Saturday, 28 July 2012

'अभेद आकाश'


'अभेद आकाश' 
मणि कौल से उदयन वाजपेयी की बातचीत 

'अभेद आकाश' मणि कौल और उदयन वाजपयी के बीच वर्षों से चल रहे संवाद का फल है । यह पुस्तक बड़े ही पारम्परिक अर्थ में गुरु शिष्य संवाद है । गुरु शिष्य संवाद ही हमारे देश में सुदीर्घ परम्परा रही है । शिष्य गुरु के सामने प्रश्न करता है, गुरु शिष्य के स्वभाव के अनुकूल उसका उत्तर देता है । यह संवाद गूढ़ कहे जा सकते हैं । क्योंकि इसके सहारे गुरु शिष्य के स्वभाव को उदयन वाजपेयी ने खोलने का प्रयास किया है । 'अभेद आकाश' में उदयन वाजपेयी वाजपेयी कहते हैं कि "पुस्तक में अधिकांश प्रश्न मेरी स्वयं और जगत को, गुरु और ब्रह्माण्ड को जानने की आकांक्षा से उत्पन्न हुए हैं । मणि ने भी उनके उत्तर इस तरह दिए हैं कि मैं अपने प्रश्नों के भीतर सार्वभौमिक जिज्ञासा का आयाम अनुभव कर सकूँ ।" पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है अभेद आकाश।    

Book : Abhed Aakash 
Author :  Udayan Vajpeyi & Mani Kaul
Price : `195(HB)
ISBN : 978-93-5072-302-9

Total Pages : 112
Size (Inches) : 6.50X8.05

Category  : Cinema

पुस्तक के सन्दर्भ में उदयन वाजपेयी के विचार..... 
मणि कौल अपनी हर कृति में सृजन के अनोखे मार्ग खोजते हैं। अपने इन अन्वेषणों पर वे उतने ही निराले ढंग से बात भी करते हैं। अगर आप उन्हें ध्यान से सुनें तो उनकी बातों में उनकी दुर्बोध कही जाने वाली फिल्मों को समझने के सूत्रा मिल जाया करते हैं। उनकी फिल्मों को दुर्बोध कहने का शायद यह आशय है कि उनकी फिल्मों में ऐसा कुछ पाया जाता है जो ग्रहण करना आसान नहीं जान पड़ता। फिल्मों को जिन तरीकों से  देखने की हमारी आदत बन गयी है, मणि की फिल्में देखते समय ये तरीके कारगर सिद्ध नहीं हो पाते। शायद ये फिल्में हमसे फिल्में देखने के नये ढंग की अपेक्षा रखती हैं और मेरा अनुभव है कि अगर हम थोड़े धीरज से उनकी फिल्में  देखें तो ये फिल्में हमें देखने के नये तरीके खुद ही प्रदान करती हैं। दुर्बोध होना कला के लिए नया नहीं है। दुर्बोध कलाकृतियों की एक समृद्ध परम्परा है । हिन्दी के पाठकों में आज बेहद लोकप्रिय कवि निराला को भी दुर्बोध माना जाता था। निराला की जटिल कविताओं को तोड़ मरोड़ कर सरल बनाकर प्रस्तुत करना हिन्दी साहित्य का सबसे प्रिय व्यापार रहा है। हास्यास्पद यह है कि यह व्यापार खुद निराला के समय में भी प्रर्याप्त प्रचलित था।
निराला अपनी कविताओं के दुर्बोध होने को जानते थे और उसके कुपाठ से विचलित भी होते थे इसिलए वे समय-समय पर लिखे अपने पत्रों में स्वयं अपनी कविताओं की समझ के मार्ग खोला करते थे । यह कितना ही करुण क्यों न जान पड़े लेकिन उन पत्रों के बिना निराला को समझना शायद असम्भव है। मणि कौल से यह बातचीत भी उनकी दुर्बोध फिल्मों और दर्शकों के बीच सृजनात्मक सेतु बनाने के उद्देश्य से की गयी है। ज़ाहिर है कि यह किताब उनके लिए है जो फिल्में देखते हैं और उनसे अनुभव की अपेक्षा रखते हैं, नहीं और जिन्हें हॉल से बाहर आने के पहले ही ‘अच्छी है’ या ‘बुरी है’ जैसी बातें आत्म-सन्तोष प्रदान नहीं कर पातीं। इस किताब के पीछे मणि से सालों से चलते अपने संवाद को स्वयं अपने लिए एक बार फिर उपलब्ध कर लेना भी एक कारण रहा है। मेरे जीवन में इस संवाद का ऐसा अनन्य स्थान रहा है जिसे याद करने तक से मुझे सुख होता है। मैं भोपाल में हफ्तों मणि के आने की प्रतीक्षा करता था, आज भी करता हूँ। उनसे बात करना इस बात का सुन्दर उदाहरण है कि जैसे एक कलाकार बात करते समय तक दूसरों को उनके सत्य के करीब छोड़ आता है। ये बातचीत अक्टूबर 1991 में बम्बई में मणि के घर पर ही पाँच या छह हिस्सों में सम्पन्न हुई थी।
उन दिनों मणि ललिता जी (ललिता कृष्ण) के साथ ईडियट का सम्पादन कर रहे थे। टेपरिकार्डर लेकर उनसे बात करना थोड़ा अटपटा जान पड़ता था। लेकिन अनेक मानवेतर वस्तुओं की तरह जल्द ही टेपरिकार्डर अपनी मौजूदगी को छिपा लेता और मणि सहजता से अपने लगावों, विचारों और स्मृतियों में डूब जाते। संगीत, चित्राकला, साहित्य, दर्शन, उनकी बातों में निरन्तर आते रहते हैं। इन सभी पर मणि रसिक ही नहीं, रसज्ञ की तरह विचार करते हैं। सिर्फ विचार के स्तर पर नहीं, उनके कृतित्व में भी अन्य कलाओं से चल रहे संवाद को अनुभव किया जा सकता है। यहाँ फ़िल्म अपना स्थान तमाम पारम्परिक और आधुनिक कलाओं की बिरादरी में बनाती है।  मणि की फिल्में कहीं शास्त्रीय संगीत से, कहीं साहित्य से, कहीं अन्य फिल्मों से, कहीं चित्राकला से संवाद करती चलती हैं। इन अनेक स्तरीय संवादों के सहारे ही वे चुपचाप अपनी परम्परा को टटोलती बल्कि जाग्रत करती हैं। हमें उम्मीद है कि यह किताब मणि की फिल्मों की इन गूढ़ फुसफुसाहटों को समझने में मदद देगी। 
अभेद आकाश मणि की फिल्मों के शायद बुनियादी तत्वों में से एक है। उनकी फिल्मों  और, जैसा कि आप लक्ष्य करेंगे, उनकी बातें स्पेस (आकाश) को विभाजित रूप में नहीं बरतती। उनकी फिल्मों के लिए आकाश का ‘अच्छे-बुरे’ या ‘पवित्रा-अपवित्रा’ में विभाजन झूठ है, मानवीय धारणाओं का स्पेस पर प्रक्षेपण है। इसलिए इन फिल्मों में इस मिथ्या विभाजन का अस्वीकार है। यहीं से ये फिल्मों हर उस व्यक्ति के लिए दुर्बोध होना शुरू हो जाती हैं जिसके लिए वनस्पतियाँ तक नैतिक और अनैतिक के दो कठघरों में कैद हैं और इसलिए जिसका अपने ‘होने’ का अनुभव तक अपने ही बनाये आवरणों के पीछे विलुप्त हो गया है।



