Saturday, 21 April 2012

गलीकूचे

गलीकूचे पृष्ठ संख्या 173 से ' फ्रीलांसर के पास समय बहुत कम था। उसने आव देखा न ताव, अपनी प्रेमिका को मुर्गी की तरह वहीं दबोच लिया। 'तुम्हारे मुहँ से पेट्रोल की बू आ रही है, तुमने शराब पी है ?' फ्रीलांसर की प्रेमिका ने पूछा। 'मैंने पेट्रोल-पम्प में नौकरी कर ली है।' फ्रीलांसर ने कहा।' पुस्तक में रवीन्द्र कालिया गम्भीरता, सार्थकता के माध्यम से पाठकों में एक आत्म विश्वास उत्पन्न करना चाहते हैं। विशिष्टता के साथ प्रस्तुत है, 'गलीकूचे'

Book : Gali Kooche
Author : Ravindra Kaliya
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 450 (HB)
ISBN : 978-93-5072-143-8
Total Pages :  290
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : Semi-Fiction
 

पुस्तक के संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के विचार......
"यदि एक ओर निर्मल वर्मा कहते हैं, कि कहानी की मृत्यु से चर्चा आरम्भ करनी चाहिए, तो दूसरी ओर रवीन्द्र  कालिया का भी यही कहना है, कि 'मुझे कहानी के उस स्वीकृत रूप से घोर वितृष्णा है, जिस अर्थ में वह आज कहानी के नाम से जानी जाती है।' इस विरोध को एकरसता की क्षोभ-भरी प्रति-क्रिया के रूप में लिया जा सकता है। इन नवयुवक लेखकों की कहानियों से साफ झलकता है, कि वे आज की सामाजिक सतह से नीचे जाकर 'मानव-नियति' और 'मानव-स्थिति' सम्बन्धी बुनियादी प्रश्न उठा रहे हैं। लगता है, युग नये सिरे से अपने-आप से भयावह प्रश्नों का साक्षात्कार कर रहा है। वैसे किताबी नुस्खे और चालू फ़ैशन यहाँ भी हैं, किन्तु 'प्रश्नात्मक दृष्टि' खरी और तेज है। आज के मानवीय सम्बन्धों की अमानवीयता को बेध कर पहचानने की अद्भुत क्षमता इस दृष्टि में है । इसलिए जिस निर्ममता के साथ सीधी भाषा में ये आज की मानव-स्थिति को कम-से-कम रेखाओं में उतार कर रख देते हैं, वह पूर्ववर्ती कथाकारों के लिए स्पर्धा की वस्तु हो सकती है । कहानी के रूपाकार और रचना-विधान की दृष्टि से ये कहानियाँ एक अरसे से उपयोग में आने वाले कथागत साज-संभार को एकबारगी उतार कर काफी हल्की हो गयी हैं- हल्की, लघु और ठोस

लेखक के सन्दर्भ में....
'शिरोमणि साहित्य सम्मान' (पंजाब), 'लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान'(उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), 'साहित्य भूषण सम्मान'(उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), 'प्रेमचन्द सम्मान', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सम्मान'(मध्य प्रदेश) आदि सम्मानों से पुरस्कृत प्रख्यात कथाकार, संस्मरण लेखक और यशस्वी सम्पादक, रवीन्द्र कालिया का जन्म 1 अप्रैल, 1939 को हुआ इनके उपन्यास व कहानियाँ विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं इन्होंने कई महाविद्यालयों में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में कार्य किया है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ एवं सम्पादक नया ज्ञानोदय