Saturday, 30 June 2012

जाने-माने इतिहासकार : कार्यविधि दिशा और उनके छल



'एमिनेन्ट हिस्टोरियन्स देयर टैक्नोलोजी, देयर लाइन, देयर फ्राड' का हिन्दी अनुवाद - जाने-माने इतिहासकार : कार्यविधि दिशा और उनके छल  
Book : Jaane-Maane Itihaaskar : Karyavidhi, Disha aur Unke Chhal
Author : Arun Shourie
Translator : Shamsher Singh
Publisher : Vani Prakashan
Price : `375(HB)  
ISBN : 81-7055-182-X
Total Pages : 264
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में अरुण शौरी के विचार......

जून-जुलाई 1998 में प्रगतिवादियों ने अच्छा-खासा बवंडर खड़ा किया । उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि सरकार ने भारतीय अनुसन्धान परिषद् में राममन्दिर समर्थक इतिहास भर दिए हैं । और जैसी कि उनकी आदत है, उन्होंने एक कपटजाल फैलाकर हलचल पैदा कर दी । इस हलचल ने मुझे उनकी कारगुजारियों की जाँच-पड़ताल करने और यह देखने के लिए मजबूर कर दिया कि उन्होंने भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् जैसी संस्था का क्या हाल कर डाला था । इसके लिए मैंने उनके द्वारा लिखी गयी पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन किया ।  इन बुद्धिजीवियों और इनके हिमायतियों ने एक शैतानी ढंग से हमारे धर्म की उलटी तस्वीर पेश की है ।  हमारे समन्वयवादी धर्म, हमारे लोगों, हमारे देश की बहुलवादी और आध्यात्मिक तलाश को इन्होंने असहिष्णु, संकीर्णमना  और दकियानूसी बताया है । दूसरी तरफ इस्लाम, इसाई धर्म और मार्क्सवाद-लेनिनवाद जैसे अपवर्जक, सर्वसत्तावादी धर्मों और विचारधाराओं को सहिष्णुता, उदारता, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक बताया है । 
यह उनका असली अपराध है ।ऐसे लोग गिनती के ही है, उदहारण के लिए अयोध्या विवाद के दौरान हर आये हफ्ते बाबरी मस्जिद कार्यवाई समिति के रुख के हक में एक प्रेस बयान छपता- एक हफ्ते 'प्रतिष्ठित इतिहासकारों' के नाम से, दूसरे हफ्ते 'लब्धप्रतिष्ठित  समाजविज्ञानियों' के हस्ताक्षरों' के नाम से । लेकिन हर बार होते सभी वही लोग, हमेशा वही चन्द गिने-चुने लोग, लेकिन नामों की संख्या 42 से ज्यादा नहीं । प्रगतिशील लोग जिस सिद्धान्त पर घमण्ड करते फिर रहे थे, वह दशकों पहले आधारहीन सिद्ध हो चुका है । उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि भारत की धरती शून्य पड़ी थी और उसकी शून्यता को भरा एक के बाद एक आने वाले हमलावरों ने । उन्होंने आज के भारत और उससे भी ज्यादा हिन्दू धर्म को एक चिड़ियाघर के रूप में पेश किया है, जिसमें भाँति-भाँति के एक-दूसरे के बिल्कुल अलग किस्म के प्राणी बसते हैं ।  उन्होंने हमारी प्राचीन संस्कृति का महत्त्व घटाकर, जो समन्यवादी तत्त्व जीवित रह पाए थे, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और उन्हीं को हमारी पूरी 'संस्कृति' सिद्ध किया है, जिसे वे 'मिली-जुली' संस्कृति कहते हैं। अब अगर उनका बाकी कुछ बचा रह गया है तो वह है सरकारी संस्थाओं पर उनका नियन्त्रण ।  जिस प्रकार की संस्थाओं की इस पुस्तक में चर्चा की गयी है, वैसी वर्तमान प्रतिष्ठित संस्थाओं पर इन लोगों के नियन्त्रण को कम कर दिया जाना चाहिए । इसके लिए बस इतना कुछ करना जरुरी है कि इन लोगों ने इन संस्थाओं का जो हाल कर डाला है, उसे लिखित रूप में लाया लाये । यह प्रयास पाठकों तक सहजता से पहुँचे यही इस पुस्तक की सफलता होगी । 

लेखक के सन्दर्भ में......
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, इनमें पद्म भूषण, मैग्सेसे दादाभाई नौरोजी, ऐस्टर पुरस्कार आदि से पुरस्कृत अरुण शौरी का जन्म 2 नवम्बर 1941 जालंधर में हुआ अमरीका के सिराक्यूस विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि ली ।  यह समकालीन तथा राजनीतिक मामलों पर भारत के एक जाने-माने टिप्पणीकार हैं, सम्यक विश्लेषण और गहन शोध उनके लेखन की विशेषताएँ हैं । यह विश्व बैंक में अर्थशास्त्री, योजना आयोग के सलाहकार और इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादक भी रह चुके हैं । इन्होंने अब तक 13 पुस्तकें लिखी हैं  