मणि कौल
 के सन्दर्भ में...

मणि कौल देश के श्रेष्ठ फिल्मकारों में रहे हैं। उनकी फिल्मों और फिल्म दृष्टि ने भारत के अनेक सृजनशील फिल्मकारों को नयी दिशा दी है। उनका बचपन राजस्थान के कुछ शहरों में बीता। उन्होंने पुणे के भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान में अध्ययन किया। अपनी पहली ही फिल्म ‘उसकी रोटी’ से वे फिल्म दर्शकों और आलोचकों की दृष्टि में गहरे तक पैठ गये। यह पैठ आज तक कायम है। उनकी कुछ और फिल्में हैं: 
आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी, माटी मानस, सिद्धेश्वरी, अहमक (ईडियट),  कश्मीर थ्रू माई आईज़, बादल द्वार (क्लाउड डोर), लाइट एपेरेल, नौकर की कमीज़, और आई एम नो अदर आदि। इनके अलावा भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण छोटी फिल्में बनाईं। उनकी फिल्में दुनिया के सभी जाने माने फिल्म समारोह में ससम्मान दिखायी जाती रही हैं। मणि अद्वितीय धु्रपद गायक और गुरु थे। उन्होंने महान धु्रपद गुरु ज़िया मोहिउद्दीन डागर से वर्षों तक धु्रपद की शिक्षा ग्रहण की। वे वर्षों तक अपने अनेक देशी-विदेशी शिष्यों को धु्रपद की शिक्षा देते रहे। आज मणि के कई शिष्य ध्रुपद गायन कर रहे हैं। मणि कौल भारतीय कलाओं के सम्भवतः श्रेष्ठ समकालीन शास्त्राकार थे। उनके विचारों का कई लेखकों और कलाकारों के कृतित्व पर गहरा असर है। मणि का 6 जुलाई 2011 को कैंसर से जूझते हुए देहावसान हुआ।


उदयन वाजपेयी के सन्दर्भ में...

कवि, कथाकार, निबन्धकार और अनुवादक उदयन वाजपेयी मणि कौल के शिष्य हैं। 
उनके दो कविता संग्रह (‘कुछ वाक्य’ और ‘पागल गणितज्ञ की कविताएँ’), तीन कहानी संग्रह (‘सुदेशना’, ‘दूर देश की गन्ध’ और ‘सातवाँ बटन’), दो निबन्ध संग्रह (‘चरखे पर बढ़त’ और ‘पतझर के पाँव की मेंहदी’), आदिवासी परधान कला पर ‘जनगढ़ कलम’ आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।  इनकी कविताओं के ओड़िया, तमिल, बांग्ला, फ्रांसीसी, पोलिश, स्वीडिश आदि कई भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हैं। इनकी दो पुस्तकें ओड़िया अनुवाद में और एक फ्राँसीसी अनुवाद में प्रकाशित है।  कुमार शहानी की फिल्म ‘चार अध्याय’ और ‘विरह भरयो घर आँगन कोने’ के लिए लेखन किया है । भवभूति के नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ की रंग निर्देशक कावालम नारायण पणिक्कर के लिए हिन्दी में पुनर्रचना । कावालम नारायण पणिक्कर के रंगकर्म पर आधारित पुस्तक ‘थियेटर ऑफ रस’ का सम्पादन। इन दिनों साहित्य, कला और सभ्यता की पत्रिका ‘समास’ का सम्पादन कर रहे हैं

