Tuesday, 28 August 2012

'योजनाओं का शहर'



'योजनाओं का शहर' के पृष्ठ संख्या 11, 'आदमीनामा' से -

'जब भी कहा जाता है मुझसे कि
पता नहीं आप आदमी हैं कि क्या हैं 
तो मुझे लगता है कि आदमी होकर भी 
अपने को आदमी कहलवा लेना आसान नहीं है 

इसका एक रास्ता यह है कि 
आप अपने को आदमी मानना ही छोड़ दें 
और तोता बन जाएँ 
जो सामने पड़ें उसी की भाषा दोहराते जाएँ 
या फिर एकदम चुप हो जाएँ और 
शरीर को इस तरह झुकाएँ की मेज़ नज़र आएँ 
दूसरों को रखने दें टांगें अपनी पीठ पर 

जो जितना कम आदमी रहता है 
वह उतना ज्यादा आदमी समझा जाता है 
उसकी तारीफ़ में कहा जाता है...
क्या आदमी है !
                                -संजय कुंदन 


Book :  Yojnaon Ka Shahar
Author : Sanjay Kundan
Price : `200(HB)
ISBN : 978-93-5072-207-7
Total Pages : 96
Size (Inches) : 5.50X8.50
Category  : Poetry

पुस्तक के सन्दर्भ विष्णु नागर जी के विचार...
नब्बे के दशक में जो कवि हिन्दी कविता की दुनिया में उभरकर सामने आये, उनमें निश्चय ही एक उल्लेखनीय नाम संजय कुंदन का है। संजय ने इस कविता-संग्रह ‘योजनाओं का शहर’ तक आते-आते अपनी कविता में जो सहजता, मार्मिकता तथा शब्दों की अपस्फीति हासिल की है, वह खासतौर पर ध्यान देने योग्य है। यह कविता विशेष रूप से पिछले दो दशकों की तमाम मुश्किलों का सबसे विश्वसनीय ढंग से बखान करने वाली कविता है मगर खुद यह कविता मुश्किल नहीं है। यह कविता मुश्किल इसलिए नहीं है क्योंकि यह सबसे विश्वसनीय है। यह कविता हिन्दी कविता की उस बीमारी से भी मुक्त है जहाँ कवि हर छोटी-छोटी बात पर अतीत की खोल में घुसकर वर्तमान को गरियाना शुरू कर देता है। संजय की लगभग सारी कविताओं में आप देखेंगे कि उसमें वर्तमान जैसा है और कवि जिस तरह उसका सामना कर रहा है, जिस तरह उसे देख-समझ रहा है, जिस तरह उसमें फँसा-दबा-खड़ा-तना है, वह साफ-साफ यहाँ दीखता है। पहली ही बार शायद इस कविता में इस बात का खुलासा भी हुआ है कि आज का नौकरी-तंत्र कितना वीभत्स बन चुका है, जिसमें एक साधारण कर्मचारी को किसी भी बहाने, कभी भी दरवाजा दिखाया जा सकता है। किसी से कहा भी जा सकता है कि दरअसल आप इंसान तो बेहतर हैं लेकिन नौकर अच्छे नहीं हैं। आपको इस हद तक डरा दिया जा सकता है कि आप ऑफिस का पेपरवेट या कंप्यूटर माउस या आलपिन बनने का सपना देखने लग जाएँ ताकि अपने अधिकारी की नजर में चढ़ जाएँ। आपकी इसलिए छँटनी की जा सकती है कि आपकी कमीज, अधिकारी की कमीज से सफेद क्यों है, कि आपने इस उठाईगीरे या उस हत्यारे की तारीफ क्यों नहीं की?
दरअसल संजय की कविता आज की साधारण-सामान्य जिन्दगी का दस्तावेज है। एक निम्नवर्गीय शहरी का जीवन नल आने के इन्तजार में कैसे खप और बदल जाता है, यह कविता इस बात की गवाही देती है। यह कविता साधारण आदमी के जीवन से दाल के गायब हो जाने जैसी मामूली बात भी करती है। यह कविता नमक, माचिस, गुड़ की बात भी करती है। यह उस आदमी को अपराधी बना दिए जाने की बात करती है जो कभी अक्सर किनारे बैठकर नदी में कंकड़ फेंकता हुआ देखा जाता था, जो छठ के मौके पर नंगे पैर सिर पर टोकरी उठाए हाँफते हुए गंगा तट तक जाता था, जो ईंट के विकेट के आगे चौके-छक्के उड़ाता हुआ नजर आता था। यह कविता इस तरह साधारण के तमाम असाधारण विवरणों से भरी हुई है लेकिन अपनी असाधारणता को भी साधारणता के साथ धारण किए हुए, बिना शोर किए, बिना चीखे-चिल्लाये। वह असाधारण को इस तरह साधारण करती है कि जो साधारण बार-बार दिखने के कारण न दिखने जैसा लगने लगा था, वह दिखने लग जाता है लेकिन कवि उसे इस तरह नहीं दिखाता कि देखो-देखो, यह मैं हूँ जो आपको दिखा रहा हूँ बल्कि कवि तो चुपके से आपके और यथार्थ के बीच न आने की भरपूर कोशिश करता है। आप इस कविता की मार्मिकता से भी जब गुजरते हैं तो ऐसे नहीं कि आपको मार्मिकता का टूरिज्म कराया जा रहा है बल्कि इस तरह जैसे वह वहाँ पहले से मौजूद हो, बस ये है कि आपने संयोग से उसे कविता के बहाने देख लिया है। इस कविता में व्यंग्य भी जहाँ-तहाँ बिखरा पड़ा है लेकिन वह बड़बोला नहीं है, हाँ बोलता जरूर है। इसमें एक कविता है ‘हाँ बोलने के बारे में’, जो दरअसल न बोलने की जरूरत के बारे में है। यही बात इन सारी कविताओं पर भी लागू होती है। यह हाँ के विरुद्ध इनकार की कविता है।

लेखक के सन्दर्भ में...
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमन्त स्मृति सम्मान से पुरस्कृत संजय कुंदन का जन्म , 7 दिसम्बर 1969, पटना (बिहार) में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी साहित्य) पटना विश्वविद्यालय से किया । इनकी प्रकाशित कृतियों में  'कागज के प्रदेश में', 'चुप्पी का शोर' (कविता संग्रह); 'बॉस की पार्टी' (कहानी संग्रह); 'टूटने के बाद' (उपन्यास) सम्मिलित हैं । वर्तमान में दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’, दिल्ली में सहायक सम्पादक हैं ।

मीडिया रिपोर्ट
 25 अगस्त 2012 दैनिक भास्कर, (अखबार) में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा की  लिंक  http://epaper.bhaskar.com/new-delhi/194/25082012/cph/1/  


'योजनाओं का  शहर' (कविता संग्रह) से मोहल्ले में पानी (कविता) समयमान (पत्रिका) के सितम्बर, 2012 का  अंक https://www.facebook.com/photo.php?fbid=4677212571414&set=a.1344581497720.2049315.1326722260&type=1&theater

प्रभात खबर (अख़बार) 30 सितम्बर 2012 http://prabhatkhabar.com/node/213755


अमर उजाला (अख़बार) 7 अक्टूबर  2012 (
इस लिंक के http://epaper.amarujala.com/svww_index.php पृष्ठ संख्या 13 में प्रकाशित समीक्षा ) 

Monday, 27 August 2012

'मैं एक हरफ़नमौला'


'मैं एक हरफ़नमौला- ए .के. हंगल 
'सब कुछ वैसे ही हुआ जैसी कि उम्मीद थी । मैंने अधिकारियों को सन्देश भिजवा दिया कि मैं अब हिन्दुस्तान जाने के लिए तैयार हूँ । कुछ दिन बाद मुझे कराची के एडमिनिस्ट्रेटर के सामने पेश किया गया - ताकि मैं अपने फैसले के बारे में ख़ुद उसे बता सकूँ । उसने अपनी रजामन्दी दे दी और मुझे घंटे के अन्दर-अन्दर मुल्क छोड़ने का हुक्म सुना दिया गया 
अगली सुबह कराची बन्दरगाह पर कुछ और दोस्त और पार्टी के साथी मुझे अलविदा कहने आये । मेरे साथ मेरी पत्नी और बेटा भी था 
उन लम्हों की छटपटाहट को बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं । उस ज़मीन को छोड़ कर जाना जहाँ मैं पला-बढ़ा, जहाँ मैंने अपनी राजनीतिक लड़ाइयाँ लड़ी थीं, संगीत और थियटर की दुनिया से अपने तार जोड़े थे, और जाने कितने करीबी दोस्त बनाये थे -कोई ख़ुशगवार एहसास नहीं था ।' आत्मकथा'मैं एक  हरफ़नमौला'  के पृष्ठ संख्या 64 अलविदा कराची! से, - ए .के. हंगल 


