Tuesday, 8 May 2012

कहना नहीं आता



पुस्तक 'कहना नहीं आता' के पृष्ठ संख्या 103 से उस फोटोग्राफर का नाम पता करो का कुछ अंश ...के माध्यम से पवन करण की कवि-चिन्ताएँ वर्तमान की घड़ी की टिक-टिक के पार जाने की बेचैनी से भरी हुई हैं और पैनी दृष्टि निहित विडम्बना की पहचान कराती हैं 'भूख से मरने जा रही लड़की और उसकी मौत के इन्तजार में बैठे गिद्ध की फोटो जिस फोटोग्राफर ने उतारी उस फोटो पर उसे जो पुरस्कार मिला मैं उस पुरस्कार और उस फोटोग्राफर का नाम तक लेना नहीं चाहता' ? अंत में कवि कहता है कि दुनिया की जो फोटो खींची जा रही है, एक दिन उसके बोझ में यही लोग दब कर मरेंगे, जो फोटो खींच रहे हैं । लोग कितने स्वार्थी और निर्दयी बनते जा रहे हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है

Book : Kahna Nahin Aata
Author : Pawan Karan
Publisher : Vani Prakashan
Price :
`150(HB)
ISBN : 978-93-5000-962-8
Total Pages :  112
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Collection Of Poems

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

क्या है, दुनिया अकसर सोचा करता हूँ ? कल तक क्या थी और अब क्या है ? अकसर सोचा करता हूँ । लोगों का  जीवन बदला, शैली बदली, लोग बदले, चाह बदली, जीवन का हर रूप बदल रहा है । नियम भी यही कहता है, अकसर लोग बदल जाते हैं । सोच बदल जाती है । पर कुछ लोग नहीं बदलते हैं , उनमें कवि पवन कारण का नाम आता है । जिनकी अपनी आदत  है, सोच है, ऐसी आदत जो व्यक्ति को सोचने, विचारने पर विवश करती है । जिससे एक  बेहतर समाज और बेहतर राष्ट्र का निर्माण हो सके। पुस्तक 'कहना नहीं आता'  कविता के माध्यम से उन्होंने अपनी सजग दृष्टि से रेल के डिब्बे के शौचालय की दीवारों पर लिखे हुए शब्दों को न सिर्फ उसके ठीक-ठीक आशयों को व्यक्त किया है, बल्कि खतरों के बरक्स उसमें कुछ और जोड़ने, थोड़ा सुधारने का जज़्बा भी रखते हैं  कवि ने मोबाइल : पाँच प्रेम कविता के जरिये प्रेम की वास्तविकता को वर्तमान  प्ररिप्रेक्ष्य में  व्यक्त किया है। प्रेम कविता से वह सन्देश देना चाहते हैं कि प्रेम मनुष्य को एक भौंरे की भाँति करना चाहिए । भौंरा कमल में स्वयं इसलिए बंद हो जाता है कि उसे कमल के प्रति प्रेम है । दूसरी तरफ आरक्षण गली अति सांकरी पर प्रश्न का उत्तर एक समाजशास्त्रीय ढंग से देते हैं। लोग कहते हैं कि क्या सवर्णों में गरीब नहीं होते ? क्या दलित ही निर्धन है ? कवि कहता है कि सवर्णों में गरीब तो होते हैं, मगर वह दलित नहीं होते, वे गरीब नीच अछूत और हरिजन नहीं होते। वे गरीब होने के बाद भी सवर्ण ही होते हैं, उन्होंने राजस्थान के किसी अज्ञात कुलशील गाँव के अस्पृश्यतम  यथार्थ को भी लोगों के सामने व्यक्त किया है । जिसमें पीने के पानी के सन्दर्भ में कवि कहता है कि जहाँ दबंगों के मवेशी पानी पीते थे । जब उसी तालाब में दलित भी पानी पीने लगे तो दबंगों के होश उड़ गए और उन्होंने पानी में गू उँडेल दिया । जिससे पानी न तो दलितों के पीने योग्य रहा और न मवेशियों के कवि अपने इस संकलन में स्त्री-विमर्श पर तर्कपूर्ण चर्चा करना चाहता है। कवि पाकिस्तान के कबाइली समाज के संदर्भ से स्पष्ट करना चाहता है कि पुरुष समाज में हमेशा से ही स्त्रियों का शोषण होता रहा है चाहे वह कोई भी धर्म हो, जाति हो, स्त्रियों पर ही पाबन्दी लगाई जाती है पुस्तक में जीवन की बहुत सी स्थितियों के स्वभाव को दिखाया गया है, चुप्पी, झूठ, भय, इत्यादि के माध्यम से जीवन की वास्तविकता को दर्शाया गया है


लेखक के संदर्भ में......
रामविलास शर्मा पुरस्कार (2000), रजा पुरस्कार(2002), वागीश्वरी सम्मान(2004), पुश्किन सम्मान (2006), शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान(2007),  परम्परा ऋतुराज सम्मान (2009) इत्यादि सम्मानों से पुरस्कृत पवन करण का जन्म 18 जून 1964, ग्वालियर (मध्य प्रदेश ) में हुआ । इन्होंने पीएच. डी. (हिन्दी), जनसंचार एवं मानव संसाधन विकास में स्नातकोत्तर पत्रोपाधि । वर्तमान में मध्य प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्र नवभारत  ग्वालियर में साहित्यिक पृष्ठ  सृजन का संपादन एवं  नई दुनिया,ग्वालियर अखबार में शब्द-प्रसंग साप्ताहिक स्तम्भ का लेखन