Friday, 30 March 2012

मंडी में मीडिया



यह पुस्तक उन पाठकों को निराश कर सकती है जो मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते आये हैं देश की सबसे बड़ी कंपनी के सबसे बड़े मीडिया शंहशाह बनने के दौर में यह बताने की जरूरत नहीं कि मीडिया की रगों में अब किसका खून दौड़ता है ?

Book : Mandi Mein Media

Writer : Vineet Kumar
Publisher : Vani Prakashan 

Price  : ` 595(HB) ISBN : 978-93-5072-216-9
Price  : ` 275(PB) ISBN : 978-93-5072-234-3
Total Pages :  386
Size( Inches) :  4X7

Category : (
Media/Criticism)

पुस्तक के संदर्भ में..
लोकतंत्र के इस नए बसंत में अन्ना,आमजन, अंबानी और अर्णब की आवाजें एक-दूसरे से गड्डमड्ड हो गई लगती हैं 'मीडिया बिकाऊ है' के चौतरफा शोर के बीच और जस्टिस काटजू की खुलेआम आलोचना के बाद आत्म-नियंत्रण और नैतिकता की चादर छोटी पड़ने लगी है ये नज़ारा कितना नया है, ये समझने के लिए दूरदर्शन व आकाशवाणी के सरकारी गिरेबान में झाँक लेना भी जरुरी लगता है चित्रहार के गाने और फीचर फ़िल्में बैकडोर की लेन-देन से तय होती रहीं स्क्रीन की पहचान भले ही 'रूकावट के लिए खेद है' से रही हो पर ऑफिस की मशहूर लाइन तो यही थी- आपका काम हो जायेगा बशर्ते.... सड़क पर रैलियों की भीड़ घटाने के लिए फ़िल्म 'बाबी' का ऐन वक्त पर चलाया जाना दूरदर्शन का खुला सच रहा है  इन सबके बाबजूद पब्लिक ब्राडकास्टिंग आलोचना के दायरे में नहीं है तो इसके पीछे क्या करण हैं, यह किताब इस पर विस्तार से चर्चा करती है   इतिहास के छोटे-से सफर के बाद बाकी किताब वर्तमान की गहमा-गहमी और उठा-पटक पर केन्द्रित हैनिजी मीडिया ने इस पब्लिक ब्राडकास्टिंग की बुनियाद को  कैसे एक लान्च-पैड की तरह इस्तेमाल किया और खुद एक ब्रांड बन जाने के बाद इसकी जड़ें काटनी शुरू कर दीं, यह सब जानना अपने आप में दिलचस्प है "हमें सरकार से कोई लेना-देना नहीं" जैसे दावे के साथ अपनी यात्रा शुरू करनेवाला निजी मीडिया आगे चलकर कॉर्पोरेट घरानों की गोद में यूँ गिरा कि नीरा राडिया जैसी लॉबीइस्ट की लताड़ ही उसका बिज़नेस पैटर्न बन गया सवाल है कि किसी ज़माने में पत्रकारिता को मिशन मानने वाला पत्रकार आज कहाँ खड़ा है - मूल्यों के साथ या बैलेंस-शीट के पीछे ? जब मीडिया के बड़े-बड़े जुर्म एथिक्स के पर्दे से ढँक दिए जाते हों तब यह सवाल उठना लाजिमी भी है कि राडिया-मीडिया प्रकरण और उसकी परिणति के बाद लौटे  'सामान्य दिन' क्या वाकई सामान्य हैं, या हम मीडिया, सत्ता, और कॉर्पोरेट पूँजी की गाढ़ी जुगलबंदी के दौर में अनिवार्य तौर पर प्रवेश  कर चुके हैं, जहाँ केबल ऑपरेटर उतना ही बड़ा खलनायक है, जितना हम प्रायोजकों को मानते आये हैं

लेखक के संदर्भ में....
हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से एफ एम चैनलों की भाषा पर एम. फिल.(2005)  मीडिया और हिन्दी पब्लिक स्फीयर के बदलते मिजाज़ पर पिछले पाँच वर्षों से लगातार टिप्पणी  वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोरंजन प्रधान चैनलों की भाषा एवं सांस्कृतिक निर्मितियां पर रिसर्च 