Book :  Main Ek Harfanmaula
Author : A. K. Hungal
Translator : Yugank Dhir
Price : `100(PB)
ISBN : 978-81-8143-935-2
Total Pages : 144
Size (Inches) : 5.50X8.50
Category  : Autobiography

पुस्तक के सन्दर्भ में ...
'कुछ अरसा पहले, दिल्ली में, मेरी मुलाकात स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री 
एस.के. घई से हुई थी। वह श्री गौतम कौल की पुस्तक ‘सिनेमा एंड द फ्रीडम स्ट्रगल’ की रिलीज का मौका था, जिसे स्टर्लिंग पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया था। श्री कौल इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के डायरेक्टर जनरल रह चुके हैं।
इस पुस्तक का लोकार्पण (रिलीज) भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के हाथों हुआ था, और इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में मुझे भी बॉम्बे से आमंत्रित किया गया था।
अपना भाषण देने के बाद जब मैं मंच पर अपनी सीट पर वापस बैठा तो मैंने मि. घई को बिल्कुल अपनी बगल में बैठे पाया। जल्दी ही हमारे बीच यह बात तय हो गई कि मैं अपनी आत्मकथा लिखूँगा और वे उसे प्रकाशित करेंगे। लेकिन बॉम्बे लौटने के बाद जब मैं कागज-कलम लेकर लिखने बैठा तो मुझे यह काम काफी मुश्किल लगा। पहली बात तो यह कि मैं एक लेखक नहीं हूँ। दूसरे मैंने किसी डायरी वगैरह की शक्ल में अपनी जिंदगी का कोई हिसाब-किताब भी नहीं रखा था। मेरे पास एक डायरी जरूर रहती है, लेकिन उसमें सिर्फ मेरी शूटिंगों, रिहर्सलों, यात्राओं, स्टेज-कार्यक्रमों और अन्य सार्वजनिक समारोहों की तारीखें दर्ज रहती हैं। तारीखों के मामले में मेरी याददाश्त कोई खास अच्छी नहीं है। बतौर एक एक्टर मेरा अहम काम है जिंदगी में पूरी-पूरी शिरकत करना, अपने आस-पास की चीजों को ध्यान से देखना, परखना और समझना, और लोगों, चरित्रों वगैरह का गहराई से अध्ययन करना। सच्चाई यह है कि मैंने अपने जन्मदिन की तारीख याद रखने की भी परवाह नहीं की है। आमतौर से इसे 15 अगस्त लिखा जाता है, लेकिन यह सही तारीख़ नहीं है। सिर्फ इत्तफ़ाक  से ही यह तारीख़ मेरे साथ चिपक गई है, जिसके बारे में पाठक विस्तार से इस पुस्तक में पढ़ेंगे। एक फ्रीडम फाइटर होने के नाते मैंने इस तारीख़ को ज्यों-का-त्यों रहने दिया है।
कई वर्ष बाद, जब अपना पासपोर्ट बनाने के सिलसिले में मुझे अपने जन्मदिन की सही तारीख़ बताने की जरूरत पड़ी तो मैंने अपने बुजुर्गों और रिश्तेदारों से पूछकर इसका पता लगाया था। फिर भी, अगर पाठकों को पुस्तक में अन्य कहीं किसी तारीख़ को लेकर कोई शंका महसूस हो, तो मेरा उनसे अनुरोध है कि मुझे इस संबंध में सूचित करने में जरा भी संकोच न करें। मैं उनका आभारी रहूँगा। 
मैं उन सभी व्यक्तियों के प्रति भी अपना आभार प्रकट करना चाहूँगा जिन्होंने इस पुस्तक के लेखन में मेरी मदद की है।'-
 
ए.के. हंगल, 
 31 दिसंबर, 1998

लेखक -ए .के. हंगल के सन्दर्भ में...
जजों और डिप्टी-कमिश्नरों के खानदान से होने के बावजूद ए. के. हंगल ने एक दर्जी के रूप में अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत करने का फैसला किया -बावजूद इसके की ब्रिटिश सरकार उन्हें उनके पिता की तरह एक प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त करने के लिए तैयार थी  । 
अपने मामा की उँगली छुड़ाकर भीड़ में 'खो गए' एक नन्हें और उत्साही बालक की तरह ए. के. हंगल जिन्दगी भर अपने इस 'खोएपन' का मजा लेते रहे हैं,  और राजनीति से लेकर रंगमंच और सिनेमा तक हर क्षेत्र में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के रंग बिखेरते रहे हैं 
उनकी आत्माकथा हर तरह के पाठकों के लिए -खासकर प्रगतिशील विचारधारा थिएटर और सिनेमा में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए -एक अत्यन्त रोचक, विचारोत्तेजक  और आनंददायक अनुभव साबित हो सकती है   वाणी प्रकाशन ने वर्ष 2008 में इनकी आत्मकथा 'मैं एक हरफनमौला' प्रकाशित की थी।'पद्मभूषण' से सम्मानित एक समर्पित समाजसेवी, रंगकर्मी और फ़िल्म अभिनेता ने  26 अगस्त 2012 को दुनिया से अलविदा कह दिया  । वाणी प्रकाशन उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है ।

अनुवादक के सन्दर्भ में...
युगांक धीर  पिछले  सत्रह वर्षों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत रहे , कुछ वर्षों से अनुवाद-कार्य से जुड़े हुए हैं । 'इजाडोरा की प्रेमकथा', 'रूसो की आत्मकथा', 'मादाम बोवारी', 'गान विद द विंड' और 'हालीवुड बुला रहा है' (इन्ग्रिड बर्गमेन की जीवन-कथा) जैसी उनकी कुछ अनूदित कृतियाँ काफी लोकप्रिय हुई हैं 



अगर आप इस  पुस्तक को प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप सीधे वाणी प्रकाशन के विक्रय विभाग से पुस्तक मंगवा सकते हैं, पुस्ताकादेश देने के माध्यमों की जानकारी निम्नलिखित है। 

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Saturday, 18 August 2012

झूठी है तेतरी दादी




Book :  Jhoothi Hai Tetri Dadi
Author : Sanjeev
Price : `150(HB)
ISBN : 978-93-5000-821-8
Total Pages : 100
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Collection of Short Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में...
पुस्तक 'झूठी है तेतरी दादीग्यारह कहानियों का संग्रह है   इस संग्रह में एक कहानी है  'झूठी है तेतरी दादीयह ऐसी कहानी हैजो हमारी सामाजिक जाति आधारित व्यवस्था को दिखाती हैतेतरी साठ वर्ष पहले आरा रेलवे स्टेशन पर डोली में आती हैशायद लगन के दौरान होने वाली शादी थी   स्टेशन पर दुल्हन ही दुल्हन,  ट्रेन में भीड़ ही भीड़ तभी ट्रेन ने सीटी दी और चल पड़ी  तेतरी के भाई और बाबूजी ने उसे उठा कर ट्रेन में फेंक दिया थाजैसे वह इंसान ही नहीं   तेतरी को कुछ भी पता नहीं कि कहाँ जा रही है   एक अनजानासा डर कहीं ये लोग डाकू तो नहीं और वह बेहोश गयी  
होश आया तो पाया कि कुछ औरतें उसे पकड़े हुए हैं और कोई दूल्हा जैसा बगल में है और उसकी परछन हो रही है     चार दिन गुजरने के बाद पगफेरा में जो लोग आये  वे दूसरे ही लोग  थे     जब तेतरी को उनके पास भेजा गया तो  उन्होंने कहा यह हमारी बेटी नहीं है    पाण्डेय जी के बाबू जी ने पूछा कि यह कौन हैतो उन्होंने कहा हमें नहीं पताकौन हैलेकिन हमारी बेटी नहीं है    ले आइए हमारी बेटी को   अब बात स्पष्ट हो चुकी थी कि दुल्हन अदला -बदली गयी है   तेतरी को भी डरा धमका कर पूछा गया कि वह कौन है?  उसे सिर्फ अपने गाँव का नाम याद था सुकुलपुर   तेतरी को यह भी पता नहीं था की सुकुलपुर कहाँ है   बहुत खोजाहट हुईलेकिन सुकुलपुर का पता न चला    इस बीच तेतरी गर्भवती हो गयी    बहुत सोच विचार कर यह मान लिया गया कि यह सुकुलपुर की ब्राह्मण ही होगी  शायद उनके पास तेतरी को स्वीकार करने के आलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था   यह बात किसी को पता नहीं चली कि तेतरी कौन हैतेतरी से चार बच्चे भी  हुए     तेतरी के पति पाण्डेय जी का भी स्वर्गवास हो गया था  पोते  के शादी ब्याह के सिलसिले में सुकुलपुर से कोई आया और दुल्हन अदलाबदली का किस्सा सुनाने लगा तब यह बात खुली की तेतरी सुकुलपुर की एक निम्न जाति की लड़की थी   
जो बदलाकर पाण्डेय जी के घर में आ गयी थी   यहाँ पर तेतरी का पारिवारिक बहिष्कार शुरू होता हैउसके परिवार वाले बूढी तेतरी को घर से निकाल कर सुकुलपुर छोड़ आते हैं । जहाँ  उसके मायके वाले उसे कुजात की उपाधि देते हैं  साठ वर्ष का डर तेतरी को खा गयावह पागल हो कर मर गयी   कहानी स्पष्ट करती है कि  जाति के स्वरूप में चाहे जो भी परिवर्तन हो रहा होपर जाति से पीछा छुड़ाना आज भी सम्भव नहीं लगता है झूठी है तेतरी दादीकहानी भारतीय जाति आधारित व्यवस्था को सामने लाती है   सतहत्तर-पचहत्तर वर्ष की विधवा का विडम्बनापूर्ण परिस्थियों में फँस कर एक  ब्राह्मण परिवार में जाना   बेटा-बेटीनाती-पोता होने के बाद उसे घर से इसलिए निकाल दिया गया की वह निम्न जाति की थी     एक अनपढ़दलित स्त्री की व्यथा को कहानी रेखांकित करती है    प्रेमचन्द से पहले हिन्दी कहानी उस रूप में नहीं थी, जिस रूप में उसे बाद में जाना गया - जिस रूप में एक साहित्य-विधा के बतौर उसने मान्यता पायी। पहले कहानी का मतलब था आख्यानऔर वह आख्यान कथा सरित्सागर’, ‘कादम्बरी’, ‘अरब की हजार रातें’ से होता हुआ हिन्दी तक आया था। प्रेमचन्द ने आख्यान-तत्त्व को बरकरार रखते हुएउसमें भारत के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक यथार्थ की भावना देकर हिन्दी कहानी का विकास किया। उसके बाद हिन्दी कहानी वह नहीं रह गयीजो पहले थी। 1980 के दशक के कथाकारों में प्रेमचन्द की यथार्थवादी धारा को वर्तमान तक लाने वाले हस्ताक्षरों में संजीव का नाम अग्रणी है।
वे उन कथाकारों में भी हैं जिनके नाम के साथ अंग्रेजी का प्रोलिफ़िक’ विशेषण बेहिचक जोड़ा जा सकता है। सात उपन्यासों और ग्यारह कहानी संग्रहों के साथ वे समकालीन कथाकारों में दूर से पहचाने जाते हैं। लोक संस्कृति और शहरी संस्कृति के द्वन्द्व को जिस पैनी दृष्टि से उनकी रचनाएँ उभारती हैंउसी अभिज्ञा के साथ भूमंडलीकरणबाजार अर्थ-नीति और विकास के निहितार्थ भी उनके यहाँ उजागर होते हैं। ग्यारह कहानियों के संजीव के इस नये संग्रह में भी सजग पाठक देखेंगे कि एक ओर जहाँ ग्राम-समाज में पारम्परिक सामन्ती ढाँचा बुरी तरह चरमरा रहा है और एक तरह का नया अर्थवाद उभरकर सामने आ रहा है (मौसम)वहीं दूसरी ओर पर्दा प्रथाजाति और वर्ण की जकड़बन्दी यथावत् हैजिसका आखेट तेतरी जैसी निश्छल-निरक्षर महिलाएँ होती हैं। यहाँ संजीव हत्यारा’ और हत्यारे’, ‘नायक’ और खलनायक’ और अभिनय’ को जिन अर्थों में परिभाषित करते हैंउनके बाजार-पूँजीवादकृषि-विमुख औद्योगिक जाल और मीडिया द्वारा प्रचारित नयी रूढ़ियों के अट्टहास साफ-साफ सुने जाएँगे। संजीव की ये कहानियाँ आज के विश्व-समय की हमारे सामाजिक जीवन और आर्थिक ढाँचे पर पड़ रही प्रतिछाया का अभिलेख-भर नहीं हैं, बल्कि एक जरूरी और उत्तेजक विमर्श भी खड़ा करती हैंजिसका सम्बन्ध हम-आप-सब से है।

लेखक के सन्दर्भ में...
संजीव का जन्म 6 जुलाई 1947, बांगर कलां, सुल्तानपुर (उ.प्र.) में हुआ । शिक्षाः बी.एससी., ए.आई.सी. (भारत) । प्रकाशित कृतियाँ: ‘तीस साल का सफ़रनामा’, ‘आप यहाँ हैं’, ‘भूमिका और अन्य कहानियाँ’, ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’, ‘प्रेत मुक्ति’, ‘ब्लैक होल’, ‘खोज’, ‘गति का पहला सिद्धान्त’, ‘गुफा का आदमी’, ‘आरोहण’, ‘दस कहानियाँ’, ‘गली के मोड़ पर सूना-सा एक दरवाजा’ (कथा संग्रह), ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’, ‘सावधान नीचे आग है’, ‘धारा’, ‘पाँव तले की दूब’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’, ‘सूत्राधार’, ‘आकाश चंपा’ (उपन्यास), रानी की सराय (किशोर उपन्यास), भिड़न्त (बाल कहानियाँ)। इसके अतिरिक्त विपुल मात्रा में विविध असंकलित लेखन।
सैंतीस वर्षों तक इस्को, कुलटी में रसायनज्ञ रहने के बाद स्वैच्छिक सेवा अवकाश। अनेक संस्थाओं के सलाहकार सदस्य रह चुके हैं। 
पुरस्कार एवं सम्मान :  प्रथम कथाक्रम सम्मान-1997, गण मित्रा सम्मान-1998, इन्दु शर्मा स्मृति अन्तरराष्ट्रीय सम्मान, लन्दन-2001, प्रेमचन्द सम्मान (40 बंग)-2002, भिखारी ठाकुर लोक सम्मान-2005, पहले सम्मान-2006, जनपद सम्मान, सुल्तानपुर-2006, सुधा स्मृति सम्मान, भागलपुर-2008।     

Thursday, 9 August 2012

विजयदान देथा


विजयदान देथा 
राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्र में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है   पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से पुरस्कृत विजयदान देथा का जन्म 1 सितम्बर 1926, राजस्थान में हुआ । इन्हें इनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैं । देथा ने 800 से अधिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ में हो चुका है । उनकी कहानियों पर आधारित  तीन हिन्दी फिल्में -दुविधा, पहेली और परिणीता बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं । 

विजयदान देथा के बारे में यह तथ्य भी जानना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि अधिकांश कहानियाँ मूलतः राजस्थानी में लिखी गयी थीं, सबसे पहले-‘बातारी फुलवारी’ नाम से उनका विशाल कथा ग्रंथ (तेरह खंडों में) प्रकाशित हुआ था । बाद में जब उनकी कहानियों के दो संग्रह हिन्दी में प्रकाशित हुए तो पूरा हिन्दी संसार चौंक पड़ा क्योंकि इस शैली और भाषा में कहानी लिखने की कोई परम्परा तथा पद्धति न केवल हिन्दी में नहीं थी बल्कि किसी भी भारतीय भाषा में नहीं थी। उनकी कहानियाँ पढ़कर विख्यात फिल्मकार मणिकौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा-
‘‘तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। ...तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। ...गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने  रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है।’’ हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाये खीरे में बीज की जगह ‘कंकड़-पत्थर’ भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किन्तु बाद में एक व्यापारी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधियाँ गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं हीरे थे। विजयदान देथा के साथ भी यही हुआ। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिन्दी में आयीं तो हिन्दी संसार की आँखें चौंधियाँ गयीं। स्वयं मणिकौल ने उनकी एक कहानी ‘दुविधा’ पर फिल्म बनाई।  
ब्लॉग पर अनोखा पेड़  
 

