Saturday, 28 April 2012

सन्त वाणी


Book :  Sant Vani (1-5 Volume )
Presentation & Translator :  Dr. P. Jayaraman
Publisher : Vani Prakashan
Size (Inches) :   6.50X9.75
Category  : Ancient Tamil Saint Poetry
S.No.
Book
ISBN
Total Pages
Price
  1.
Sant Vani (Volume-1) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-201-8
356 Pages
` 795
  2.
Sant Vani (Volume-2) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-201-8
252 Pages
` 795
  3.
Sant Vani (Volume-3) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-708-2
363 Pages
` 695
  4.
Sant Vani (Volume-4) – Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-709-9
216 Pages
` 495
  5.
Sant Vani (Volume-5)Ancient Tamil Saint Poetry
978-93-5000-979-6
464 Pages
` 750

पुस्तक के सन्दर्भ में......
एक साहित्यिक, धार्मिक और दार्शनिक परियोजना
सन्त वाणी ( संतों की आवाज़)
भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा में भगवान विष्णु के प्रति विशेष समर्पण है विष्णु के प्रति यह समर्पण सम्पूर्ण भारत के प्राचीन काल से खासतौर पर दक्षिण में पाया गया श्रीमद भागवत महात्म्य में साक्षात वर्णन है कि मेरा द्रविड़ भूमि ( दक्षिण भारत ) में जन्म हुआ और कर्नाटक में बढ़ा महाराष्ट्र होते हुए भारत के उत्तर में वृन्दावन पहुँचने पर मैं एक सुन्दर लड़की बन गया (संस्कृत कविता के अंग्रेजी अनुवाद के साथ शुरू उत्पन्न द्राविडे साहां....) लम्बे समय से वैष्णव भक्ति की परम्परा तमिल क्षेत्र में विकसित हुई पांचवीं और नौवीं शताब्दी में 12 वैष्णव संत, कवि और दार्शनिक हुए, जिन्हें आजवारों और आलवार के नाम से जाना जाता है आलवार भगवान विष्णु की भक्ति में डूब जाते हैं, जोकि वह भगवान नारायण के ही अवतार थे
इन बारह संतों में हैं, पोइगाई आलवार, भूताथालवार, पेयालवार, तिरुमाज़िसी आलवार, तिरुमंगाई आलवार, पेरियालवार, आंडाल, तिरुप्पनालवार, तोंदारादिप्पोदी आलवार, कुलशेखर आलवार, नाम्नालवार और मधुरा कवि आलवार
500 वर्षों की अवधि के दौरान इन बारह आलवारों ने 4000 छंद प्राचीन तमिल भाषा में लिखें हैं । जो पूर्णतया भगवान विष्णु के प्रति समर्पित हैं, इनके छंद धार्मिक और दार्शनिकता पर आधारित हैं। आलवार चार जातियों से सम्बन्ध रखते थे और उन्होंने सभी जातियों का वर्णन किया है । उन्होंने समाज में फैली जातियों की समानता और एकता के लिए कार्य किया उस दौरान जितने भी कवि हुए वह भारतीय दार्शनिक परम्पराओं के अनुसार भगवान नारायण पर गहरी आस्था के साथ समर्पित थे । आठवीं शताब्दी में एक महिला संत आंडाल हुईं बाद में बहुत से दार्शनिकों में जैसे नाथमुनि,यामुनाचार्य, रामानुज और वेदान्त देसिका इन्होंने आलवार के अध्यात्म और दार्शनिकता का अनुपालन किया । और भगवान नारायण को पाया । 13वीं से 16वीं शताब्दियों के बीच वैष्णव भक्ति प्रचारित करने में इन विद्वानों और आचार्यों के बाद उत्तर भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परम्पराओं का प्रतिनिधित्व बिम्बरका, वल्लभ, हिताहरि वम्सा और चैतन्य ने किया । 
चैतन्य ने मथुरा और वृन्दावन में व्यापक रूप से आध्यात्मिक, दार्शनिक वैष्णव भक्ति का फैलाव किया इन बारह आलवार के कार्य और संकलन (4000 छंद ईश्वरत्व) के रूप में नालायिर दिव्य प्रबन्धम कहलाये । इसका संकलन वैष्णव आचार्य नाथमुनि ने किया जो 9वीं और 10वीं शताब्दी के मध्य तक जीवित थे । तमिल वेद में यह पुस्तक सुविचारित है और यह पुस्तक संस्कृत वेद से तुलना करने योग्य है । एक और नाम नाम्मालावार उल्लिखित होता है जैसे वेद्म तमिज्ह सेय्था मारण,(जो वेद तमिल वेद में संचारित है) डॉ.जयरामन ने हिन्दी में इन सभी 4000 तमिल छंदों को प्रस्तुत किया है । जिसमें वेद, उपनिषद, भागवद-गीता, विष्णु पुराण और अन्य संस्कृत धर्मग्रन्थों से एक ही समय के संदर्भ में अलवार संतों की वैष्णव भक्ति के विषय में कमेंटरी के साथ व्याख्या की है । जिसमें इन्होंने बताया है कि मध्ययुगीन हिन्दी भक्ति साहित्य (15वीं और 16वीं शताब्दी) और यहाँ तक की प्राचीनतम तमिल साहित्य 6वीं शताब्दी बीसी. से लेकर 2वीं शताब्दी एडी. तक सम्बन्ध रहे हैं । इस विचार के साथ वह सिद्ध करना चाहते हैं कि सम्पूर्ण भारत में उस समय भी सिद्धांत, विचार और भाषा में अंतर था  डॉ. जयरामन के अनुसार इस परियोजना का उद्देश्य जागरूकता फैलाना है कि अखंडित आध्यात्मिक और दार्शनिक, संत और विचारक शताब्दियों से भारत की एकता को बनाये हुए हैं । इसलिए डॉ. जयरामन ने अपनी इस परियोजना को 'संत वाणी' का नाम दिया है, जिसमें तमिल साहित्य और तमिल वेद, वैष्णव संतों की वाणी का वर्णन है यह पूरी श्रृंखला 10 खण्डों में होगी, जिसमें 5 खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं पाठकों के लिए यह खुशी की बात है कि 2013 के अंत तक इस सम्पूर्ण हिन्दी संस्करण के बाद 2014 में इस श्रृंखला का सम्पूर्ण अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध किया जायेगा इससे जो व्यक्ति हिन्दी नहीं जानते हैं वह भी इस श्रृंखला के पहलूयों से वाकिफ हो सकेगें डॉ. जयरामन श्रृंखला के माध्यम से दक्षिण भारत के वैष्णव, भक्ति और तमिल वेद एवं आध्यात्मिक विकास का फैलाव करना चाहते हैं

