Saturday, 30 June 2012

जाने-माने इतिहासकार : कार्यविधि दिशा और उनके छल



'एमिनेन्ट हिस्टोरियन्स देयर टैक्नोलोजी, देयर लाइन, देयर फ्राड' का हिन्दी अनुवाद - जाने-माने इतिहासकार : कार्यविधि दिशा और उनके छल  
Book : Jaane-Maane Itihaaskar : Karyavidhi, Disha aur Unke Chhal
Author : Arun Shourie
Translator : Shamsher Singh
Publisher : Vani Prakashan
Price : `375(HB)  
ISBN : 81-7055-182-X
Total Pages : 264
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में अरुण शौरी के विचार......

जून-जुलाई 1998 में प्रगतिवादियों ने अच्छा-खासा बवंडर खड़ा किया । उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि सरकार ने भारतीय अनुसन्धान परिषद् में राममन्दिर समर्थक इतिहास भर दिए हैं । और जैसी कि उनकी आदत है, उन्होंने एक कपटजाल फैलाकर हलचल पैदा कर दी । इस हलचल ने मुझे उनकी कारगुजारियों की जाँच-पड़ताल करने और यह देखने के लिए मजबूर कर दिया कि उन्होंने भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् जैसी संस्था का क्या हाल कर डाला था । इसके लिए मैंने उनके द्वारा लिखी गयी पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन किया ।  इन बुद्धिजीवियों और इनके हिमायतियों ने एक शैतानी ढंग से हमारे धर्म की उलटी तस्वीर पेश की है ।  हमारे समन्वयवादी धर्म, हमारे लोगों, हमारे देश की बहुलवादी और आध्यात्मिक तलाश को इन्होंने असहिष्णु, संकीर्णमना  और दकियानूसी बताया है । दूसरी तरफ इस्लाम, इसाई धर्म और मार्क्सवाद-लेनिनवाद जैसे अपवर्जक, सर्वसत्तावादी धर्मों और विचारधाराओं को सहिष्णुता, उदारता, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक बताया है । 
यह उनका असली अपराध है ।ऐसे लोग गिनती के ही है, उदहारण के लिए अयोध्या विवाद के दौरान हर आये हफ्ते बाबरी मस्जिद कार्यवाई समिति के रुख के हक में एक प्रेस बयान छपता- एक हफ्ते 'प्रतिष्ठित इतिहासकारों' के नाम से, दूसरे हफ्ते 'लब्धप्रतिष्ठित  समाजविज्ञानियों' के हस्ताक्षरों' के नाम से । लेकिन हर बार होते सभी वही लोग, हमेशा वही चन्द गिने-चुने लोग, लेकिन नामों की संख्या 42 से ज्यादा नहीं । प्रगतिशील लोग जिस सिद्धान्त पर घमण्ड करते फिर रहे थे, वह दशकों पहले आधारहीन सिद्ध हो चुका है । उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि भारत की धरती शून्य पड़ी थी और उसकी शून्यता को भरा एक के बाद एक आने वाले हमलावरों ने । उन्होंने आज के भारत और उससे भी ज्यादा हिन्दू धर्म को एक चिड़ियाघर के रूप में पेश किया है, जिसमें भाँति-भाँति के एक-दूसरे के बिल्कुल अलग किस्म के प्राणी बसते हैं ।  उन्होंने हमारी प्राचीन संस्कृति का महत्त्व घटाकर, जो समन्यवादी तत्त्व जीवित रह पाए थे, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और उन्हीं को हमारी पूरी 'संस्कृति' सिद्ध किया है, जिसे वे 'मिली-जुली' संस्कृति कहते हैं। अब अगर उनका बाकी कुछ बचा रह गया है तो वह है सरकारी संस्थाओं पर उनका नियन्त्रण ।  जिस प्रकार की संस्थाओं की इस पुस्तक में चर्चा की गयी है, वैसी वर्तमान प्रतिष्ठित संस्थाओं पर इन लोगों के नियन्त्रण को कम कर दिया जाना चाहिए । इसके लिए बस इतना कुछ करना जरुरी है कि इन लोगों ने इन संस्थाओं का जो हाल कर डाला है, उसे लिखित रूप में लाया लाये । यह प्रयास पाठकों तक सहजता से पहुँचे यही इस पुस्तक की सफलता होगी । 

लेखक के सन्दर्भ में......
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, इनमें पद्म भूषण, मैग्सेसे दादाभाई नौरोजी, ऐस्टर पुरस्कार आदि से पुरस्कृत अरुण शौरी का जन्म 2 नवम्बर 1941 जालंधर में हुआ अमरीका के सिराक्यूस विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि ली ।  यह समकालीन तथा राजनीतिक मामलों पर भारत के एक जाने-माने टिप्पणीकार हैं, सम्यक विश्लेषण और गहन शोध उनके लेखन की विशेषताएँ हैं । यह विश्व बैंक में अर्थशास्त्री, योजना आयोग के सलाहकार और इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादक भी रह चुके हैं । इन्होंने अब तक 13 पुस्तकें लिखी हैं