मीडिया रिपोर्ट
वाणी प्रकाशन के युवा लेखक और दिल्ली विश्ववद्यालय में रिसर्च फैलो विनीत कुमार ने अपनी पुस्तक "मंडी में मीडिया' के सन्दर्भ में जनसत्ता अख़बार (4 जून 2012 ) में उनका लेख 'कॉरपोरेट जगत का नया खेल' प्रकाशित हुआ था 
 माध्यम से पढ़ सकते हैं

तहलका (हिन्दी) पत्रिका 16 जून के अंक में प्रकाशित समीक्षा https://www.facebook.com/photo.php?fbid=4251498808836&set=a.4251498648832.2173157.1326722260&type=1&theater

हिन्दू (अखबार) 20 सितम्बर 2012 का अंक METRO PLUS , PAGE NO -3 में प्रकाशित लेखक के विचार आप से http://www.thehindu.com
 




शहर और सिनेमा वाया दिल्ली


पाठकगण और लेखकगण आप हमारे युवा लेखक और दिल्ली विश्ववद्यालय में रिसर्च फैलो मिहिर पंड्या की पुस्तक  'शहर और सिनेमा वाया दिल्ली' के सन्दर्भ में deccanchronicle अखबार और thehindu अखबार में 27 मई 2012 की प्रकाशित साक्षात्कार और पुस्तक समीक्षा आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं
वाणी प्रकाशन अपने युवा लेखक को बधाई देता है  इस पुस्तक से सम्बन्धित जानकारी आप http://vaniprakashanblog.blogspot.in/2012/03/blog-post_6970.html  और वाणी प्रकाशन की वेबसाईट http://vaniprakashan.in के माध्यम से प्राप्त का सकते हैं
पुस्तक के सन्दर्भ में हिंदुस्तान (पटना) 3 जून 2012 को  प्रकाशित मिहिर पंड्या का साक्षात्कार इस लिंक के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत हैhttps://www.facebook.com/photo.php?fbid=4174745530052&set=a.1344581497720.2049315.1326722260&type=1&theater
दैनिक भास्कर (रस रंग ) में,  10 जून 2012 को प्रकाशित मिहिर पंड्या का लेख 'सिनेमा में शहर' आप के समक्ष http://epaper.bhaskar.com/magazine/rasrang/211/10062012/mpcg/1/ प्रस्तुत है।


इतिहास के भग्नावशेष उसके प्यार की अनगढ़ कहानियाँ बन जाते हैं और कैम्पस की चौड़ी सड़कों के किनारे बनी पत्थर की सीढ़ियाँ इन्तजार की अनगिनत शामों की हमसफ़र / प्रेम के भिन्न रूप यहाँ मिलते हैं और किस तरह यह शहर प्रेम के सामने पड़ने पर अपने रंग बदलता है,देखा जाना चाहिए/

Book : SHAHAR AUR CINEMA : VIA DILLI
Publisher : Vani Prakashan
Write
r : Mihir Pandya
Price  : ` 495(HB)  
ISBN  : 978-93-5000-841-6
Total Pages :  286
Size( Inches) :  4X7

Category : (Cinema
)

पुस्तक के संदर्भ में....
इसी सत्ता के शहर में एक लड़की प्यार करती है/ असंभाव्य प्यार और अपने वर्जित कृत्य के लिए इस भीड़ भरे शहर से एक निर्जन कोना चुरा लेती है/ इतिहास के भग्नावशेष उसके प्यार की अनगढ़ कहानियाँ बन जाते हैं और कैम्पस की चौड़ी सड़कों के किनारे बनी पत्थर की सीढ़ियाँ इन्तजार की अनगिनत शामों की हमसफ़र/ इस महानगर राजधानी के हृहयस्थल पर घूमते हुए एक और लड़की ने कभी मुझे बताया था कि उसे यह भीड़ बहुत पसंद है/  जिसमें कोई किसी को नहीं पहचानता हो / जिसमें उसका खो जाना संभव हो / रोज़मर्रा का शहर / एक चोर की कथा के मार्फ़त आप इस बीहड़ के भीतर प्रविष्ट होते हैं और भिन्न कालों में भिन्न यारों की टोलियाँ आपको इस शहर में प्रेम और विद्रोह के असल मायने समझती हैं/ 
लेखक के संदर्भ में .....
 दिल्ली मिहिर पंड्या का जन्म 2 सितम्बर 1985 (उदयपुर) राजस्थान में हुआ  बी.ए. के दौरान खेल पर एक अखबारी कॉलम से लेखन की शुरुआत विश्वविद्यालय से एम.ए.,एम. फिल. । एम.ए.के दौरान गाँधी की सिनेमाई संरचना पर शोध कार्य वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में जूनियर रिसर्च फैलो
अगर आप हिन्दी की पुस्तकों को खरीदना चाहते हैं, तो अब आप सीधे वाणी प्रकाशन के विक्रय विभाग से  पुस्तकें मंगवा सकते हैं, पुस्ताकादेश देने के माध्यमों की जानकारी निम्नलिखित है।


