Saturday, 12 May 2012

पहर दोपहर




Book : Pahar Dopahar
Author : Asghar Wajahat
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`375(HB)
ISBN : 978-93-5000-493-7
Total Pages :  215
Size (Inches) :   5X8
Category  :  Novel

पुस्तक के संदर्भ में.....

असग़र वजाहत हिन्दी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं जो अपने पाठकों से तारतम्य स्थापित कर रचना को आगे बढ़ाते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ न केवल पाठकों को पूरी तरह अपने अधिकार में ले लेती हैं बल्कि पाठक और रचना के बीच जीवन्त सम्बन्ध स्थापित हो जाता है
'पहर दोपहर' में नाटकीयता के कारण एक ऐसी पठनीयता जो बहुत दुर्लभ है । पाठक उपन्यास को पढ़ना प्रारम्भ करता है और फिर उसे जल्दी से जल्दी समाप्त कर देना चाहता है क्योंकि उपन्यास में वर्णित जीवन और पाठक के बीच एक सीधा रिश्ता बन जाता है । असग़र वजाहत की पठनीयता उनका एक-एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है जो इस उपन्यास में पूरी तरह से देखा जा सकता है
उपन्यास केवल घटनाओं का वर्णन नहीं है । 'पहर दोपहर' लम्बी कहानी की प्रस्तुति भी नहीं है। दरअसल यह सहज और रोचक शैली में लिखा गया उपन्यास पाठक को जगह-जगह रुक जाने और सोचने पर विवश करता है। उपन्यास जीवन और जगत के जटिल सम्बन्धों की पड़ताल-सी करता है । मानव-मन की गहराइयों में उतर जाता है और कलात्मक ढंग से पत्रों और उनकी गतिविधियों को व्याख्यायित करता है । इस प्रकार यह उपन्यास न केवल पढ़ने बल्कि विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है
शिल्प और भाषा की दृष्टि से 'पहर दोपहर' सामान्य उपन्यासों से बहुत अलग है । उपन्यास में पाठक को आतंकित करने तथा शिल्प का दुरूह जाल बुनने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। दरअसल पाठक के साथ सहज सम्बन्ध बनाने पर उपन्यास बल देता है । सीधी-सरल भाषा और स्पष्ट शैली में लिखा गया उपन्यास कई दृष्टियों से जटिल मानवीय स्थितियों और गम्भीर सामाजिक समस्याओं को सामने लाता है
लेखक के सन्दर्भ में......
हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक असग़र वजाहत का जन्म 5 जुलाई 1946 को जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी) और पीएच.डी. की उपाधि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्राप्त की  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरोल शोध की उपाधि प्राप्त की। अब तक इनके सात उपन्यास, छह नाटक, पाँच कथा संग्रह, एक नुक्कड़ नाटक संग्रह और एक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित है । ईरान और आज़रबाइजान की यात्रा पर आधारित उनका यात्रा संस्मरण 'चलते तो अच्छा था' काफी चर्चा में रहा है
वर्ष 2007 में हिन्दी पत्रिका 'आउट लुक' के एक सर्वेक्षण के अनुसार उन्हें हिन्दी के दस श्रेष्ठ लेखकों में सम्मिलित किया गया था । उनकी कृतियों के अनुवाद, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, रूसी, हंगेरियन, फारसी आदि भाषाओं में हो चुके हैं