अनोखा पेड़



प्रस्तुत पुस्तक 'अनोखा पेड़' राजस्थानी भाषा में लिखित 'बातारी फुलवारी' के नौ भागों की चयनित अनुवादित कहानियाँ हैं । चयन में इस बात पर ध्यान दिया गया है कि पशु-पक्षी सम्बन्धी कथाएँ ही हों, जिससे   बालोपयोगी साहित्य में कुछ संवर्द्धन हो सके ।  राजस्थानी भाषा से यों हिन्दी में अनुवाद करने की प्रक्रिया सहज है किन्तु कथा में अनेक स्थल एवं वाक्य-विन्यास ऐसे भी आवश्यक लगे जिनके माध्यम से राजस्थानी वातावरण को बनाए रखना महत्त्वपूर्ण लगा । इस तरह की दो समस्याएँ थीं । एक समस्या का सम्बन्ध था लोक कथाओं के उन स्थलों से जहाँ पद्यांश का प्रयोग किया जाता है और दूसरी समस्या थी कुछ शब्दों की जो सामान्यतया हिन्दी पठन-पाठन में प्रचलित नहीं है । पद्यांश को अनुवादित करने पर उनकी आन्तरिक छन्दोमयता टूटती हुई दिखाई देती थी । अत: हमने तय किया कि राजस्थानी पद्यांशों को ज्यों का त्यों रखा जाए । इनके अनुवाद का प्रयोग हमने केवल उन स्थानों पर किया जहाँ हिन्दी अनुवाद से छन्दोमयता भंग नहीं होती थी । हिन्दी पाठकों की  सुविधा के लिए परिशिष्ट में पद्यांशों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ देने की आवश्यकता भी इसलिए बन गयी अनोखा पेड़ के पृष्ठ  संख्या 142  से " बेटी ने हंडिया औंधी करके माँ का कुंडा पूरा भर दिया । माँ तो गरम-गरम  ही खाने लगी सो देखते-देखते सारा मांस चट कर गयी । दूसरा कुंडा खाने लगी तो पालतू बिल्ली पास आकर कहने लगी : ''हाय रे हाय, माँ बेटी ने खाय, थोड़ी बोटियाँ म्हनै ई चखाय।" किसी भी शिक्षा प्रणाली का मापदंड यही है कि वह विद्यार्थी की मानसिक अवस्था के अनुकूल माध्यमों के द्वारा प्रकृति, जगत, समाज  और ज्ञान- विज्ञान की समस्याओं को धीरे-धीरे  समझाने में सफल हो सके । बालक के मानस की ऐसी सहज ज्ञान की सीमा में लोक कथाओं का माध्यम एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । बालक ज्यों ही भाषा को बोलने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, वह उसमें व्यवस्थित किसी घटना को कहने व सुनने में आनन्द ग्रहण करने लगता है । ये घटनाएँ चाहे उसके स्वयं के अनुभव द्वारा निसृत हुई हों, चाहे अन्य सामाजिक प्राणी के अनुभव से उत्पन्न हुई हों । यही कारण है कि विश्व के प्रत्येक देश में ही क्या, छोटे-से -छोटे सामाजिक संगठन के परिवार में लोक कथाओं को कहने एवं सुनने का क्रम एक विराट सत्य के रूप में मिल जाता है । लोक कथा वस्तुत: हमारे जीवन की सम्पूर्ण प्रक्रिया में श्वास/साँस  की तरह सहज बनी हुई है और इसलिए यह समझने में कुछ कोशिश रहती है की श्वास कि क्षीण एवं दुर्बलतम ध्वनि का ही परिणाम है कि हम जीवित हैं । हम दिन-रात पशु -पक्षियों को देखते हैं और वे कभी ऐसी बात नहीं करते जो कथाओं में कही गयी हैं । लेकिन इस सतही तत्व की गहराई में जाएँ  तो यही पता लगेगा कि कथा के रूप को अनुरंजक बनाने के लिए एक अयथार्थ को कौतूहलपूर्ण बनाकर, उसके माध्यम से जीवन के अनुभव के किसी सत्य की  स्थापना की गयी  है । लाखों-करोड़ों की संख्या में प्राप्त इन लोक कथाओं के मालिक बच्चे ही हैं और हम समाज की चिरन्तनता की दृष्टि  से इन बच्चों के सेवक हैं । यदि इस पीढ़ी की हम सेवा कर सकें तो निश्चय ही एक महत्वपूर्ण काम अदा कर सकेंगे

Book : Anokha Ped
Author : Vijaydan Detha
Publisher : Vani Prakashan
Price : `300(HB) 
ISBN : 978-93-5072-154-4
Total Pages : 152
Size (Inches) : 5.75X8.75
Category  : Collection of Short Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में.....

