Saturday, 31 March 2012

अपने अपने अज्ञेय


 
Book : Apne Apne Agyey
Editor : Om Thanvi 
Publisher : Vani Prakashan
Price : ` 1500( Two Parts)
Part One : ISBN : 978-93-5000-916-1
part Two : ISBN : 978-93-5000-917-8 
Total Pages : 1053
Size ( Inches) : 6.75X9.75
Category : Memoirs



पुस्तक के सन्दर्भ में 
अज्ञेय  ने लिखा है समय कहीं ठहरता है तो  स्मृति में ठहरता है / स्मृति के झरोखे में काफी कुछ छन जाता है / लेकिन इसी स्मृति को फिर से रचने की संभावनायें खड़ी होती हैं/ झरोखों से छनती धूप की तरह वह स्मृति हमें गुनगुना ताप और उजास देती है / ऐसा लगता है मानो हम उस दौर से गुज़र रहे हों/ पुस्तक के माध्यम से अपने अपने अज्ञेय ऐसे ही संस्मरणों का संकलन है / व्यक्तिपरक संस्मरणों में जितना वह व्यक्ति मौजूद रहता है जिसके बारे में संस्मरण है, उतना ही संस्मरण का लेखक भी / यों तो कोई वर्णन या विवेचन शायद पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होत, पर ऐसे संस्मरण तो हर हाल में व्यक्तित्व और उसके  कृतित्व का विशिष्ट निरूपण ही करते हैं / 
लेकिन सौ लेखकों के संस्मरण एक जगह जमा हों तो क्या ? वे एक लेखक के व्यक्तित्व और उसके रचनाकर्म की संश्लिष्टता को समझने में मददगार होंगे ? संकलन में हिंदी साहित्य की सबसे पेचीदा शख्सियत करार दिए गए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की जन्मशती के मौके पर सौ लेखकों के संस्मरण शामिल हैं / हर लेखक ने अज्ञेय को अपने रंग में देखा है / विविध रंगों से गुजरने के बाद पूरी उम्मीद है, पाठक खुद अज्ञेय की स्वतंत्र छवि बनाने या बनी छवि को जांच सकने में सक्षम होंगे /
हर लेखक हमारे सामने अपने देखे अज्ञेय को प्रस्तुत करता है और ये अपने अपने अज्ञेय जोड़ में हमें ऐसे लेखक और उसके जीवन से रूबरू करते हैं , जिसे प्राय:  टुकडों में और कई बार गलत समझा गया /

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'  का परिचय 
हिंदी साहित्य के इतिहास में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय एक अति महत्वपूर्ण और अपरिहार्य नाम है / प्रयोगवाद और नई कविता को हिंदी साहित्य में उन्होंने प्रतिष्ठित किया है / कविता के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, निबंध, समालोचना, पत्रकारिता, यात्रावृत्तांत आदि साहित्य की सभी विधाओ में उनका योगदान उच्चतम रहा है /
 अज्ञेय-साहित्य की एक विशेषता है, उनमें आधुनिकता का बोध है / उस आधुनिकता बोध में भारत की साहित्यिक-सांस्कृतिक  परंपरा के साथ पाश्चात्य साहित्य तथा विचारधाराओं का विलक्षण सामंजस्य है / इस पाश्चात्य संपर्क ने अज्ञेय को अधिक लेखक बनाया है /

पुस्तक के संपादक 'ओम थानवी'  का परिचय :
ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं/  देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं/ बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोडड़ो के लेखक हैं / अपने अपने अज्ञेय पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को  श्रदांजलि अर्पित करना है /  अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे/  एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए/  इन्होंने इसका सही रूप  'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है/
ओम थानवी का जन्म राजस्थान के फलोदी क़स्बे, जिला जोधपुर में 1 अगस्त, 1957 को एक शिक्षक परिवार में हुआ/  बीकानेर में शिक्षा-दीक्षा हुई/ वहीँ से लेखन, रंगकर्म, अभिनय और निर्देशन में सक्रिय  हुए/  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश पाने में विफल होने पर पत्रकारिता के पेशे में चले आये/  शुरुआत में जयपुर से प्रकाशित 'इतवारी' साप्ताहिक पत्रिका का सन 1980 में संपादन किया/ इसके बाद राजस्थान पत्रिका का, 1989 में जनसत्ता से जुड़े / वर्तमान में दैनिक जनसत्ता के संपादक हैं / 
 
 





मुअनजोदड़ो

सिन्धु घाटी सभ्यता के आख्यान में मोहनजोदड़ो-हड़प्पा हम सभी ने सुना है। यह 'मुअनजोदड़ो' क्या चीज है ? वहाँ के लोग मुअनजोदड़ो बोलते हैं, मुअनजोदड़ो मुआ यानी मृत और बहुवचन में मुअन मुआ का सिन्धी प्रयोग है। दड़ा यानी टीला/ मुअन-जो-दड़ो का आशय मुर्दों का टीला। 'मुअनजोदड़ो'बाद का नाम है भारत-पाक का बंटवारा क़ुदरती नहीं, बनावटी है और सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों की साझा सभ्यता-संस्कृति है

Book : Muanjodaro 
Writer : Om Thanvi
Publisher : Vani Prakashan
Price :
` 200
ISBN : 978-93-5000-723-5
Total Pages :  118
Size (Inches) :   5.75X8.25
Category  :  Travelogue

पुस्तक के संदर्भ में मधुकर उपाध्याय के कुछ विचार...

"यात्राएँ जैसी भी हों, उनका अर्थ नहीं बदलता। इसलिए कि हर यात्रा में एक अर्थ निहित है, जो उसका स्थायी भाव है। कि किनारे नहीं जाना है। सूरते-हाल जो भी हो वैसे भी पहुँचना कभी मक़सद नहीं हो सकता।  न यात्राओं का । न ज़िन्दगी का । यात्राएँ तो होती ही हैं पहुँची हुई। अपने हर क़दम पर उसी में सब हासिल-जमा । बशर्ते नज़र ठीक हो और नजरिया भी  ओम थानवी के पास दोनों की कमी नहीं है। बल्कि इफ़रात है। नतीजतन, यात्रा के अलावा पढ़ाकू फ़ुरसतों के साथ उन्होंने 'मुअनजोदड़ो'में अपने रंग भर दिए हैंउनका यह नज़रिया ही किताब का असली हासिल है।  
किसी देश या शहर के ऊपर से उड़ान भरते हुए उसके बारे में सब कुछ जान लेने वाले यात्रा वृत्तांतों से अलग, 'मुअनजोदड़ो'में नए क़रीने से चीजें देखने का सलीका है गहराइयों में उतरता। टीलों की ऊँचाइयों तक ले जाता  वह आप पर कुछ लादता-थोपता नहीं साथ चलता रहता है। बहैसियत एक ईमानदार दोस्त । 'मुअनजोदड़ो'की एक और ख़ास बात: वह यात्रा को रैखिक नहीं रहने देता ।  बल्कि कई बार अहसास दिलाता है कि आप किसी बहुमंजिला इमारत की लिफ्ट में हैं और हर मंज़िल एक कथा है  हमारे पूर्वजों की अनवरत कथा, जो जारी है अनन्तिम है। 
पुस्तक के संपादक 'ओम थानवी'  का परिचय :
ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं  देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं बहुचर्चित संकलन 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के संपादक हैं नवचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोदड़ो के माध्यम से भारत और पाकिस्तान की साझा सभ्यता-संस्कृति को उन्होंने यात्रा-वृत्तान्त के रूप में प्रस्तुत किया है  ओम थानवी का जन्म राजस्थान के फलोदी क़स्बे, जिला जोधपुर में 1 अगस्त, 1957 को एक शिक्षक परिवार में हुआ  बीकानेर में शिक्षा-दीक्षा हुई वहीँ से लेखन, रंगकर्म, अभिनय और निर्देशन में सक्रिय  हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश पाने में विफल होने पर पत्रकारिता के पेशे में चले आये  शुरुआत में जयपुर से प्रकाशित 'इतवारी' साप्ताहिक पत्रिका का सन 1980 में संपादन किया इसके बाद राजस्थान पत्रिका का, 1989 में जनसत्ता से जुड़े   वर्तमान में दैनिक जनसत्ता के संपादक हैं