Saturday, 30 June 2012

अनोखा पेड़



प्रस्तुत पुस्तक 'अनोखा पेड़' राजस्थानी भाषा में लिखित 'बातारी फुलवारी' के नौ भागों की चयनित अनुवादित कहानियाँ हैं । चयन में इस बात पर ध्यान दिया गया है कि पशु-पक्षी सम्बन्धी कथाएँ ही हों, जिससे   बालोपयोगी साहित्य में कुछ संवर्द्धन हो सके ।  राजस्थानी भाषा से यों हिन्दी में अनुवाद करने की प्रक्रिया सहज है किन्तु कथा में अनेक स्थल एवं वाक्य-विन्यास ऐसे भी आवश्यक लगे जिनके माध्यम से राजस्थानी वातावरण को बनाए रखना महत्त्वपूर्ण लगा । इस तरह की दो समस्याएँ थीं । एक समस्या का सम्बन्ध था लोक कथाओं के उन स्थलों से जहाँ पद्यांश का प्रयोग किया जाता है और दूसरी समस्या थी कुछ शब्दों की जो सामान्यतया हिन्दी पठन-पाठन में प्रचलित नहीं है । पद्यांश को अनुवादित करने पर उनकी आन्तरिक छन्दोमयता टूटती हुई दिखाई देती थी । अत: हमने तय किया कि राजस्थानी पद्यांशों को ज्यों का त्यों रखा जाए । इनके अनुवाद का प्रयोग हमने केवल उन स्थानों पर किया जहाँ हिन्दी अनुवाद से छन्दोमयता भंग नहीं होती थी । हिन्दी पाठकों की  सुविधा के लिए परिशिष्ट में पद्यांशों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ देने की आवश्यकता भी इसलिए बन गयी अनोखा पेड़ के पृष्ठ  संख्या 142  से " बेटी ने हंडिया औंधी करके माँ का कुंडा पूरा भर दिया । माँ तो गरम-गरम  ही खाने लगी सो देखते-देखते सारा मांस चट कर गयी । दूसरा कुंडा खाने लगी तो पालतू बिल्ली पास आकर कहने लगी : ''हाय रे हाय, माँ बेटी ने खाय, थोड़ी बोटियाँ म्हनै ई चखाय।" किसी भी शिक्षा प्रणाली का मापदंड यही है कि वह विद्यार्थी की मानसिक अवस्था के अनुकूल माध्यमों के द्वारा प्रकृति, जगत, समाज  और ज्ञान- विज्ञान की समस्याओं को धीरे-धीरे  समझाने में सफल हो सके । बालक के मानस की ऐसी सहज ज्ञान की सीमा में लोक कथाओं का माध्यम एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । बालक ज्यों ही भाषा को बोलने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, वह उसमें व्यवस्थित किसी घटना को कहने व सुनने में आनन्द ग्रहण करने लगता है । ये घटनाएँ चाहे उसके स्वयं के अनुभव द्वारा निसृत हुई हों, चाहे अन्य सामाजिक प्राणी के अनुभव से उत्पन्न हुई हों । यही कारण है कि विश्व के प्रत्येक देश में ही क्या, छोटे-से -छोटे सामाजिक संगठन के परिवार में लोक कथाओं को कहने एवं सुनने का क्रम एक विराट सत्य के रूप में मिल जाता है । लोक कथा वस्तुत: हमारे जीवन की सम्पूर्ण प्रक्रिया में श्वास/साँस  की तरह सहज बनी हुई है और इसलिए यह समझने में कुछ कोशिश रहती है की श्वास कि क्षीण एवं दुर्बलतम ध्वनि का ही परिणाम है कि हम जीवित हैं । हम दिन-रात पशु -पक्षियों को देखते हैं और वे कभी ऐसी बात नहीं करते जो कथाओं में कही गयी हैं । लेकिन इस सतही तत्व की गहराई में जाएँ  तो यही पता लगेगा कि कथा के रूप को अनुरंजक बनाने के लिए एक अयथार्थ को कौतूहलपूर्ण बनाकर, उसके माध्यम से जीवन के अनुभव के किसी सत्य की  स्थापना की गयी  है । लाखों-करोड़ों की संख्या में प्राप्त इन लोक कथाओं के मालिक बच्चे ही हैं और हम समाज की चिरन्तनता की दृष्टि  से इन बच्चों के सेवक हैं । यदि इस पीढ़ी की हम सेवा कर सकें तो निश्चय ही एक महत्वपूर्ण काम अदा कर सकेंगे

Book : Anokha Ped
Author : Vijaydan Detha
Publisher : Vani Prakashan
Price : `300(HB) 
ISBN : 978-93-5072-154-4
Total Pages : 152
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Collection of Short Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

लोक कथा वस्तुत: मौखिक साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है । इस दृष्टि से लोक कथा प्रामाणिक लेखन में राजस्थानी  भाषा का ही प्रयोग आवश्यक समझा गया है । कथा के कथन में राजस्थानी जन-समाज जिन शब्दों का प्रयोग अत्यन्त आत्मीय  एवं व्यंजनात्मक रूप से करता है, उन शब्दों के द्वारा कथा लेखन में भी गहराई आती है । अत: हिन्दी भाषा के आंचलिक प्रयोग के लिए भी स्थान को सुरक्षित रखा गया है । हमारा विश्वास है कि ऐसे राजस्थानी शब्दों के प्रयोग एवं प्रसार के द्वारा हिन्दी का शब्दकोश संवृद्ध होगा । इसी बात के साथ यह भी उल्लेख आवश्यक है कि यह सम्पूर्ण पुस्तक बालोपयोगी कथाओं का संग्रह है, अत: भाषा को अत्यन्त सरल बनाकर लिखने का प्रयास भी किया गया है । इन कथाओं के पठन-पाठन में यदि हिन्दी पाठकों को कठिनाई हो तो वे शब्दार्थ के द्वारा शब्द को समझने की कोशिश करें । बहुत कर शब्दार्थ देखने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि राजस्थानी शब्दों के उपयोग की स्थिति से भी अर्थ का संकेत मिल जायेगा


लेखक के सन्दर्भ में.....
राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्र में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है   पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से पुरस्कृत विजयदान देथा का जन्म 1 सितम्बर 1926, राजस्थान में हुआ । इन्हें इनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैं । देथा ने 800 से अधिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ में हो चुका है । उनकी कहानियों पर आधारित  तीन हिन्दी फिल्में -दुविधा, पहेली और परिणीता बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं ।