Monday, 11 June 2012

मीडियानगर 02



पब्लिक्स एण्ड प्रैक्टिसेज़ इन द हिस्ट्री ऑफ़ प्रेजेंट (पीपीएचपी) सराय-सीएसडीएस में शहर तथा नए और पुराने मीडिया पर आधारित एक शोध प्रोजेक्ट है यह शहर के समग्र संदर्भ में मीडिया के बदलते स्वरूप व अंदाज़े बयां को समझने की एक कोशिश है   इसके तहत फिल्म, सिनेमा, इंटरनेट, अखबार, मीडिया बाज़ार एवं मज़दूरी, केबल टेलीविजन नेटवर्क व इनसे सम्बन्धित कानूनी पहलुओं पर अधययन किया जाता है   इस कड़ी में आपके समक्ष 'मीडियानगर 02' प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की पुस्तक
 
Book : Medianagar 02 : Ubharata Manzar
Editor : Rakesh Kumar Singh
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `400(HB)  
ISBN : 81-8143-395-5
Total Pages : 272
Size (Inches) :
7X10
Category  : Media/Criticism

पुस्तक के संदर्भ में.....

नवें दशक के आरम्भ में हिन्दुस्तानी शहरों के ताने-बाने, बनावट और बुनावट के बदलावों से मुताल्लिक़ जिस सिलसिले का आगाज़ हुआ था- आज हम उसका एक चरण पूरा होते देख रहे हैं। शहरों को 'स्वस्थ','सुन्दर','स्तरीय','लुभाऊ', और 'कमाऊ' बनाने की जो आहटें पन्द्रह बरस पहले महसूस की जा रही थीं ।  आज हम उसकी दस्तक साफ-साफ सुन पा रहे हैं।   इस दरम्यान 'औपचारिक-अनौपचारिक', 'अधिकृत-अनधिकृत' तथा 'कानूनी-गैरकानूनी' जैसी अवधारणाएँ ज्यादा मुखर हुई हैं ।  नियोजन और प्रबन्धन के बीच नए सिरे से मीज़ान बिठाने की कोशिशें  हो रही हैं ।  लग रहा है जैसे सारी क़वायद शहरों के चरित्र को खाँटी अभिजात रंग देने के लिए की जा रही है । पिछले दशक में सूचना-क्रान्ति के बेहद दिलचस्प नतीजे उभर कर सामने आये हैं। डिजिटल तकनीकों ने आगमन के खासकर मीडिया उद्योग को बेहिसाब प्रभावित किया है। मीडिया एक ऐसा अनुभव होता है जो अलग-अलग तानों-बानों, स्थानों और रिवाजों से गठित होता है। भारत में मीडिया के क्षेत्र में दो चीजें साथ-साथ काम करती दिखती हैं ।  एक ओर जहाँ बड़े-बड़े कॉरपोरेट खिलाड़ियों का पदार्पण हुआ है वहीं दूसरी ओर नए किस्म के गतिशील नेटवर्क का भी उदय हुआ है ।  जिन्होंने मीडिया तक लोगों की पहुँच को सुलभ बनाया है ।  रिहायशी  इलाकों, छोटी-छोटी दुकानों, मीडिया बाज़ारों और आस-पड़ोस के मोहल्लों में सक्रिय ये नेटवर्क आज की हक़ीक़त हैं।  मॉल और मल्टीप्लेक्स तो खुल ही रहे हैं, पुराने सिनेमा भी खुद को मल्टीप्लेक्स में बदल डालने या जमीन के बेहतर व्यावसायिक इस्तेमाल की छटपटाहट में चक्कर लगा रहे हैं । सिनेमा को स्थानीय परिवेश गढ़ता है और इसकी सामाजिक विशिष्टता का अपना ही तर्क होता है ।  दर्शकों के साथ इस स्पेस का बड़ा तरल सम्बन्ध होता है।  जैसे-जैसे शहर, उसका यातायात नेटवर्क और उसकी गतिशीलता के रूप बदलते रहते हैं, वैसे-वैसे यह सम्बन्ध बदलता रहता है । मीडिया नेटवर्क पर नज़र डालने पर पता चलता है कि गैरकानूनी चीज़ों के नए दायरे राजनीतिक समाज में प्रचलित समावेश और प्रबन्धन की रणनीतियों पर दोबारा विचार करने की जरूरत को रेखांकित करते हैं। इस अव्यवस्था मूल में नकली उत्पादों की एक व्यापक संस्कृति है । पुस्तक इस पर व्यापक प्रकाश डालती है। पुस्तक, मीडिया शहर के विभिन्न रूपों की एक मिली-जुली बानगी । इनमें से कुछ अव्वल दर्जे के शोधपरक लेख हैं तो कुछ शोध की दुनिया के रंगरूटियों द्वारा चीजों को समझने की कोशिश ।


सम्पादक के सन्दर्भ में...
राकेश कुमार सिंह को स्थानीय मीडिया, बाज़ार श्रम और मीडिया उत्पादन प्रथाओं पर कार्य का अनुभव है। यह जन संचार और पत्रकारिता के प्रशिक्षिक हैं। इनके शोध में मीडिया और समकालीन शहरी सम्मिलित हैं । इन्होंने मीडियानगर 02 जोकि, सराय (सीएसडीएस) की पुस्तक है, संपादन किया है ।