Wednesday, 9 May 2012

ऐसा भी सोचा जाता है




Book : Aisa Bhi Socha Jata Hai
Author : Hari Shankar Parsai
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`200(HB)
Total Pages :  160
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Satire

पुस्तक के सन्दर्भ में...

हरिशंकर परसाई उन व्यंग्यकार लेखकों में से हैं जिनके बिना हिन्दी के आधुनिक व्यंग्य लेखन की प्रतिष्ठा सम्भव  नहीं होती । उनके व्यंग्य लेखन ने हमारे समाज की तकलीफों को उजागर करने के साथ-साथ मानवीय सहानुभूति, संवेदना और करुणा को भी रेखांकित किया है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा व्यंग्य लिख पाना दुर्लभ है । हरिशंकर परसाई विचारक और चिन्तक भी हैं । एक प्रखर सामाजिक चेतना और सघन आन्तरिक उनके वैचारिक लेखन की विशिष्ट पहचान है । उनका गम्भीर  लेखन अपने आसपास के जाने-अनजाने सत्य को बहुत बारीक तथ्य से अभिव्यक्त करता है 'ऐसा भी सोचा जाता है' में संकलित परसाई जी के गम्भीर वैचारिक लेखों में राजनीतिक,सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक विषय-सन्दर्भों पर महत्वपूर्ण विचार-चिन्तन है, जिनमें आज के आम आदमी की पीड़ा और संघर्षशीलता के कई आयामों से पाठकों का साक्षात्कार होता है । कहने की जरूरत नहीं है कि 'परसाई' और 'व्यंग्य' तो एक-दूसरे के पर्याय हैं
पुस्तक का अनुक्रम
इस तरह गुजरा जन्म-दिन
किस भारत-भाग्य विधाता को पुकारें
विदेशी धन के साथ और क्या आयेगा ?
जरूरत है सामाजिक आंदोलनों की

दलित कल्याण के कई ठेकेदार

प्रतिभा का सिन्दूर खरोंचें

ओ-हेनरी

क्या अतिथि देवता नहीं रहा ?
भारत मानव, महासागर तीरे
उदात्त मन की आखिरी कमजोरी
अन्धविश्वास से वैज्ञानिक दृष्टि

समस्याएँ और जादू-टोना

मसीहा और विपरीत भक्त

धर्म और विज्ञान

धर्म और सामाजिक परिवर्तन

सदन के कूप में

पाकिस्तान में इकबाल की फजीहत

चेखव की संवेदना

पंचम जार्ज की छतरी और गाँधी प्रतिमा

राष्ट्रीय स्वाधीनता दिवस पर

ब्राह्मण से शूद्र तक

कहाँ मयखाने का दरवाजा कहाँ वाइज़

हिन्दी और  हिन्दिगगलिश

विवेकानन्द के क्रांतिकारी विचार

हास्य और व्यंग्य

स्वामी, देवपुरुष , राजपुरुष 

हुसेन के नंगे पाँव और भारतीयता

अध्यक्ष महोदय (मिस्टर स्पीकर )
दहेज और विवाह-पूर्व आत्महत्या


लेखक के सन्दर्भ में........
मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान और 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के मूर्द्धन्य आधुनिक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्म 1924 में जमानी (इटारसी के पास) मध्य प्रदेश में हुआ । इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. किया । जबलपुर से साहित्यिक मासिक पत्रिका 'वसुधा' निकाली । अनेक पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों तक नियमित स्तम्भ लिखे । परसाई जी सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के निदेशक रहे और जबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें डी.लिट् की उपाधि से विभूषित किया गया । 10 अगस्त 1995 को इनका देहांत हुआ
इनकी कृतियाँ : 'हँसते हैं रोते हैं', 'जैसे उनके दिन फिरे', 'दो नाक वाले लोग', 'रानी नागफनी की कहानी' ( कहानी संग्रह), 'तट की खोज' ( उपन्यास),'तब की बात और थी', भूत के पाँव पीछे', 'बेईमानी की परत','पगडंडियों का जमाना','सदाचार का ताबीज़','वैष्णव की फिसलन','विकलांग श्रद्धा का दौर','माटी कहे कुम्हार से','और अन्त में','हम उम्र से वाकिफ हैं','ऐसा भी सोचा जाता है' ( निबन्ध संग्रह) इत्यादि