Monday, 16 April 2012

स्त्री वैमर्शिक उपन्यास



वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'महासमर' (खण्ड 1 से 9 ) के ख्याति प्राप्त लेखक नरेन्द्र कोहली के तीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये उपन्यास हैं

 
Book : Sairandhari
Author : Narendra Kohli
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 175(HB)
ISBN : 978-81-8143-952-9
Total Pages :  130
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : 
Novel
 
पुस्तक के संदर्भ में.....
पाण्डवों का अज्ञातवास महाभारत कथा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और मार्मिक स्थल है कहा जाये कि यह एक वर्ष ही उनकी असली परीक्षा का काल था जब उन्हें अपना नैसर्गिक रूप त्याग कर अलग और हीनतर रूप धारण करने पड़ते हैं सवाल उठता है दुर्योधन की गिध्द-दृष्टि से पाण्डव कैसे बचे रह सकें ? अपने अज्ञातवास के लिए पाण्डवों ने विराट नगर को ही क्यों चुना ?  पाण्डवों के शत्रुओं में प्रछन्न मित्र कहाँ थे ? और मित्रों में प्रछन्न शत्रु कहाँ पनप रहे थे ? बदली हुई भूमिकाओं से तालमेल बैठाना पाण्डवों के लिए कितना सुकर या दुष्कर था ? अनेक प्रश्न हैं जो इस प्रसंग में उठते हैं लेकिन पाण्डवों से भी ज्यादा मार्मिक है द्रौपदी का रूपान्तरण  पाण्डवों को तो किसी-न किसी रूप में भेष बदलने का वरदान मिला हुआ था या उनमें यह गुण स्वाभाविक रूप से मौजूद था अर्जुन को अगर उर्वशी का श्राप था तो युधिष्ठिर को द्यूत प्रिय होने के नाते कंक बनने में सुविधा थी भीम वैसे ही भोजन भट्ट और मल्ल विद्या में पारंगत थे समस्या तो द्रौपदी की थी, जो न केवल सुन्दरी होने के नाते सबके आकर्षण का केंद्र थी बल्कि जिसने कभी सेवा-टहल का काम नहीं किया था सुदेष्णा जैसी रानियाँ तो उसकी सेवा-टहल करने के योग्य थीं ऐसी स्थिति में उस एक वर्ष को सैरंध्री बनकर काटना द्रौपदी के लिए कैसी अग्नि परीक्षा रही होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है द्रौपदी के सौन्दर्य को लेकर सुदेष्णा का भय और विराट की आशंका या फिर वृहन्नला और द्रौपदी की अपनी-अपनी व्यथाएँ पन्यासकार नरेन्द्र कोहली ने इस उपन्यास में की इसके साथ-साथ अनेक प्रश्नों को छुआ है, इन सबको नरेन्द्र कोहली ने अपनी सुपरिचित शैली में बड़ी सफलता से चित्रित किया है

Book : Hidimba
Author : Narendra Kohli
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 200(HB)
ISBN : 978-93-5072-209-1
Total Pages :  95
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : 
Novel

पुस्तक के संदर्भ में...
उपन्यासकार यह बताना चाहता है कि महाभारत की कथा भारतीय संस्कृति की अमूल्य थाती है यह मनुष्य के उस अनवरत युध्द की कथा है, जो उसे अपने बाहरी और भीतरी शत्रुओं के साथ निरन्तर करना पड़ता है इस संसार में चारों ओर लोभ, मोह, सत्ता और स्वार्थ की शक्तियाँ संघर्षरत हैं लोभ, त्रास और स्वार्थ के विरुध्द मनुष्य के इस सात्विक युध्द को महाभारत में अत्यन्त विस्तार से प्रस्तुत किया गया है  'हिडिम्बा' पाठकों के समक्ष प्रश्न उत्पन्न करती है कि हिडिम्बा कैसी पात्र है ? क्यों एक भाई के हत्यारे के साथ शादी करने को तैयार हो जाती है ? क्यों कुंती अपने बड़े बेटे के विवाह से पहले भीम के विवाह पर राजी हो जाती है क्यों हिडिम्बा हस्तिनापुर न जाकर जंगल में रहना ही स्वीकार करती है ? इस उपन्यास में ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिससे पाठक रूबरू होंगे
Book : Matsyagandha
Author : Narendra Kohli
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 250(HB)
ISBN : 978-93-5000-779-2
Total Pages :  95
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : 
Novel

पुस्तक के संदर्भ में....
सत्यवती के मुँह से जैसे अनायास ही निकल गया, ''मैं निषाद-कन्या ही हूँ तपस्वी ! मत्स्यगन्धा हूँ मैं  मेरे शरीर से मत्स्य की गन्ध आती है " तपस्वी खुल कर हँस पड़ा और उसने जैसे स्वत:चालित ढंग से सत्यवती की बाँह पकड़ कर उसे उठाया, "मछलियों के बीच रह कर, मत्स्यगन्धा हो गई हो पर हो तुम काम-ध्वज की मीन ! मेरे साथ आओ इस कमल-वन में विहार करो और तुम पद्म-गन्धा हो जाओगी" दोनों द्वीप पर आये और बिना किसी योजना के अनायास ही एक-दूसरे की इच्छाओं को समझते चले गये/ तपस्वी इस समय तनिक भी आत्मलीन नहीं था उसका रोम-रोम सत्यवती की ओर उन्मुख ही नहीं था, लोलुप याचक के समान एकाग्र हुआ उसकी ओर निहार रहा था सत्यवती को लग रहा था, जैसे वह मत्स्यगन्धा नहीं, मत्स्य-कन्या है यह सरोवर ही उसका आवास है चारों ओर खिले कमल उसके सहचर हैं पृष्ठ संख्या 21 से " सत्यवती को विश्वास नहीं हुआ था  पिता के दूसरे विवाह से देवव्रत को ऐसा कौन-सा लाभ होने जा रहा था, जिसके लिए देवव्रत ने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी ? यह प्रतिज्ञा पिता को प्रसन्न करने के लिए ही तो की थी न  पर, पिता को प्रसन्न करके क्या मिलेगा देवव्रत को- राज्य ही तो ? पर वही राज्य त्यागने की प्रतिज्ञा का ली है उन्होंने केवल राज्य ही नहीं- स्त्री-सुख भी क्यों की यह प्रतिज्ञा ? इससे देवव्रत को कौन-सा सुख मिलेगा ?"
 
लेखक के संदर्भ में....
नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970  में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन ।  1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष  2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये इसी महासमर के अंतर्गत तीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं