Saturday, 7 April 2012

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Book : VIJNAPAN DOT COM
Author : Dr. Rekha Sethi
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 495(HB)
ISBN : 978-93-5000-895-9
Total Pages :  310
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : 
Media


पुस्तक के संदर्भ में ......


मीडिया और मनोरंजन जगत में अपना वर्चस्व क्षेत्र स्थापित करने वाले विज्ञापन की सत्ता उसके विविधमुखी उद्देश्यों पर टिकी है/ उसका इतिहास न केवल इन सन्दर्भों को उजागर करता है, बल्कि उसके बढ़ते प्रसार क्षेत्र को समझने की अंतर्दृष्टि भी देता है/ पुस्तक में उसके सैद्धांतिक पक्ष का विवरण देते हुए उसकी बदलती अवधारणाओं इतिहास और वर्गीकरण का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है/ लेखिका कहती हैं, विज्ञापन निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है/ मीडिया अध्ययन की कक्षाओं में हम साधारणत: विद्यार्थियों को विज्ञापन बनाने का काम सौंप देते हैं / विषय और भाषा में दक्षता रखने वाले विद्यार्थी भी ऐसे समय पर चूक जाते हैं/ इस बात को ध्यान में रखते हुए ही पुस्तक में विज्ञापन निर्माण प्रक्रिया को अत्यंत विस्तारपूर्वक समझाया गया है /

पुस्तक की विषय सूची
विज्ञापन : स्वरूप एवं अवधारणा
विज्ञापन : विकास यात्रा
विज्ञापन : वर्गीकरण
विज्ञापन : उद्देश्य, कार्य एवं महत्त्व
विज्ञापन निर्माण : विज्ञापन एजेंसी ,गवेषणा, रचनात्मक परिकल्पना, विज्ञापन सन्देश अपील, कॉपी लेखन /
विज्ञापन माध्यम : प्रिंट माध्यम,रेडियो माध्यम, टेलिविज़न माध्यम /
विज्ञापन भाषा : विज्ञापन की भाषा बनाम साहित्यिक भाषा,विज्ञापन भाषा के गुण, विज्ञापन भाषा के उपकरण /
पॉपुलर कल्चर और विज्ञापन : विज्ञापन और स्त्री, विज्ञापन और बच्चे /
विज्ञापन जगत की प्रमुख हस्तियाँ : पीयूष पांडे, अनुजा चौहान, प्रहलाद कक्कड़, मधुकर कामथ, एग्नेलो डायस,...
प्रमुख विज्ञापन एजेंसियां, चुनिन्दा विज्ञापन /

लेखिका के सन्दर्भ में .....
स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता कहानी डॉ. रेखा सेठी के विशेष अध्ययन क्षेत्र रहे हैं/ मीडिया के विविध रूपों में उनकी सक्रिय भागीदारी और दिलचस्पी रही है/ पाँच वर्ष तक उन्होंने मीडिया सम्बन्धित पाठ्यक्रम पढ़ाये हैं / विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलोचनात्मक लेख व समीक्षाएं प्रकाशित होते रहे हैं / वर्तमान में वह इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं /

देश भीतर देश

वाणी प्रकाशन' के चर्चित और लोकप्रिय उपन्यासकार प्रदीप सौरभ का किन्नरों के जीवन पर आधारित उपन्यास 'तीसरी ताली' और 'मुन्नी मोबाइल' की तरह अपनी  जमीनी स्तर की लेखनी के माध्यम से आज प्रदीप सौरभ की एक पहचान है । जो वास्तविकता से रूबरू कराते हैं । चाहे वह मुन्नी मोबाइल का माध्यम हो या तीसरी ताली' प्रदीप सौरभ का तीसरा उपन्यास 'देश भीतर देश' जो पूर्वोत्तर भारत के आंतरिक कलह पर आधारित है, जो क्षेत्रवाद और देश में फैले नक्सलवाद की स्पष्ट व्याख्या करता है। 'देश भीतर देश'  भारत की एकता और अखंडता को कायम करने का सार्थक प्रयास है । thehindu. अखबार के 3 जून 2012 'देश  भीतर देश' के संदर्भ में  प्रकाशित रिपोर्ट की लिंक http://www.thehindu.com/life-and-style/metroplus/article3483269.ece आप के समक्ष प्रस्तुत है  ।
उपन्यास 'तीसरी ताली' के सन्दर्भ में http://vaniprakashanblog.blogspot.in/2012/04/blog-post_18.html  
'मुन्नी मोबाइल' के सन्दर्भ में http://vaniprakashanblog.blogspot.in/2012/04/blog-post_2133.html


प्रदीप सौरभ का किन्नरों के जीवन पर आधारित उपन्यास 'तीसरी ताली' के लिए वर्ष 2012 का 18वां अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान, यू.के. द्वारा सम्मानित किया जा रहा है । यह सम्मान प्रदीप सौरभ को लन्दन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में 28 जून,2012 दिया  गया  । मीडिया के समक्ष 'मुन्नी मोबाइल' और 'तीसरी ताली' के सन्दर्भ में प्रदीप सौरभ ने अपने विचार व्यक्त किये ।
वीडियो देखने के लिए कृपया इस लिंक पर जाए http://www.youtube.com/watch?v=lSS5Dc2fGLs&feature=share - तीसरी  ताली http://www.youtube.com/watch?v=lPH200OTCzk&feature=share- मुन्नी  मोबाइल




उपन्यास 'देश भीतर देश' पृष्ठ संख्या 5 अध्याय एक के कुछ अंश " नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन  प्लेटफॉर्म नम्बर सात पर खास तरह के यात्री थे अपनी शक्ल सूरत और वेशभूषा के चलते वे सबका ध्यान खींच रहे थे  इसी प्लेटफॉर्म पर गुवाहाटी की ओर जाने वाली ब्रह्मपुत्र एक्सप्रेस खड़ी थी यात्री अपनी बोली-भाषा में बतिया रहे थे  आसपास खड़े यात्रियों को उनकी बातचीत समझ नहीं आ रही थी कुछ चुहलबाज़ उन्हें चिंकी बता रहे थे। कुछ नेपाली  कुछ बर्मी  तो कुछ मंगोलियन । अपनी अज्ञानता के साथ आसपास खड़े ये यात्री उनकी पहचान तय करने में लगे थे''
लोकप्रिय और चर्चित उपन्यासकार प्रदीप सौरभ के  उपन्यास 'देश भीतर देश' में कहानी है एक देश में उपज रहे उन अनेक देशों की, जहाँ दिल मुश्किल से मिलते हैं और मानवीय संवाद नहीं होता/ इस कहानी की पटकथा पूर्वोत्तर में रची- बसी है, जिसे हिन्दी कहानीकारों और उपन्यासकारों ने पहले कभी विषय नहीं बनाया/ 'देश भीतर देश' का नायक विनय है, जो 'हाशिये' से नया संवाद स्थापित करता है,  प्रेम केन्द्रित भूमिका निभाता है और पूर्वोत्तर के असम की विषय कथा को कहता है. यह अवश्य ही पढ़ने योग्य कहानी है/ (सुधीश पचौरी,'देश भीतर देश' के सन्दर्भ में) 'देश भीतर देश' सात राज्यों के माध्यम से अपनी कहानी कहता है / 'देश भीतर देश'  पूर्वोत्तर भारत के आन्तरिक कलह पर आधारित है, जो कि क्षेत्रवाद की भ्रांतियाँ  को और देश में फैले नक्सलवाद को समझने में कारगर है /  उन्होंने उपन्यास के माध्यम से भारत की एकता और अखंडता को कायम करने का सार्थक प्रयास किया है /

Book : Desh Bheetar Desh
Author : Pradeep Sourabh
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 250(HB)
ISBN : 978-93-5000-954-3
Total Pages :  168
Size (Inches) :   5.75X8.75
Category  : 
Novel

प्रो.सुधीश पचौरी के विचार
पुस्तक के संदर्भ में.....

"प्रदीप सौरभ का यह तीसरा उपन्यास है/  यह देश के भीतर मौजूद 'देशों' की कथा है/ यह एकदम सामयिक और सार्थक है/ देशों के भीतर धीरे-धीरे उग आने वाले देशों की स्थानीयतावादी अस्मिताएँ जब देश के राष्ट्रवादी व्यवहार से प्रतिसंवाद करती हैं तो पैदा होने वाले तनावों, दबावों के बीच मानवानुभव बेहद चीड़चिड़े, कटखने, तिरछे और अनेक बार कंट्रोल से बाहर हो जाते हैं/ देश भीतर देश की कथा ऐसे ही असमिया समाज के बीच उगती है और अपनी उत्कट तीव्रता में हर प्रसंग में बताती चलती है कि भारत के केंद्र और उसके हाशियों के बीच, हाशियों में जीवित समाजों के बीच कितना टेढ़ा और नाराज हिंसक अंत:संवाद चलता रहता है/ जहाँ दिल मुश्किल से मिलते हों वहाँ मानवीय संवाद नहीं होता/ बन्दूक, संदेह और कानून से जो संवाद होते हैं उनसे दिल नहीं जुड़ते/ स्थानीय अकेलापन बढ़ता है/ कथा नायक विनय की कहानी इस कथा में एक विकट कहानी है/ यह एकदम नया नायक है जो 'हाशियों' से नया संवाद स्थापित करता है / जिसमें प्रेम केन्द्रीय भूमिका निभाता है/ पूर्वोतर हिन्दी में विषय कभी नहीं बना / उस समाज की संस्कृति के बीच, उसके इतिहास-भूगोल के बीच इस नये-निराले प्रेम संवाद का अनूठापन हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाला है/ प्रदीप हाशियों के घोषित कथाकार हैं/ उन्होंने 'मुन्नी मोबाइल' से लेकर 'तीसरी ताली' तक जिन हाशियाकृत अस्मितायों को जीवन्त किया है उसी क्रम में 'देश भीतर देश' असम की विषय कथा को कहता है/ यह अवश्य ही पढ़ने योग्य कहानी है"/


लेखक के  संदर्भ में.....
प्रदीप सौरभ का जन्म कानपुर, उत्तरप्रेदश में हुआ / लम्बे समय तक इलाहाबाद में गुजारा/ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया / जनआन्दोलनों में हिस्सा लिया / कई बार जेल गये/ इनका निजी जीवन खरी-खोटी हर खूबियों से लैस रहा/ कब, कहाँ और कितना जिया,इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा/ कई नौकरियाँ करते-छोड़ते दिल्ली पहुँच कर साप्ताहिक हिंदुस्तान के सम्पादकीय विभाग से जुड़े/ गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए/ पंजाब के आतंकवाद और बिहार के बंधुआ मजदूरों पर बनी फिल्मों के लिए शोध/ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 'मुन्नी मोबाइल' पर शोध /