Book :  Trikon
Author : Vijaydan Detha 
Price : `395(HB)
ISBN : 978-93-5072-153-7
Total Pages : 228
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Novel

Book :  Chhabbees Kahaniyan
Author : Vijaydan Detha 
Price : `195(PB)
ISBN : 978-93-5000-813-3
Total Pages : 388
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Collection of Stories

Book :  Anokha Ped
Author : Vijaydan Detha 
Price : `300(HB)
ISBN : 978-93-5072-154-4
Total Pages : 152
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Collection of Stories

Tuesday, 7 August 2012

दलित चेतना की पहचान


Book :  Dalit Chetana Ki Pahchan
Editor :  Dr. Suryanarayan Ransubhe
Price : `395(HB)
ISBN : 978-93-5072-247-3
Total Pages : 200
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Dalit Literature
Publication Year: 2012


पुस्तक के सन्दर्भ में डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे के विचार..... 
भारतीय सवर्ण मानसिकता की एक विशेषता यह है कि जो भी दलित या उपेक्षित द्वारा लिखा जाता है, वह स्तरीय नहीं होता  यह निर्णय वे उस रचना को पढ़ने से पूर्व ही ले लेते हैं  । परिणामत: उस रचना की ओर वे पूर्वग्रह दृष्टि से देखने व सोचने लगते हैं । लेखक किस जाति का है, इस आधार पर कृति की श्रेष्ठता या कनिष्ठता निश्चित की जाती है । ऐसे लोगों से साहित्यिक बहस या संवाद हो भी तो कैसे ? विदेश के किसी रचनाकार की किसी निकृष्ट रचना को अगर कोई अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार (बुकर आदि ) प्राप्त हो जाए  तो उस निकृष्ट रचना को भी श्रेष्ठ रचना के रूप में पढ़ने की प्रवृत्ति आज भी हममें मौजूद है । हमारे यहाँ अगर किसी सवर्ण की रचना में कुछ अश्लील शब्दों का प्रयोग हो, तो वह जायज है और अगर दलित की रचना में ऐसे शब्द अनायास आ जाएँ, तो अश्लील ! यहाँ निरन्तर दोहरे मानदंडों का प्रयोग किया जाता है । इसी कारण पूरी निष्ठा के साथ हमारे बीच जीने वाले किसी व्यक्ति या समूह के जीवन को पूरी सच्चाई के साथ जब कोई दलित लेखक सशक्त ढंग से व्यक्त करता है, तो भी उसे नकार दिया जाता है  । उस पर बहस भी नहीं की जाती  ।  इस मानसिकता को क्या कहें ?
इस देश में आज भी ज्यादात्तर ऐसे समीक्षक है जो अपनी भाषा में लिखी रचनाओं को लेखक की जाति को ध्यान में रखकर ही परखते  हैं । सामान्य पाठक तो रचना की गुणवत्ता को ही प्रमाण मानकर उसे स्वीकारता अथवा नकारता है । परन्तु जो समीक्षक, परीक्षक निर्णायक हैं अथवा जो तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, वे अभी तक जातिवादी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाए हैं  । प्रादेशिक अथवा राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देनेवाली अथवा पहचान बनानेवाली जितनी भी इकाइयाँ या प्रसार माध्यम हैं, क्या वे व्यक्ति अथवा रचना की ओर प्रदेश, भाषा, जाति, धर्म के परे जाकर देख रहे हैं -आज यही यक्ष प्रश्न हमारे सामने है  जिसे आपके समक्ष पुस्तक 'दलित चेतना की पहचान' के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है 