लेखक के सन्दर्भ में.....
डॉ. पी. जयरामन संस्कृत, हिन्दी एवं तमिल साहित्य के प्रखंड विद्वानों में हैं । इन्होंने एम.ए.(संस्कृत तथा हिन्दी) और पीएच.डी.,डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की है भारतीय संस्कृत तथा साहित्य की एकात्मकता के प्रति समर्पित हो कर वह अठारह वर्ष तक अध्ययनरत रहे । भारतीय रिजर्व बैंक के प्रबंध तंत्र में सोलह वर्ष तक कार्य किया इन्होंने जन-सामान्य के हितों का ध्यान रखते हुए बैंकिंग क्षेत्र में भारतीय भाषाओँ का विशेषकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया । सन 1980 में उन्होंने न्यू यार्क में भारतीय विद्या भवन की स्थापना की और उनतीस वर्षों से भारतीय संस्कृति, परम्परा, दर्शन, भाषा, साहित्य एवं कलाओं के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं सम्मान : साहित्य वाचस्पति (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग), साहित्य भूषण( उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), हिन्दी भाषा एवं साहित्य की सेवा के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,आगरा द्वारा प्रदत्त सम्मान (2006), भारत सरकार द्वारा प्रवासी भारतीय सम्मान,2007 और 2009 में पद्मश्री