Monday, 11 June 2012

क्याप


Book : Kyap
Author : Manohar Shyam Joshi 
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `200(HB)  
ISBN : 81-7055-799-2
Total Pages : 151
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Novel

पुस्तक के सन्दर्भ में पुरुषोत्तम अग्रवाल के विचार......
'क्याप' मायने कुछ अजीब, अनगढ़, अनदेखा सा और अप्रत्याशित। जोशी जी के विलक्षण गद्य में कही गई यह 'फसक' (गप) उस अनदेखे को अप्रत्याशित ढंग से दिखाती है, जिसे देखते रहने के आदि बन गए। हम जिसका मतलब पूछना और  बूझना भूल चले हैं...
अपने समाज की आधी अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से जानलेवा ढंग से टकराती प्रेम कथा की यह 'क्याप' बदलाव में सपनों की दारुण परिणति को कुछ ऐसे ढंग से पाठक तक पहुँचाती है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते रहने वाला पाठक एकाएक खुद से पूछ बैठे कि 'अरे ! ये पलकें क्यों भीग गईं । 
यथार्थ चित्रण के नाम पर सपाटे से सपाटबयानी और फार्मूलेबाजी करने वाले उपन्यासों/कहानियों से भरे इस वक्त में, कुछ लोगों को शायद लगे कि 'मैं' और उत्तरा के प्रेम की यह कहानी, और कुछ नहीं बस, 'खलल है दिमाग का' लेकिन प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक इस अद्भुत 'फसक' में अपने समय की डरावनी सच्चाइयों को ऐन अपने प्रेमानुभव  में एकतान होते सुन सकता है । बेहद आत्मीय और प्रमाणिक ढंग से । 
गहरे आत्ममंथन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से भरपूर 'क्याप' पर हिन्दी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है । 

लेखक के सन्दर्भ में...
भारतीय सोप ओपेरा के जनक मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को अजमेर (राजस्थान) में हुआ था । लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक हुए। वहीं से 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये थे । अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद इन्हें प्राप्त हुआ । प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फिल्म विज्ञापन- सम्प्रेषण सभी के लिए सफलता पूर्वक कार्य किया
केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन 1967 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने । टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतन्त्र  लेखन किया। इन्होंने हम लोग के अलावा 'बुनियाद', 'हमराही' ,'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' व 'जमीन-आसमान' जैसे चर्चित धारावाहिकों के साथ उन्होंने 'हे राम', 'पापा कहते हैं' ,'भ्रष्ट्राचार' आदि अनेक फिल्मों की भी पटकथाएँ लिखीं।  'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें वर्ष 2005  में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।  30  मार्च 2006 को उनका निधन हो गया ।