Tuesday, 24 April 2012

निज घरे परदेसी


किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है और भारत में यह काम आज हिन्दुत्ववादियों ने शुरू कर दिया है 'आदिवासी की पहचान और नाम छीनकर उसे 'वनवासी' घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है -वह भूल जाए अपनी संस्कृति-अपनी भाषा

Book :  Nij Ghare Pardesi
Author : Ramnika Gupta
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 200 (HB)
ISBN : 81-8143-116-2
Total Pages :  106
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Sociology
 
 
पुस्तक के संदर्भ लेखिका के विचार ....
"हजारों बरसों से या कहूं सदियों से आदिवासियों को खदेड़ने का काम जारी है । उन्हें जंगलों में आदिम जीवन जीने के लिए मजबूर कर सभ्यता से दूर रखने की साजिश भी इस बीच जारी रही और जारी रहा उनका शोषण और दोहन । उनकी संस्कृति को न तो यहाँ के वासियों ने पनपने या विकसित होने दिया और न ही उसे आत्मसात कर मूलधारा में शामिल होने दिया । उल्टे हमेशा उन्हें असभ्य, आदिम या जंगली की पहचान देकर उनमें हीन भावना भरी जाती रही, जिससे इन पर उनका वर्चस्व कायम रहे । फलस्वरूप आदिवासियों के समाज का विकास ठहर-सा गया, सोच का विकास रुक गया और रुक गई उनकी संस्कृति और भाषा का विकास । परंपरा और अंधविश्वास से जुड़ा यह समाज, बस जीने की चाह के बल पर कठिन-से-कठिन परिस्थितियों का अपने कठिन श्रम से मुकाबला करता रहा दीन-दुनिया से बेखबर । लेकिन इस सबके बावजूद उसने अपनी पहचान आदिवासी के रूप में कायम रखी आदिवासी यानी मूल निवासी यानी भारत का मूल बाशिंदा यानी इस धरती का पुत्र जो धरती और प्रकृति के विकास के साथ ही पैदा हुआ, पनपा, बढ़ा और जवान हुआ- प्रकृति का सहयात्री और सहजीवी जो सहनशीलता की सीमा तक सहन करता पर अन्याय के विरोध में भी खड़ा हो जाता भले उसे गूंगा बना दिया गया था   अभिव्यक्ति की ताकत नहीं थी उसके पास, पर अन्याय हद से गुजर जाने पर उसके हाथ गतिशील हो उठते   उसका सारा आक्रोश, सारा गुस्सा तीरों में भरकर बरस पड़ता   गुलेलों के पत्थरों से वह अपना प्रतिकार जाहिर करता और वापस जंगलों में तिरोहित हो जाता
आज कोई सबसे बड़ा खतरा अगर आदिवासी जमात को है तो वह उसकी पहचान मिटने का है इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मिटने की साजिश एक योजनाबद्ध तरीके से रची जा रही है किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है और भारत में यह काम आज हिन्दुत्ववादियों ने शुरू कर दिया है 'आदिवासी की पहचान और नाम छीनकर उसे 'वनवासी' घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है -वह भूल जाए अपनी संस्कृति-अपनी भाषा।"
 
पुस्तक के अनुक्रम
जरुरत है बिरसा के विस्तार की
बांसुरी बन रही है मशाल
आदिवासी अपने ही घर में बेघर
झारखण्ड : अपने-अपने सपने
कोई इन्हें वाणी तो दे : कोई इन्हें स्याही का जामा तो पहनाए
बिना झार के खंड : झारखंड
लड़ा आदिवासी- राज करेगा गैर-आदिवासी
भाजपा किसके साथ : मूल निवासी 'स्पेट' के साथ या भारतीय मूल के 'महेंद्र' के साथ
आदिवासी अंक : प्रेरणास्त्रोत
आदिवासी हिन्दू की परिभाषा में नहीं आता
विस्थापितों को समस्याएँ एवं आन्दोलन का इतिहास
 
लेखिका के संदर्भ में.....
रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, 1930 सुनाम (पंजाब) में हुआ हिन्दी की परिचित कथाकार,कवियत्री एवं चिंतक रमणिका गुप्ता झारखण्ड के छोटानागपुर में मज़दूरों, दलितों, आदिवासियों एवं महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत रही हैं सम्प्रति वह प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'युद्धरत आम आदमी' की संपादक हैं/