मीडिया रिपोर्ट 

जनसत्ता (अखबार), 23 सितम्बर 2012 (रविवारीय अंक) 
http://epaper.jansatta.com/58402/Jansatta.com/23-September-2012#page/6/2 

Wednesday, 25 July 2012

'वाक्' नए विमर्शों का त्रैमासिक (11वां अंक )


पाठकों के समक्ष वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका 'वाक्' नए विमर्शों का त्रैमासिक, (11वां अंक ) प्रस्तुत है 

सम्पादक- सुधीश पचौरी 
संपादन सहयोग -उमा शंकर चौधरी
प्रबंध संपादक -अरुण महेश्वरी 

इस अंक के अनुक्रम में...

आत्मकथा 
दाखिले की शर्त -श्यौराज सिंह बेचैन 

आलेख 
वर्णाश्रम व्यवस्था में स्त्री : देवी या दासी -नीलिमा पांडेय
संथाल 'हूल' : आजादी की पहली बड़ी लड़ाई -केदार प्रसाद मीणा
त्रिलोचन : नैसर्गिक को परम्परा बनाता सृजन -सुबोध शुक्ल 

कहानी 
तनहाइयाँ परिंदे की -विमल चन्द्र पांडेय 

कविताएँ

बोधिसत्व की कविताएँ 
निशांत की कविताएँ 
शंकरानंद की कविताएँ 

संवाद 
जगदीश मित्तल से शशिप्रकाश चौधरी की बातचीत 

आलेख  

आचार्य रामचंद्र शुक्ल और साहित्य का इतिहास दर्शन - जगदीश्वर चतुर्वेदी 
कंचन बड़ा कि काया : विजयदान देथा की कहानी 'दुविधा'- पल्लव 

पुस्तक विशेष 

वन से खुले और बंद अज्ञेय -प्रियदर्शन 

सम्पादकीय सम्पर्क
वाणी प्रकाशन 21 -ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110001

मूल्य : एक अंक 75/ रुपये

व्यक्तिगत वार्षिक शुल्क : 300 ( चार अंक)
(व्यक्तिगत अंक माँगने पर डाक व्यय 25 रुपये अतिरिक्त देना होगा)
संस्थाओं के लिए वार्षिक शुल्क : 600 रुपये
संस्थाओं के लिए एक अंक : 100 रुपये
विदेश में प्रति अंक मूल्य : 10 डॉलर या समक्ष कोई भी मुद्रा (डाक व्यय अतिरिक्त)
नोट : मनीआर्डर/बैंक ड्राफ्ट 'वाक्' नयी दिल्ली के नाम भेजें ।

Friday, 20 July 2012

भ्रष्टाचार और अन्ना आन्दोलन



Book :  Bhrashtachar Aur Anna Aandolan
Editor : Mahashveta Devi & Arun Kumar Tripathi
Publisher : Vani Prakashan

Price : `300(HB)
ISBN : 978-93-5072-245-9

Total Pages : 167
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Social Science
Publication Year : 2012


पुस्तक के सन्दर्भ में....
सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार से कैसे लड़ा जाए ? क्या उसे व्यवस्था के हाल पर छोड़ दिया जाए और यह माना जाए कि लोकतांत्रिक ताकतें और संस्थाएँ उससे एक दिन निपट लेंगी ? या आन्दोलन किया जाए ? आन्दोलन किसके नेतृत्व में चलाया जाए ? राजनीतिक दलों के नेतृत्व में या अराजनीतिक संगठनों के नेतृत्व में ? अगर वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष और दलित, पिछड़ी जातियों के नेतृव वाले दल आन्दोलन न करें तो क्या किया जाए ? क्या साम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी दलों के नेतृत्व में आन्दोलन का समर्थन किया जाए ? गैर-राजनीतिक संगठनों के आन्दोलन की सीमाएँ क्या हैं ? उन्हें कैसे बढ़ाया जाए या उन्हें दरकिनार कर दिया जाए ? क्या भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन को नवउदारवादियों का नाटक मानकर उपेक्षित कर दिया जाए ? या उनके भीतर पनप रही व्यवस्था विरोध की चिनगारी को और कैसे आगे बढ़ाया जाए ? क्या उसे एक नैतिक आन्दोलन का रूप दिया जाए या किसी संस्था का निर्माण कर सन्तुष्ट हो लिया जाए ? क्या इसे एकल मुद्दा आन्दोलन मानकर उससे सीमित सफलता की ही उपेक्षा की जाए ? और लोकतांत्रिक आन्दोलन का एक रूप माना जाए ? इन तमाम सवालों का जवाब सीधा नहीं है ।  न ही एकांगी जवाब है । पर इसका उत्तर निष्क्रियता तो कतई नहीं है ।  न ही इसका यह जवाब है कि अगर सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं होती तो इस तरह के आन्दोलनों का कोई मतलब नहीं है । इस अंक के संकलित तमाम लेखों के माध्यम से अन्ना आन्दोलन की रोशनी में भ्रष्टाचार की समस्या पर विचार किया है । वह नवउदारवाद में अंतनिर्हित है पर उसके उजागर होने से वह लांछित और कमजोर होता है ।  यह नवउदारवाद के पतन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं हो सकता पर उसकी एक वजह जरूर बन सकता है । 

पुस्तक के अनुक्रम
एक विधेयक से खत्म नहीं होगा भ्रष्टाचार- महाश्वेता देवी
एक आन्दोलन जो मैंने देखा- अमित सिंह
जनता के साथ तो आना ही होगा ! -अमित सिंह
अब तो सारा देश है अन्ना- सत्येन्द्र सिंह
अन्ना आन्दोलन से टूटते मिथक- अमरेश मिश्र
जन आकांक्षाएँ और कांग्रेस की बौखलाहट- प्रभात कुमार राय
नयी करवट और पुरानी राजनीति- राहुल देव
नागरिक समाज : आलतू-फालतू- पुष्पेश पन्त
माहौल बनाए रहिए- अरुण कुमार त्रिपाठी
जनता बनाम संसद की छद्म बहस -रवीन्द्र त्रिपाठी
आत्ममंथन की जरूरत- डॉ सुनीलम
नया जनादेश लेने का समय -कुलदीप नैयर
अन्ना चाहते हैं परिवर्तन -डॉ सुनीलम
अन्ना आन्दोलन का आगा-पीछा -एच.एल. दुसाध
कारपोरेट को बचाने वाली क्रान्ति-सत्येन्द्र सिंह
भ्रष्टाचार विरोध का प्रहसन -प्रेम सिंह
आसमान की ओर एक पत्थर - अनिल सिन्हा
उठाने होंगे अहम मुद्दे - मेधा पाटकर
अतिक्रन्तिकारी और अन्ना आन्दोलन -डी.आर. चौधरी
अन्ना आन्दोलन का भविष्य -डॉ . योगेन्द्र
भ्रष्टाचार का इलाज समता -डॉ. ए.के. अरुण
भारतीय राष्ट्र का सहोदर है भ्रष्टाचार - कृष्णकांत
विज्ञान जगत के भ्रष्टाचार - यादवेन्द्र पाण्डेय
घोटाले और राजनीति - सुनील
काली अर्थव्यवस्था और याराना पूँजीवाद :
नवउदारवाद के अन्तरंग दुष्फल - कमल नयन काबरा
काली अर्थव्यवस्था : दलदल में फँसा विकास - अरुण कुमार और अरुण कुमार त्रिपाठी
भारत और भ्रष्टाचार - सच्चिदानंद सिन्हा
नये बौद्धिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समूह की दरकार- किशन पटनायक


सम्पादकों के सन्दर्भ में.....

महाश्वेता देवी 
पद्मश्री, साहित्य अकादमी, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926, ढाका में हुआ । वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं । उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रमाणिकता के साथ उभारा है उन्होंने शोषण के विरुद्ध बार-बार आवाज़ बुलन्द की है । 

अरुण कुमार त्रिपाठी अरुण कुमार त्रिपाठी का जन्म 9 अक्टूबर, 1961 बस्ती (उत्तर प्रदेश) के एक किसान परिवार में हुआ लखनऊ विश्वविद्यालय से एल-एल.एम. की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मानवाधिकार, दलित, स्त्री, पर्यावरण और आदिवासी आन्दोलनों से गहरा नाता । 'जनसत्ता' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक दशक तक पत्रकारिता करने के बाद 'हिन्दुस्तान' अखबार में संयुक्त सम्पादक और 'आज समाज' में सम्पादक (विकास) रहे । आजकल स्वतन्त्र लेखन में कार्यरत । वाणी प्रकाशन की 'आज के प्रश्न' श्रृंखला में नियमित लेखन । प्रकाशित कृतियाँ -'कल्याण सिंह', 'मेधा पाटकर' और 'कट्टरता के दौर में'

Thursday, 19 July 2012

वर्तिका



वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, हिन्दी तैमासिक पत्रिका 'वर्तिका' (विकल्प विमर्श-5), 'भ्रष्टाचार और अन्ना आन्दोलन' पर केन्द्रित है । 

सम्पादक- महाश्वेता देवी और अरुण कुमार त्रिपाठी 

इस अंक के अनुक्रम में पढ़े....
एक विधेयक से खत्म नहीं होगा भ्रष्टाचार- महाश्वेता देवी
एक आन्दोलन जो मैंने देखा- अमित सिंह
जनता के साथ तो आना ही होगा ! -अमित सिंह
अब तो सारा देश है अन्ना- सत्येन्द्र सिंह
अन्ना आन्दोलन से टूटते मिथक- अमरेश मिश्र
जन आकांक्षाएँ और कांग्रेस की बौखलाहट- प्रभात कुमार राय
नयी करवट और पुरानी राजनीति- राहुल देव
नागरिक समाज : आलतू-फालतू- पुष्पेश पन्त
माहौल बनाए रहिए- अरुण कुमार त्रिपाठी
जनता बनाम संसद की छद्म बहस -रवीन्द्र त्रिपाठी
आत्ममंथन की जरूरत- डॉ सुनीलम
नया जनादेश लेने का समय -कुलदीप नैयर
अन्ना चाहते हैं परिवर्तन -डॉ सुनीलम
अन्ना आन्दोलन का आगा-पीछा -एच.एल. दुसाध
कारपोरेट को बचाने वाली क्रान्ति-सत्येन्द्र सिंह
भ्रष्टाचार विरोध का प्रहसन -प्रेम सिंह
आसमान की ओर एक पत्थर - अनिल सिन्हा
उठाने होंगे अहम मुद्दे - मेधा पाटकर
अतिक्रन्तिकारी और अन्ना आन्दोलन -डी.आर. चौधरी
अन्ना आन्दोलन का भविष्य -डॉ . योगेन्द्र
भ्रष्टाचार का इलाज समता -डॉ. ए.के. अरुण
भारतीय राष्ट्र का सहोदर है भ्रष्टाचार - कृष्णकांत
विज्ञान जगत के भ्रष्टाचार - यादवेन्द्र पाण्डेय
घोटाले और राजनीति - सुनील
काली अर्थव्यवस्था और याराना पूँजीवाद :
नवउदारवाद के अन्तरंग दुष्फल - कमल नयन काबरा
काली अर्थव्यवस्था : दलदल में फँसा विकास - अरुण कुमार और अरुण कुमार त्रिपाठी
भारत और भ्रष्टाचार - सच्चिदानंद सिन्हा
नये बौद्धिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समूह की दरकार- किशन पटनायक

सम्पादकीय सम्पर्क
वाणी प्रकाशन 21 -ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110001

मूल्य : एक अंक 60/ रुपये
व्यक्तिगत वार्षिक शुल्क : 240 ( चार अंक)
(व्यक्तिगत अंक माँगने पर डाक व्यय 25 रुपये अतिरिक्त देना होगा)
संस्थाओं के लिए वार्षिक शुल्क : 400 रुपये
संस्थाओं के लिए एक अंक : 100 रुपये
नोट : मनीआर्डर/बैंक ड्राफ्ट 'वाणी प्रकाशन' नयी दिल्ली के नाम भेजें 

कोई अच्छा सा लड़का




विक्रम सेठ का बहुचर्चित अंग्रेज़ी उपन्यास, कॉमनवैल्थ पुरस्कार से सम्मानित, 'ए सूटेबल ब्वॉय' का हिन्दी अनुवाद 'कोई अच्छा सा लड़का' अनुवाद के सन्दर्भ में विक्रम सेठ कहते हैं कि 'उपन्यास में घटित अधिकांश घटनाएँ हमारे देश के हिन्दीभाषी क्षेत्र से सम्बन्धित हैं। एक तरह अनुवादक ने यहाँ उन्हें मौलिक चरित्र प्रदान किया है । संवाद का एक बड़ा हिस्सा यहाँ उस भाषा में पुननिर्मित किया गया है, जो मेरे कानों में बजती रही है । बहुत-सी राजनीतिक बहसें, जिन्हें मैंने विधायिकाओं में दिए गए भाषणों के अध्ययन द्वारा प्राप्त किया था, यहाँ हिन्दी में ज्यादा प्रमाणिक प्रतीत होंगी । कविताएँ, जिन्हें मैंने हिन्दी-उर्दू से अंग्रेज़ी में रूपांतरित किया था, अब कहीं ज्यादा समृद्ध स्वर में अपना आशय व्यक्त कर सकेंगी । एक लेखक के रूप में यह स्वीकार करते हुए मुझे थोड़ा अचरच भी हो रहा है कि कुछ चीज़ें इस हिन्दी अनुवाद में मेरी मूल कृति की बनिस्बत कहीं ज्यादा मजबूती से सामने आनेवाली हैं।' प्रस्तुत हैं 'कोई अच्छा सा लड़का'


Book :  Koi Accha Sa Ladka
Author :  Vikram Seth
Translator  :   Gopal Gandhi
Editor : Ramkumar Krishak
Price : 
`995(HB)
ISBN : 81-7055-587-6