सम्पादक के सन्दर्भ में.......
डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे का जन्म सन 1942 में हुआ । इनकी प्रकाशित कृतियाँ में,  'कहानीकार कमलेश्वर : सन्दर्भ और प्रकृति', 'आधुनिक मराठी साहित्य का प्रवृत्तिमूलक इतिहास', 'देश-विभाजन और हिन्दी कथा साहित्य', 'डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर (जीवनी)', 'जीवनीपरक साहित्य', 'उन्नीसवीं सदी और हिन्दी साहित्य', 'बीसवीं सदी और हिन्दी साहित्य',  'अनुवाद का समाजशास्त्र', 'दलित साहित्य : संवेदना और स्वरूप', 'पत्रकार : डॉ.भीमराव आम्बेडकर', 'आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास', आदि पुस्तकों के लेखक हैं 

Monday, 6 August 2012

'वाक्' नए विमर्शों का त्रैमासिक






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   'वाक्' नए विमर्शों का त्रैमासिक 

सम्पादक-
 सुधीश पचौरी 

संपादन सहयोग -उमा शंकर चौधरी
प्रबंध संपादक -अरुण माहेश्वरी 



'वाक्'के सन्दर्भ में...
हिन्दी के विराट जनक्षेत्र में नयी सदी की बेचैनियाँ और आकांक्षाएँ जोर मार रही हैं। हिन्दी के नये पाठक को अब शुद्ध ‘साहित्यवाद’ नहीं भाता। वह समाज को उसके समग्र में समझने को बेताब है। साहित्य के राजनीतिक पहलू ही नहीं, उसके समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को पढ़ना नये पाठक की नयी माँग है। वह इकहरे अनुशासनों  के अध्ययनों से ऊब चला है और अन्तरानुशासनिक (इंटरडिसिप्लिनरी) अध्ययनों की ओर मुड़ रहा है जहाँ नये-नये विमर्श, उनके नये रंग-रेशे  एक-दूसरे में घुलते-मिलते हैं। नयी सदी का पाठक ग्लोबलमाइंड का है और भूमंडलीकरण, उदारतावाद, तकनीक, मीडिया, उपभोक्ता, मानवाधिकारवाद, पर्यावरणवाद, स्त्रीत्ववाद, दलितवाद उत्तर-आधुनिक विमर्श, उत्तर-संरचनावादी, चिन्ह, शास्त्रीय विमर्श  इत्यादि तथा उनके नये-नये सन्दर्भों, उपयोगों को पढ़ना- समझना चाहता है। थियरीज के इसी ‘हाइपर रीयल’ में उसे पढ़ना होता है। साहित्य भी इस प्रक्रिया में बदल रहा है। पाठक भी। ‘वाक्’ इन तमाम नित नए विमर्शों  से अपने नये पाठक को लैस करने का प्रयत्न है। ‘वाक्’ हिन्दी में पहली बार ‘परिसर रचना’ की अवधारणा प्रस्तुत कर रहा है।


सम्पादक- सुधीश पचौरी के सन्दर्भ में...

मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखंडन और विखंडन में 'कामायनी'), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित, हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा 'साहित्यकार' का सम्मान आदि सम्मानों से पुरस्कृत मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी का जन्म उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी) आगरा विश्वविद्यालय से तथा पीएच.डी.एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय से पूर्ण की । इनकी कुछ चर्चित पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं, मीडिया की परख, पॉपूलर कल्चर, भूमंडलीकरण, बाज़ार और हिन्दी,टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार, उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श, बिंदास बाबू की डायरी, फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति,हिंदुत्व और उत्तर-आधुनिकता, विभक्ति और विखंडन, निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद, जनतन्त्र और आतंकवाद, इत्यादि । वर्तमान में यह दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली में 'डीन ऑफ़ कॉलेजिज' हैं 



सम्पादकीय सम्पर्क


वाणी प्रकाशन 21 -ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110001

'वाक्' 
नए विमर्शों का त्रैमासिक
मूल्य : एक अंक 75/-रुपये
व्यक्तिगत वार्षिक शुल्क : 400 रुपये ( चार अंक) डाक व्यय सहित 
संस्थाओं के लिए वार्षिक शुल्क : 600 रुपये
संस्थाओं के लिए एक अंक : 100 रुपये
विदेश में प्रति अंक मूल्य : 10 डॉलर या समक्ष कोई भी मुद्रा (डाक व्यय अतिरिक्त)
नोट : मनीआर्डर/बैंक ड्राफ्ट 'वाक्' नयी दिल्ली के नाम भेजें । 

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