Friday, 8 June 2012

छांग्या रुक्ख



बलबीर माधोपुरी की पुस्तक 'छांग्या रुक्ख' पंजाबी भाषा की पहली दलित आत्मकथा है 'छांग्या रक्ख' पहली दलित आत्मकथा होने के कारण चर्चा का विषय भी बनी भारतीय साहित्य में यह पुस्तक दलित आत्मकथा का प्रतिमान स्थापित कर चुकी है । अत: इस आत्मकथा को तुलनात्मक तौर पर भारतीय भाषाओं में लिखी आत्मकथाओं के सन्दर्भ में देखा जाता है। 

Book : Chhangia Rukkh
Author: Balbir Madhopuri
Translator : Subhash Neerav
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `300(HB)  
ISBN : 81-8143-645-8
Total Pages : 231
Size (Inches) : 
5.50X8.75
Category  : Autobiography

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

बलबीर माधोपुरी की आत्मकथा जीवन अनुभवों का अद्भुत साहित्यिक रूपांतरण है। आत्मकथा में पूरी ईमानदारी, स्पष्टता और सहजता से स्थितियों को शब्दबद्ध किया गया है, वह एक दुर्लभ कार्य है । यहाँ लेखक से अधिक, स्थितियाँ बोलती हैं । ये स्थितियाँ सामाजिक हैं, साहित्यिक हैं, आर्थिक हैं और वैचारिक भी हैं । वर्ग संघर्ष द्वारा वर्णभेद का अंत कर देने या जाति प्रश्नों को गौण करने वाले वामपंथी साहित्य चिन्तन से भी माधोपुरी का वास्ता रहा है । सिक्खों में भी कैसे जातिप्रथा अघोषित रूप से अपना प्रभाव जमाए रखती है, इस दिशा में आत्मकथा नया रहस्योद्घाटन करती है। आत्मकथा यह भ्रम तो एकदम दूर कर देती है कि किसी देश-प्रदेश का आर्थिक विकास सब का विकास होता है। पुस्तक के माध्यम से स्पष्ट होता है कि पंजाब प्रांत में जिस अनुपात में कृषि-विकास हुआ, भूस्वामियों में समृद्धि आई और उसके ठीक उलट भूमिहीन पंजाबी दलितों में विपन्नता बढ़ी है । इन समस्याओं को साहित्यिक कृति में ढ़ाल कर जो कौशल आत्मकथाकार ने दिखाया है । वह किसी पाठक को गहरे तक अपील करता है ।  मुख्य शीर्षक से लेकर हर उप शीर्षक साहित्यिक है, प्रतीकात्मक है ।  इतना ही नहीं, लेखक ने 'छांग्या रुक्ख' में अपने शोषित और पीड़ित जीवन को पूरे साहित्यिक  मानदंडों के साथ व्यक्त कर, सांस्कृतिक धरातल पर उस भाव-बोध का भी अहसास कराया है, जिसे कबीर और नानक ने अपनी सखियों और पदों के जरिये सबसे इंसान की आत्मा के रूप में दर्शन किये थे । यह शत प्रतिशत कहा जा सकता है कि 'छांग्या रुक्ख' का साहित्य पंजाबी या हिन्दी साहित्य तक ही सीमित नहीं रहेगा ।

लेखक के सन्दर्भ में....
दलित चेतना और संवेदना के माध्यम से अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाने में बलबीर माधोपुरी का पंजाबी समकालीन साहित्य में अनुपम स्थान है । इनका जन्म सन 1955,  गाँव माधोपुर, जिला जालंधर (पंजाब) में हुआ । इन्होंने पंजाबी साहित्य अपनी विलक्षण शैली और पृथक रचना कौशल से पाठकों को न केवल अपनी ओर आकर्षित किया है बल्कि उनकी अनुभूतियों को गहरे तक छुआ है । इनकी सात मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । जिनमें दो काव्य संग्रह और पाँच गद्य संग्रह हैं । इन्होंने अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का पंजाबी अनुवाद और संपादन किया है ।