन्दू मानस की इन्हीं मुश्किलों के चित्रण के साथ पुस्तक समाप्त होती है । 

लेखक के सन्दर्भ में......
त्रिलोकी नाथ मदन एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के समाजशास्त्री और आधुनिक युग में धर्म, परम्परा और बहुलवाद के प्रमुख अध्येता हैं। अवकाश प्राप्त करने से पहले इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनोमिक्स ग्रोथ के निदेशक  रहे । प्रोफेसर मदन की बेहद चर्चित पुस्तक मॉडर्न मिथ्स एंड लॉक्ड माइंड्स : सेकुलरिज्म एंड फंडामेंटलिज्म इन इंडिया को विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस .डी. एस.) द्वारा एच. आर. चतुर्वेदी पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है । 


लोकतंत्र का नया लोक



15 अगस्त 1947  से पहले हम स्वतन्त्र नहीं थे । लोकतंत्र और स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों की देन है । विरासत है । प्रश्न  उठता है, कि क्या हम इसे विरासत समझ रहे हैं । लोकतंत्र का शत्रु देश का शत्रु है । जो लोकतंत्र के विपक्ष में बोलता है, वह लोकतंत्र का मतलब ही नहीं जानता होगा या वह तानाशाही व्यवस्था चाहता है । ऐसा व्यक्ति राष्ट्र के लिए घातक हो सकता है । सविंधान हमें मूलभूत अधिकार देता है । इसका यह तात्पर्य  नहीं कि हम लोकतंत्र के महत्व को ही भूल जाएँ। 
बीते साठ वर्षों में हमारा लोकतंत्र भी काफी बदला है, बल्कि यह कहें कि जवान हुआ है । इसके बदलावों में कुछ  ऋणात्मक  प्रवृत्तियाँ भी हैं, पर ज्यादातर बदलाव सार्थक और धनात्मक हैं ।  जब दुनिया भर में लोकतंत्र का जोर बढ़ा है तब भी स्थापित लोकतांत्रिक शासनों में लोगों की दिलचस्पी घटी है - खासकर कमजोर और अनपढ़ लोगों में । पर  भारत में उल्टा हुआ है यहाँ न सिर्फ मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि इसमें कमजोर समूहों का प्रतिशत और ज्यादा बढ़ा है । इनमें लोकतंत्र के  प्रति उत्साह और भरोसा बढ़ा है ।

Book : Loktantra Ka Naya Lok : Chunavi Rajneeti Mein Rajyon Ka Ubhar

Editor : Arvind Mohan 
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`1750(HB) Part I & II
Part One  : ISBN : 978-93-5000-027-4
Part Two  :  ISBN : 978-93-5000-028-1
Total Pages 829
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  :  Politics

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

बीते दो दशकों में राजनीति पूरी तरह बदल गयी है। इन बदलावों में सबसे बड़ा है राष्ट्रीय राजनीति की जगह राज्यों की राजनीति की प्रधानता । इस बदलाव का ही परिणाम है कि राष्ट्रीय राजनीति का मतलब राज्यों का कुल योगफल ही है । आज गठबंधन सच्चाई है और विविधता भरे भारतीय समाज और लोकतंत्र से इसका बहुत अच्छा मेल हो गया है । राजनीति में बदलाव लाने वाले तीन मुद्दों -मंडल, मंदिर और उदारीकरण - ने इसमें भूमिका निभाई है । हर राज्य में इस राजनीति, खासकर चुनावी मुकाबले का स्वरूप तय करने में इन तीनों का असर अलग-अलग रूप में और अलग स्तर पर हुआ है । इसी के चलते कहीं एक दल या गठबंधन का प्रभुत्व है तो कहीं दो-ध्रुवीय, तीन-ध्रुवीय या बहु-ध्रुवीय मुकाबले शुरू हुए हैं । विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) अपने लोकनीति कार्यक्रम के जरिए चुनावी राजनीति और लोकतंत्र के अध्ययन का काम करता आया है ।  आम लोगों और अकादमिक जगत में इसके अध्ययनों और सर्वेक्षणों का काफी सम्मान है । प्रस्तुत पुस्तक चुनावी  सर्वेक्षणों और अध्ययनों के राज्यवार संयोजकों, विशेषज्ञों और जानकार लोगों के आलेखों का संग्रह है जिसमें सी.एस.डी.एस.  के अध्ययनों के आधार राज्य के सामाजिक, आर्थिक और विभिन्न समूहों की चुनावी पसन्द से लेकर मुद्दों, नेताओं और पार्टियों के बदलावों को देखने-दिखाने की कोशिश की गयी है । राज्यों की राजनीति पर केन्द्रित और देश के हर राज्य से सम्बन्धित ऐसा अध्ययन और ऐसी पुस्तक अभी सम्भवत:  किसी भाषा में नहीं है ।  पुस्तक पूरे देश, हर राज्य के बदलावों, प्रवृत्तियों को बताने के साथ ही लोकतंत्र और भारत के लिए इनके प्रभावों और अर्थों को समझने-समझाने का काम भी करती है ।

सम्पादक के सन्दर्भ में ....
पत्रकार, लेखक और अनुवादक अरविन्द मोहन, जनसत्ता, इंडिया टुडे और हिंदुस्तान में करीब ढाई दशक की पत्रकारिता करने के बाद अभी लोकनीति,सी.एस.डी.एस. में भारतीय भाषा कार्यक्रम में सम्पादक हैं। इन्होंने, पत्रकारिता, मजदूरों के पलायन और भारतीय जल संचयन प्रणालियों पर किताब लिखने के अलावा उदारीकरण और गुजरात दंगों 'गुलामी का खतरा' तथा 'दंगा नहीं नरसंहार' पर पुस्तकें सम्पादित की हैं ।