Total Pages : 1271
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में.......
विक्रम सेठ का दुनिया-भर में  चर्चित यह उपन्यास लता नामक एक लड़की के लिए उसकी माँ श्रीमती रूपा मेहरा द्वारा कोई अच्छा-सा लड़का ढूँढने की कोशिशों की अद्भूत कहानी है । साथ ही यह कहानी उस भारत की भी है, जो नया-नया स्वाधीन हुआ था और एक भयानक संकट-काल से जूझ रहा था । एक ऐसे काल से जब जमींदारों के भाग्य का सितारा डूब रहा था, संगीतकारों और दरबारियों को संरक्षण नहीं मिल रहा था, देहातों में अकाल के हालात पैदा होनेवाले थे और जब पहले आम चुनाव से राजनीतिक ताकतों का ढाँचा बदलने वाला था । इस उपन्यास के केंद्र में चार बड़े और विस्तृत परिवार हैं, मेहरा परिवार (खासकर लता और उसकी माँ), कपूर परिवार (जिसमें एक शक्तिशाली स्थानीय नेता और उसका आकर्षक, किन्तु लम्पट पुत्र शामिल है । यह पुत्र अत्यन्त मोहक गायिका सईदाबाई फिरोज़ाबादी के इश्क़ में मुब्तिला होता है ), चटर्जी परिवार (कलकत्ता उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश श्री चटर्जी से लेकर उनके कवि पुत्र और चंचल पुत्रियों तक) और ख़ान परिवार (वह नवाबी ख़ानदान, जिसे सम्पत्ति के हाथ से निकल जाने का ख़तरा है)।  प्रेम और महत्त्वाकांक्षा, हर्ष और शोक, पूर्वग्रह और सामंजस्य, सवेंदनशील सामाजिक आचरण और भयंकर साम्प्रदायिक हिंसा को वर्णित-व्याख्यायित करता हुआ यह उपन्यास किसी विशाल मेले-सरीखा है। संक्षेप में कहें तो यह एक ऐसी उत्कृष्ट और आधुनिक कथाकृति है, जो हमें उन्नीसवीं सदी में लिखे गए क्लासिकी उपन्यासों की याद दिलाती है और अपने कथा-समय की परीक्षा में निश्चय ही खरी उतरनेवाली है

लेखक के सन्दर्भ में.....
विक्रम सेठ का जन्म कलकत्ता(भारत) में 20 जून 1952 को हुआ । इनकी शिक्षा ऑक्सफर्ड, स्टैनफर्ड और नॉनजिंग विश्वविद्यालयों में हुई । आर्थिक जनसांख्यिकी में शोध के लिए दो वर्ष चीन में रहे । अंग्रेज़ी में इनकी पाँच काव्य-कृतियाँ ( जिनमें 'ऑल यू हू स्लीप टुनाईट', 'बीस्टली टेल्स फ्रॉम हिअर एंड देअर' और 'थ्री चाइनीज़ पोयट्स' अनुवाद सम्मिलित हैं  

Monday, 9 July 2012

वाणी प्रकाशन समाचार, जुलाई 2012























प्यारी ऑन्ना



प्यारी ऑन्ना
(कोस्तोलान्यी दैश्ज़ो के मूल हंगारी उपन्यास 'एदैशा
ऑन्ना' का अनुवाद) 

Book :  Pyaaree Anna (Hangarian Novel Edes Anna)
Author :  Kosztolanyi Dezso
Translator  :   Indu Mazaldan
Price : 
`375(HB)
ISBN : 978-93-5000-753-2
Total Pages : 204
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में......

ऑन्ना एदैश की कहानी एक मासूम लड़की के शोषण की कहानी है । कहानी की नायिका का पारिवारिक नाम एदैश है । वह एक ईमानदार, मेहनती और सीधी-सादी ग्रामीण लड़की है वह एक मध्यम वर्गीय परिवार में घरेलू नौकरी के लिए आती है, जो परिवार प्रथम विश्व युद्ध में हार और सामाजिक क्रान्ति वाले ऐतिहासिक घचकों से अभी बहार निकला है । तीसरा बड़ा धक्का, हंगरी के दो तिहाई भाग को, ट्रायनौन की सन्धि के अन्तर्गत दूसरे देशों में बाँट दिया जाना, अभी बाकी है । हंगरी प्रथम विश्व युद्ध में, ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य के भाग की तरह उतरा था । इस साम्राज्य की हार के बाद सभी छोटे-छोटे देश आज़ादी की मांग करने लगे थे । पहली क्रान्ति अक्टूबर 1918 में हुई थी, जिसके बाद काउंट मिहाय कारोय की सोशलिस्ट सरकार बनी, जिसने हंगरी को गणतन्त्र घोषित कर दिया पर बाहरी दबाव काफी था ।  रोमानियन फ़ौजें हंगरी में घुसने का प्रयास करने लगीं और 1919 मार्च में कारोय का स्थान बेंला कुन ने ले लिया,जो एक बोल्शविक था और जिसे रूसी सरकार का समर्थन था ।  उसके घोर अत्याचार से लाल आतंक चारों ओर छाया हुआ था ।  ज़मीन लोगों से ज़बरदस्ती ज़ब्त किये जाने लगी थी ।  अगस्त 1919 तक इसका भी अन्त हो गया और रोमानियन फ़ौजें  आखिर हंगरी में प्रवेश कर ही गयीं । प्रस्तुत उपन्यास बेला कुन के पलायन से आरम्भ होता है और रोमानियन फ़ौजों का देश में आगमन दिखता है । उपन्यास का अन्त ट्रायनॉन सन्धि से थोड़ा ही पहले होता है जब कोस्तोलान्यी दैश्ज़ों का स्वयं का जन्म-स्थान भी युगोस्लाविया के पास चला गया था । परन्तु उपन्यास इन सब राजनीतिक घटनाओं के बारे में नहीं है । ऐतिहासिक परिस्थितियों का ज़िक्र अवश्य है पर कहानी सामाजिक विडम्बनों पर आधारित है  एडमिरल होर्थी का बड़े बैण्ड बाजे के साथ बुदापैश्त में आने का केवल दृश्य मात्र है, होर्थी जो द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त के हंगरी की बागडोर सँभाले था और जिसने 'लाल आतंक' के जवाब में 'सफेद आतंक' को जन्म दिया था, उस दौर को यहाँ सिर्फ स्पर्श किया गया है  इन परिस्थियों के कारण लोगों की जो मन: स्थिति हो गयी थी, जो खालीपन और वहशीपन उनमें आ गया था  ।  इसकी झलक जरूर उपन्यास में दिखाई देती है।  अनुवाद में कुछ शब्द हंगरी भाषा में ही रहने दिये हैं । जैसे 'वरोश' का अर्थ शहर या डिस्ट्रिक होता है, 'ऊत' सड़क और 'ऊत्सा' गली को कहते हैं । 'करुत' का आशय रिंग रोड है । दो डिस्ट्रिक, जिनका ख़ास तौर पर ज़िक्र हुआ है, वे बुदा में हैं (दूना नदी बुदापैश्त को दो भागों में बाँटती है, पहाड़ी भाग बुदा है और समतल भाग पैश्त) पहला 'वार' यानी महल के आसपास का इलाका जहाँ अधिकतर ऑफिस भी हैं और दूसरा क्रिस्टीना डिस्ट्रिक जिसमें 'वेरमैज़ो' का मैदान भी है (शाब्दिक अर्थ 'खून का मैदान')  कहा जाता है  1795 में यहाँ जेकोबाइट क्रान्तिकारियों को गोली मार दी गयी थी
                                                           
लेखक के सन्दर्भ में.......
कोस्तोलान्यी दैश्ज़ो का जन्म 29 मार्च 1885 में सौबॉद्का नामक शहर में हुआ था
और यही से उन्होंने प्राथमिक और हाई स्कूल की पढ़ाई की बचपन से अकसर बीमार रहने वाले देश्ज़ों पर सबसे अधिक प्रभाव उनके दादा का पड़ा । 1848-49 स्वाधीनता संग्राम की कहानियाँ दैश्ज़ों ने अपने दादा से प्राप्त की । दैश्ज़ों प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे, जब वह 16 वर्ष के थे 'बुदापैश्त नौपलो' में इनकी पहली कविता छपी । सन 1903 में हंगारी की विख्यात 'न्यूगौत' पत्रिका से जुड़ गये । 1910 में 'एक गरीब बच्चे की शिकायतें' पुस्तक प्रकशित हुई जिसको इतनी अधिक सफलता मिली कि 1923  तक इसके छह संस्करण प्रकाशित हो चुके थे । इनकी प्रमुख कृतियों में 'ताश', 'मागिया', 'चेन चेन एस्तैर की चेन', 'चिराग', 'मेरा छोटा भाई', 'स्याही' और 'आकर्षक लोग', 'केन' , 'मोर' , 'बेकार डॉक्टर' ,'नीरो एक खूनी कवि' , 'चकोरी', 'सोने की पतंग' और 'प्यारी ऑन्ना सम्मिलित है । 3 नवम्बर 1936 में इनका देहान्त हो गया

अनुवादक के सन्दर्भ में.....
इन्दु मज़लदान माता सुन्दरी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय ) अंग्रेजी विभाग में रीडर हैं
। इन्होंने हंगारी भाषा और साहित्य का काफी अध्ययन किया है । इनकी सात पुस्तकें हंगारी से हिन्दी में प्रकाशित हो चुकी हैं । जिसमें 'प्रेम राग' (हंगारी प्रेम-कविता संकलन), 'वित्त-मन्त्री का नाश्ता' (हंगारी कहानी संग्रह), शान्दोर मारॉई का उपन्यास 'शमाएँ ख़ाक होने तक सुलगती हैं', आदि  । जनवरी 2010  में इंदु  मज़दान को हंगारी के सर्वश्रेष्ठ सिविलियन ऑनर 'प्रो. कुल्तुरा हुंगारिका' से हंगारी सरकार ने अलंकृत किया था

Saturday, 7 July 2012

प्रतिरोध की संस्कृति'




मानवीय समाज यूँ तो सामंजस्य पर टिका होता है किन्तु प्रतिरोध उसका एक महत्त्वपूर्ण वैयक्तिक एवं सामाजिक भाव होता है । दमित समूह, समुदाय  एवं संस्कृतियाँ अपने ऊपर सतत हो रहे दमन के विरुद्ध प्रतिरोध कर रही होती हैं । यह प्रतिरोध कई बार उनकी स्वत: स्फूर्ति अभिव्यक्ति होती है और कई बार स्त्रातजिक । लेकिन दोनों ही रूपों में ये प्रतिरोध का भाव उनके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक प्रारूपों में अभिव्यक्त हो रहे होते हैं । यह पुस्तक भारतीय समाज के विभिन्न अधीनस्थ एवं प्रताड़ित समूहों के प्रतिरोध का विवेचन करती है हालाँकि यह पिछले 10 -15  वर्षों  में  लेखक के लिखे लेखों का संग्रह है । इस पुस्तक में साहित्यिक कलारूपों में निहित प्रतिरोध के कई भावों की विवेचना की गयी है । इसमें अनके साहित्यिक मुद्दों एवं साहित्य से जुड़े विमर्शों को शामिल किया गया है । आशा के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है 'प्रतिरोध की संस्कृति'
Book : Pratirodh Ki Sanskriti
Author : Badri Narain

Publisher : Vani Prakashan
Price : `250(HB)  
ISBN : 978-93-5072-206-0
Total Pages : 104
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Social Studies

पुस्तक के सन्दर्भ बद्री नारायण के विचार......

1980 के बाद भारतीय समाज में व्यापक परिवर्तन हुए हैं । सोवियत रूस का पतन, नयी आर्थिक व्यवस्था के तहत बाजार का विस्तार, भूमण्डलीकारण की प्रक्रिया, कम्प्यूटर एवं कॉरपोरेट के अनन्त विस्तार आदि ने पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी एक नया समाज गढ़ने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है । मेट्रोपोल, शहर, कस्बा एवं सस्ते पाइरेटेड सी.डी. ने एक 'मेट्रोपोल पब्लिक संस्कृति' का विस्तार किया है ।बैलगाड़ी, ऊँट के साथ-साथ मेट्रो एवं लो-फ्लोर बसों से बनते भारत पर कोई मुग्ध हो सकता है पर इसने हमारे समाज में अमीरी-गरीबी, नगरीय एवं ग्रामीण, मेट्रोपोल एवं टाउन के फर्क को न केवल नए सन्दर्भों में पुन: रचित किया जा रहा है बल्कि इनके फर्क को अत्यन्त तीखा कर दिया है । किन्तु दुखद यह है कि यह फर्क साहित्य, सांस्कृतिक  विमर्श एवं राजनीति में न ठीक से रेखांकित किया जा रहा है और न ही इसके अहसास से उपजी रचनात्मकता एक वैकल्पिक प्रतिरोध को सृजित करने की दिशा में बढ़ पा रही है । सबसे चिन्ताजनक यह है कि सामाजिक परिवर्तन की राजनीति करने वाली शक्तियाँ बढ़ती गरीबी एवं सामाजिक अन्याय के विस्तृत होते अमानवीय संसार के खिलाफ कोई लोकप्रिय राजनीति विकसित नहीं कर पा रही हैं। एन. जी. ओ. नुमा राजनीति एवं वैचारिक विमर्श नये शक्ति केन्द्रों के  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एवं इस बढ़ती खाई को द्विध्रुवियाताओं के नकार, अन्त: संवादीपन की तलाश, प्रितिरोधविहीन अस्मिताओं का सामंजस्य जैसे पदों से भारत जैसे देश में अभिजात्य, कॉरपोरेट एवं धनिकों की संस्कृति एवं साहित्य में मानवीय चेहरा एवं संवादी स्वर खोजने की कोशिश कर रही है । ऐसी विचार. व्याख्या एवं राजनीति एक ही साथ कई जगहों पर भूमण्डलीकृत नागरिक चेतना के साथ-साथ फैनेटिक राष्ट्रवादी चेतना के रूप में भी अवतरित हो रही है ।  ये प्रक्रियाएँ केवल समाज, राजनीति एवं आर्थिक जगत में ही नहीं चल हैं बल्कि साहित्य एवं संस्कृति की दुनिया में भी हरेक स्तर पर शक्ति संरचनाओं के अनेक रूपों का सृजन कर रही हैं । भौगोलिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केन्द्रों की वासी ये शक्ति संरचनाएँ साहित्य एवं संस्कृति की दुनिया में 'पैट्रोंन' एवं 'पेट्रेनाइज्ड' के नये रूप  उत्पादित कर रही हैं । इन सबने मिलकर साहित्य एवं संस्कृति के विचार एवं व्याख्या की दुनिया में नये संकट पैदा किये हैं    



लेखक के संदर्भ में......
भारत भूषण पुरस्कार, बनारसी प्रसाद भोजपुर सम्मान एवं 'केदार' सम्मान, कविता संकलन, स्पन्दन कृति सम्मान, बिहार सरकार राजभाषा विभाग की ओर से राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान और कविता के लिए प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से सम्मानित  बद्री नारायण का जन्म 1965  भोजपुर (बिहार) में हुआ । यू.जी.सी., आई.सी. एस.एस. आर., आई.सी. एच. आर., इंडियन इंस्टीयूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला, इंटरनेशनल इंस्टीयूट ऑफ़ एशियन स्टडीज, लाइडेन यूनिवर्सिटी , द नीदरलैंड, मैसौन द साइंसेज द ला होम, पेरिस, फुलब्राइट एवं स्मट्स के फैलो रहे हैं । वर्तमान में यह गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के सेन्टर फॉर कल्चर, पॉवर एंड चेंज में सामाजिक इतिहास/ सांस्कृतिक नृतत्वशास्त्र विषय के प्रोफेसर हैं । गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के मानव विकास संग्रहालय एवं दलित रिसोर्स सेन्टर के प्रभारी हैं ।