Monday, 14 May 2012

आधुनिकता के आईने में दलित

    

Book : Adhunikata Ke Aaeene Main Dalit
Editor  : Abhay Kumar Dubey
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`400(HB)
ISBN : 81-7055-133-1
Total Pages :  422
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Criticism


'आधुनिकता के आईने में दलित' की बुनियादी मान्यता यह है कि धर्म और परम्परा के ही नहीं, आधुनिकता के दायरे में भी दलित समस्या का पूरा समाधान सम्भव नहीं हो पाया है । यह संकलन आधुनिकता के सापेक्ष इस समस्या के हल की दिक्कतों और सम्भावनाओं का सन्धान करता है ।'आधुनिकता के आईने में दलित' के पृष्ठ संख्या 88  'हीनता की मनोग्रंथि : स्रोत और निराकरण' से " अवमानना को समझने में उदारतावादी और मार्क्सवादी, दोनों नज़रिए ही नाकाम रहे हैं । नित्य-प्रति अवमानना उनकी आत्म-परिभाषा में बदल जाती है जिसके जरिये वे जान पाते हैं कि वे क्या हैं और क्या नहीं हैं । अवमानना उत्पीड़ित की शक्ति बन जाती है । गाँव से लेकर शहर तक और खेत से लेकर कारखाने तक दलितों की अवमानना का यह क्रम  लोकतांत्रिक-उदारतावादी राज्य में कानूनी रूप से प्रतिबंधित होते हुए भी परिवर्तित रूपों से जारी रहता है । दफ्तर में काम करनेवाला दलित ही नहीं, अछूत समुदाय से आया हुआ मुख्यमंत्री भी पाता है कि लोकतंत्र और सत्ता में ऊँचे स्तर पर भागीदारी करने के बाद भी उसके लिए मानवीय सम्बन्धों की संहिता अभी बदली नहीं है । अपमान की कूटभाषा का जन्म हो चुका है और समस्या यह है कि अभिजन बन चुके दलित भी अपने सजातीय बन्धुओं के लिए इसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखे जाते हैं

पुस्तक के सन्दर्भ में.....
विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) द्वारा  प्रायोजित लोक-चिन्तन ग्रन्थमाला की इस पहली कड़ी में समझने  की कोशिश की गयी है कि साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से ले कर एक आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की विराट परियोजना चलाने के दौरान दलित समस्या पूरी तरह क्यों नहीं दूर हुई । दलित आन्दोलनों के स्रोत्रों  की खोज से शुरू हुई यह बौद्धिक यात्रा इतिहास, संस्कृति, अस्मिता, चेतना, साहित्य, अवमानना के राजनीतिक सिद्धान्त और ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्रों से गुजरने के बाद व्यावहारिक राजनीति में होने वाली दलीय होड़ की जाँच-पड़ताल करती है ताकि भारतीय गणतंत्र के संविधान प्रदत्त सार्विक मताधिकार की समाज परिवर्तनकारी क्षमताओं की असली थाह ली जा सके । यह दलित-मीमांसा उन  ताजा बहसों पर गहरी नजर डालती है जो अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँची हैं लेकिन जिनकी परिणतियों में दलित प्रश्न को आमूल-चूल बदल डालने की क्षमता है ।  ये बहसें दलित प्रश्न के भूमंडलीकरण से तो जुड़ी हुई हैं ही, साथ ही भूमंडलीकरण के साथ दलितों के सम्बन्ध की प्रकृति को खोजने की कोशिश भी करती हैं

सम्पादक के सन्दर्भ में .....
अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) के भारतीय भाषा कार्यक्रम में सम्पादक हैं ।  रजनी कोठारी, आशीष नंदी और धीरूभाई शेठ समेत अन्य कई समाज वैज्ञानिकों की प्रमुख रचनाओं  का अनुवाद करने के अलावा लोक-चिन्तन ग्रन्थमाला और लोक-चिन्तन ग्रन्थमाला के तहत प्रकाशित दस पुस्तकों का सम्पादन । भारतीय नारीवाद, भारतीय सेक्सुएलिटी और आधुनिक हिन्दी के विकास की जाँच-पड़ताल में इनकी दिलचस्पी है ।   


कुछ खोजते हुए



Book : Kuchh Khojte Hue
Author : Ashok Vajpeyi
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`1495(HB)
ISBN : 978-93-5072-204-6
Total Pages :  729
Size (Inches) :
6.75X9.75
Category  : Collection of Prose

सन 2005-2009 के दरम्यान 'जनसत्ता' (अखबार) के साप्ताहिक स्तम्भ कभी-कभार में प्रकाशित चुनिन्दा टिप्पणियाँ
पुस्तक के संदर्भ में अशोक वाजपेयी के विचार.......
यह कहना या ठीक-ठीक बता पाना कठिन है कि इस जिन्दगी भर से चली आ रही खोज का लक्ष्य क्या है ? बिना लक्ष्य के या किसी प्राप्ति की आशा के खोज क्यों नहीं की जा सकती? अगर यह सम्भव है, भले कुछ अतर्कित है तो इन पृष्ठों में जो कुछ खोजा जाता रहा है इसका कुछ औचित्य बनता है ।  खोजने की प्रक्रिया में कुछ सच, कुछ सपने, कुछ रहस्य, कुछ जिज्ञासाएँ, कुछ उम्मीदें , कुछ विफलताएँ सब गुँथे हुए से हैं ।  शायद कोई भी लेखक कुछ पाने के लिए नहीं खोजता : कई बार वह कुछ इससे पहले कि लेखक को इसका सजग बोध हो या कि वह उसे विन्यस्त कर पाये वह फिसल भी जाता है और कई बार ऐसे गायब हो जाता है कि दुबारा फिर खोजे नहीं मिलता एक साप्ताहिक स्तम्भ के बहाने अपनी ऐसी ही बेढब खोज को दर्ज़ करता रहा हूँ ।  इसमें संस्मरण, यात्रा-वृत्तान्त, पुस्तक और कला समीक्षा, इधर-उधर हुए संवाद और मिल गये व्यक्तियों से बातचीत आदि सभी संक्षेप में शामिल हैं । मुझ जैसे बातूनी व्यक्ति को, 'जनसत्ता' में पिछले तेरह वर्षों से, बिला नागा, अबाध रूप  से 'कभी-कभार' स्तम्भ लिखते हुए यह अहसास हुआ कि संक्षेप लेखन का बेहद वांछनीय पक्ष है ।  जो संक्षेप में कुछ पते की बात नहीं कर सकता वह विस्तार में ऐसा कर पायेगा इसमें अब कुछ संदेह होने लगा है कि विस्तार से लिखना चाहिए था ।  यह उन 'चाहियों' में से एक है जो मुझसे नहीं सधे।  जैसे लिखना तो मुझे था डायरी, जो अब-जब-जैसी याद आती है इसी स्तम्भ में लिख देता हूँ : डायरी नहीं लिख पाया ।  जो नहीं हुआ उसका ग़म क्या,वह नहीं हुआ !

लेखक के सन्दर्भ में......
पोलैण्ड गणराज्य के राष्ट्रपति द्वारा और फ्रांसीसी सरकार द्वारा वहाँ के उच्च सिविल सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी हिन्दी कवि-आलोचक, अनुवादक, सम्पादक तथा भारत की एक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति हैं । इनका जन्म 1941 में हुआ । भारत के एक विशिष्ट बुद्धिजीवी वाजपेयी एक सृजनात्मक विश्व पर्यटक हैं ।  जिन्होंने सम्मेलनों में भाग लेने, व्याख्यान देने के क्रम में कई बार यूरोप आदि का भ्रमण किया है ।  इन्होंने पोलैण्ड के चार प्रमुख कवियों-चेस्लाव मिलोष, विस्वावा षिम्बोसर्का, ज्बीग्न्येव हेर्बेर्त और तादेऊष रूज़ेविच की कृतियों का हिन्दी अनुवाद किया है । इनकी 13 कविता की पुस्तकों, आलोचना की 7 पुस्तकों और अंग्रेजी में कला पर 3 पुस्तकों सहित इन्हें संस्कृति के विशिष्ट प्रसार और नवोन्मेषी संस्था निर्माता के रूप में जाना जाता है। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, दयावती कवि शेखर सम्मान, भारत भारती और कबीर सम्मान प्रदान किये गये हैं