Monday, 23 April 2012

धोखा


लोग विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों को मानते हैं । सभी धर्मों की अपनी-अपनी मान्यताएँ हैं, कोई मूर्ति पूजा करता है, तो कोई नहीं । कोई गंजा रहता है, तो कोई चुटिया रखता है, कोई केश दाढ़ी कटवाना पाप समझता है । कुछ अपनी इच्छा के अनुसार दाढ़ी, केश रखते हैं कोई ईश्वर को आकार देता है, कोई निराकार के रूप में मानता है । कोई तलवार रखता है, कोई त्रिशूल । कुछ ईश्वर के पुत्र के रूप में आते हैं । कोई अपने धार्मिक स्थल पर जूता निकाल कर अन्दर जाता है, कोई जूता पहने जाता है । कोई हवन करता है, कोई मिलाद करता है । कोई मांसाहार और  कोई शाकाहार की बात करता है, तो कोई सर्वाहार की बात करता है । किसी को जलाया जाता है तो किसी को बॉक्स में बन्द करके और किसी को बिना बॉक्स ही दफन किया जाता है और सभी धर्मों की एक शिक्षा है कि इंसान को इंसान समझें एक प्रश्न उठता है कि जितने भी भगवान, ईश्वर के पुत्र और पैगम्बर, संत लोग आये । उन्होंने शांति अमन, इंसानियत का पैगाम दिया । पूजा करने की विधि धर्म के अनुसार अवगत कराया । लेकिन मरने पर उत्तर की तरफ सिर करने में काफी हद तक एक रूपता पाई जाती है।  आखिर क्यों ? विभिन्न  धर्मों के मानने वाले, जब अपने धर्म को नहीं मानते जो उन्हें इंसानियत का पैगाम देती है, लेकिन जो धर्म में नहीं है उसे मानते हैं क्या धर्म कहता है कि इंसान को इंसान ना समझना, छुआ-छूत, भेदभाव करना, जाति आधारित व्यवस्था पर कायम करना ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विषमतावादी भारतीय समाज में जातिभेद, ऊँच-नीच की भावनाएँ शोषित, पीड़ित, अपमानित, अभावग्रस्त और दलित जीवन की व्यथा मौजूद है । प्रस्तुत है सूरजपाल चौहान की पुस्तक 'धोखा' जो समाज पर लघु कहानियों के माध्यम से कटाक्ष करती है

Book : Dhokha
Author : Surajpal Chauhan
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 150(HB)
ISBN : 978-93-5000-760-0
Total Pages :  84
Size (Inches) :   5.50X8.25
Category  : Collection of Short Stories

 
पुस्तक के संदर्भ में...
धोखा कहानी संग्रह पृष्ठ संख्या 71 से 'छू नहीं सकता'  "अच्छा बताओ बच्चों, वह कौन-सी चीज है जिसे हम देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते ?" दूसरी किलास के अध्यापक के सवाल का उत्तर देने के लिए सभी बच्चों ने हाथ ऊपर उठाया हुआ था । "हाँ, रामू तुम बताओ ?" "सर, सूरज ।" "लक्ष्मी, तुम बताओ ?" "सर, चाँद " "लाखन तुम बताओ ?" " सर, आसमान " "शाबाश!" कक्षा अध्यापक ने अब पूरी किलास से एक साथ पूछा था-" अच्छा, और कौन-सी चीज है जिसे हम देख तो सकते हैं, लेकिन छू नहीं सकते ?" "सर, रात को आसमान में चमकते तारे " सभी बच्चे एक स्वर में बोले थे "वेरी गुड, एक्सीलेंट" ठीक है, अब सभी बच्चे अपना-अपना हाथ नीचे करके शान्त होकर बैठे रहें   कक्षा अध्यापक की बात सुनकर सभी बच्चों ने हाथ नीचे कर लिया था   लेकिन कलास में सबसे पीछे बैठा एक बच्चा अब भी अपना हाथ उठाये हुए था   कक्षा अध्यापक की जब उस बच्चे पर नजर पड़ी तो उसने उस बच्चे से अब तक ऊपर हाथ उठाये जाने का कारण जानना चाहा   मास्टर ने बच्चे से पूछा था- "भीम, क्या तुम इस सवाल का कोई और उत्तर देना चाहते हो ?" "जी सर, वह किलास-रूम के एक कोने में पीने के पानी से भरा मटका, जिसे मैं देख तो सकता हूँ किन्तु छू नहीं सकता " बच्चे ने खड़े होकर अदब के साथ कहा था बच्चे की बात सुनकर पहले तो मास्टर सकपकाया, फिर नाक-भौंह सिकोड़ते हुए बोला-"अच्छा-अच्छा, ठीक है..., चल अब बैठ जा " लेखक सूरजपाल चौहान का यह लघु कथा संग्रह जातिवादी समाज की वास्तविकताओं को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करता है यह संग्रह उस विलक्षण आईने की तरह है जिसमें अपना अक्स देखा जा सकता है और उसके पार भी अपारदर्शी का काम करते हुए भी पारदर्शी   पारदर्शी कहने का आशय यह है कि इसकी प्रतिबद्धता चयनधर्मी नहीं है, प्रतिबद्धता प्राय: कुछ चीजों को छुपा ले जाती है दुनिया भर पर रोशनी डालती है, फटकारती है लेकिन खुद को कभी प्रकाश-वृत्त में नहीं लाती, स्वपरीक्षण नहीं करती सूरजपाल चौहान के लिए प्रतिबद्धता सहूलियत भरा मामला नहीं है वह जितना 'औरों' के प्रति निर्मम है उतना अपने और 'अपनों' के प्रति कठोर । 'अन्तर', 'एकता का ढोल' और 'धोखा' जैसी लधुकथाएँ लेखकीय निष्पक्षता, आमूलपरिवर्तन की ईमानदार कामना को साबित करती हैं

लेखक के सन्दर्भ में...... 
रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार और हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'कृति सम्मान' एवं 'सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार' से सम्मानित सूरजपाल चौहान का जन्म 20 अप्रैल, 1955 फुसावली, जनपद- अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ देश की विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, गीत, कहानियाँ, बालगीत, लेख, टिप्पणियाँ और कथा-संस्मरण प्रकाशित । वर्तमान में भारत सरकार के उद्यम (एसटीसी ऑफ़ इंडिया लि., नई दिल्ली) में मुख्य प्रबंधक के पद पर कार्यरत