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मेरी बड़ी किताब





किस्से बनाने में, गप्पें सुनाने में, फ्रांत्स होलर बड़े उस्ताद हैं/ इनका रहस्य इसमें है कि यह जवाबों में यक़ीन नहीं रखते/ इनसे हर अंड-बंड सवाल पूछा जा सकता है और फिर किसी भी चटपटे जवाब की उम्मीद की जा सकती है/  यही तो बच्चे भी करते हैं, और इसलिए वे होलर की कहानियाँ पढ़-पढ़ कर लोट-पोट हो जाते हैं/ स्विट्ज़रलैंड में दशकों से हो रहे हैं/ पूरे यूरोप में हो रहे हैं/ अब भारत में होंगे /
(स्विस पुस्तक Das Grosse Buch का हिन्दी अनुवाद)
मेरी बड़ी किताब

Book : Meri Badi Kitab
Author(s) : Franz Hohler. Nikolaus Heidebach 
Translator : Amrit mehta
Publisher : Vani Prakashan

ISBN : 978-93-5072-205-3 
Price  : ` 495
Total Pages :  316
Size( Inches) :  7.25 X10
Category : Children book/ Stories

पुस्तक के संदर्भ में ....
एक भारी-भरकम पत्थर सिनेमा देखने कैसे आया ? बर्फ़ानी खुले इलाके में क्या एक हट्टे-कट्टे एल्क को गैस-मास्क बेचा जा सकता है ? पहाड़ स्विट्ज़रलैंड आये तो कैसे ? और यूरोप की सुंडी 'मेड इन हांगकांग' कैसे बन गयी ? दुनिया में पहेलियाँ ही पहेलियाँ हैं, और हर पहेली का जवाब एक किस्सा बन जाता है/ ऐसे किस्से बनाने में, गप्पें सुनाने में, फ्रांत्स होलर बड़े उस्ताद हैं/ इनका रहस्य इसमें है कि यह जवाबों में यक़ीन नहीं रखते/ इनसे हर अंड-बंड सवाल पूछा जा सकता है और फिर किसी भी चटपटे जवाब की उम्मीद की जा सकती है/  यही तो बच्चे भी करते हैं, और इसलिए वे होलर की कहानियाँ पढ़-पढ़ कर लोट-पोट हो जाते हैं/ स्विट्ज़रलैंड में दशकों से हो रहे हैं/ पूरे यूरोप में हो रहे हैं/ अब भारत में/

लेखकों के संदर्भ में ......

फ्रांत्स होलर  : बील (स्विट्ज़रलैंड) में जन्मे फ्रांत्स होलर स्विट्ज़रलैंड के जाने माने  लेखकों में से एक हैं/ बच्चों और बड़ों को हँसाने में होलर की अपनी एक अलग पचान है/ कहानी, कविता, बाल साहित्य लिखने के अलावा सेलो, वायलिन, माउथ-ऑर्गन भी बजाते हैं/ हिन्दी में इनके उपन्यास 'प्रस्तरवृष्टि','खटखट' तथा कहानी-संग्रह 'धोखा' प्रकाशित हो चुके हैं/ हर विधा के लिए यह अनेकों पुरस्कार पा चुके हैं/

निकोलाउस हाइडलबाख़
निकोलाउस हाइडलबाख़ : कोलोन ( जर्मनी) में 1955 में जन्म / बाल-साहित्य तथा किशोर-साहित्य के लिए वर्षों से चित्रण कर रहे हैं/ सुन्दर तथा सटीक चित्रों के लिए अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित/