Wednesday, 16 May 2012

तुम फूलों की बात कहो



पुस्तक की नज़्मों को हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम में प्रस्तुत किया गया है  'तुम फूलों की बात कहो' के पृष्ठ संख्या 186 से  'सड़कों के चिराग' की कुछ पक्तियाँ आप के समक्ष प्रस्तुत हैं
 
चिराग सड़कों पे जल चुके हैं                               
टहलने वाले टहल चुके हैं
ये रास्ते हम को जानते हैं
हम इन पे हर रोज चल चुके हैं
मगर ये लगते हैं अब नए से
हमारे दिन भी बदल चुके हैं
चलो कदम तेज़ तर बढ़ाएँ
कि दिन के आसार ढल चुके हैं

The roadside lamps have been lit.
People have finished their walk.
These roads know us well:
We have walked on them everyday,
But now they appear somewhat new.
Our days have also changed.
Come, let's walk faster,
The day is about to finish.


Book : Tum Phoolon Ki Baat Kaho  

Author : Munib-Ur-Rahman
Collected by : Baidar Bakht 

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`395(HB) 
ISBN : 978-93-5000-905-5
Total Pages 235
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Shayri

पुस्तक के सन्दर्भ में बेदार बख्त के विचार......


शहरयार और महताब हैदर नक़वी की कोशिशों से मुनीब-उर-रहमान की नज़्मों का संकलन उन लोगों तक पहुँच रहा है जो उर्दू लिपि नहीं जानते । इस किताब में वास्तविक नज़्मों के अलावा उनके अंग्रेजी अनुवाद भी हैं इसमें से ग्यारह अनुवाद मैंने Kathleen Grant Jaeger के साथ मिलकर An Anthology of Modern Urdu Poetry के लिए किए थे । कोई बीस-बाईस नज़्मों के अनुवाद मैंने Leslie Lavigne और मुनीब-उर-रहमान के साथ मिलकर किए थे , जो The Annual of Urdu Studies में  2003 में छपे थे मुनीब-उर-रहमान की शायरी के बारे में शहरयार और मुगनी तबस्सुम की राय व्यक्त करता हूँ जो मेरे ख्याल में मुनीब-उर रहमान की शायरी का बहुत अच्छा परिचय कम से कम शब्दों में कराती है मुनीब-उर-रहमान की शायरी एक पुरअसरार जज़ीरा है । इस जज़ीरे की सैर की तौफ़ीक कम लोगों को हुई है । जिन्होंने सैर की, जो इसके मनाजिर से सैरयाब हुए और जिन पर इनके भेद मुनकशिफ हुए उन्होंने बहुत कम किसी को इसका अता-पता बताया

लेखक के सन्दर्भ में ....
मुनीब-उर-रहमान का जन्म 18 जुलाई 1924  को आगरा में हुआ । इनकी शिक्षा इलाहाबाद के एक रोमन कैथोलिक स्कूल में हुई । इनके पिता शेख इकराम हुसैन पुलिस विभाग में थे । अलीगढ़ से इतिहास और फारसी विषयों में एम.ए. करने के पश्चात इन्होंने वकालत की डिग्री के साथ-साथ लन्दन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स से फ़ारसी में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । इनकी नयी शायरी की पहली नज़्म 1940 में 'सितारा' नाम से और 'शहर-ए-गुमनाम' 1983  में  प्रकाशित हुई