लोक कथा वस्तुत: मौखिक साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है । इस दृष्टि से लोक कथा प्रामाणिक लेखन में राजस्थानी  भाषा का ही प्रयोग आवश्यक समझा गया है । कथा के कथन में राजस्थानी जन-समाज जिन शब्दों का प्रयोग अत्यन्त आत्मीय  एवं व्यंजनात्मक रूप से करता है, उन शब्दों के द्वारा कथा लेखन में भी गहराई आती है । अत: हिन्दी भाषा के आंचलिक प्रयोग के लिए भी स्थान को सुरक्षित रखा गया है । हमारा विश्वास है कि ऐसे राजस्थानी शब्दों के प्रयोग एवं प्रसार के द्वारा हिन्दी का शब्दकोश संवृद्ध होगा । इसी बात के साथ यह भी उल्लेख आवश्यक है कि यह सम्पूर्ण पुस्तक बालोपयोगी कथाओं का संग्रह है, अत: भाषा को अत्यन्त सरल बनाकर लिखने का प्रयास भी किया गया है । इन कथाओं के पठन-पाठन में यदि हिन्दी पाठकों को कठिनाई हो तो वे शब्दार्थ के द्वारा शब्द को समझने की कोशिश करें । बहुत कर शब्दार्थ देखने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि राजस्थानी शब्दों के उपयोग की स्थिति से भी अर्थ का संकेत मिल जायेगा


लेखक के सन्दर्भ में.....
राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्र में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है   पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से पुरस्कृत विजयदान देथा का जन्म 1 सितम्बर 1926, राजस्थान में हुआ । इन्हें इनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैं । देथा ने 800 से अधिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दी, अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ में हो चुका है । उनकी कहानियों पर आधारित  तीन हिन्दी फिल्में -दुविधा, पहेली और परिणीता बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं । 

Thursday, 28 June 2012

हम कौन हैं?




युग बदल गया और बदल रहा है, नहीं बदली है तो वह हमारी जाति आधारित व्यवस्था और संकीर्ण मानसिकता । दुःख  का अधिकार भी एक निम्नवर्ग को समाज प्रदान नहीं करता दुःख और सुख के लिए एक स्तर होना चाहिए भूमंडलीकरण के दौर में जहाँ शहरीकरण तो बढ़ा है, लेकिन इस शहरीकरण में व्यक्ति के संस्कारों में पुरानी छाप दिखाई देती है उस छाप में कोई अपनी जाति के लिए अम्बेडकर और कांशीराम को दुश्मन बताता है, तो कोई वी.पी. सिंह को एक बच्चा विद्यालय में पढ़ने जाता है तो उससे टीचर प्रश्न करते हैं कि तुम्हारा सर नेम  क्या है ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी गुरुद्रोण का आशीर्वाद, अर्जुन की जीत और एकलव्य की ऐसी-तैसी भी देखने को मिलती है हम कौन हैं ? की कहानी 'गिरोह' पृष्ठ संख्या 117 से "पाँच-सात लड़के विद्यालय-प्रांगण में बैठे गप्पें मार रहे थे जातियों का प्रसंग छिड़ा था, तो सुरेश चौधरी नामक लड़के ने कहा, 'यार कल मेरे गाँव के चमट्टे को हमारी बिरादरी ने खूब पीटा ।  कारण, वे हरामजादे मजदूरी करने से मना कर रहे थे इन सालों की इतनी हिम्मत ? हमारी रोटियों पर पले हमसे सीनाजोरी करते हैं ।  इनकी औकात ही क्या है ? मेरे पिता जी के कहने पर हमारे आदमियों ने तो उन्हें अधमरा कर दिया । खूबा चमार तो भंगियों के छप्परों में घुस गया ।  इसलिए उसे छोड़ दिया, नहीं तो उसकी तो कहानी ही ख़त्म हो जाती ।" यह सुन कर कैलाश शर्मा बोला-"पिछले साल इन्हीं  की जमीन तुम्हारे घरवालों ने छीनी थी ।" सुरेश चौधरी पुन: चहकता हुआ बोला-"जमीन इनकी थोड़े ही थी ।   वह तो हमारे पास रेहन (गिरवी) रखी थी ।  कंगन समय पर नहीं छुड़ा पाये तो डूब गयी, और डूबती भी न तो हम उन्हें कौन से वापस देते ।   हमारे बब्बा ने पाँच बीघा से पचास बीघा जमीन कोई जादू से थोड़े ही बढ़ाई है । इन्हीं मूर्खों से ली है ।"  प्रदीप वर्मा ने उत्साह के साथ कैलाश शर्मा के घर की पोल खोलते हुए कहा, "तुम्हारे बड़े भइया ने तो एक चमारी से शादी कर ली है ।  उसे क्यों छुपाते हो ।" कैलाश ने प्रदीप को डपटते हुए सचेत किया कि "खबरदार, मेरी भाभी को चमारी कहा तो ! वह तो रईस-सीनियर आई.ए.एस. की बेटी हैं और खुद भी आई. ए. एस. की परीक्षा में बैठ रही हैं । "प्रदीप ने खिसियाते हुए कहा, "है तो चमारी ही।" ऊँची नौकरी पर होने से जाति थोड़े ही बदल जाती है ।" कैलाश ने पुन: जोर देते हुए कहा " बदल कैसे नहीं जाती ।   जमाना बदल रहा है, जाति भी बदल रही है और इंसान भी बदल जाते हैं क्या तू नहीं जानता कि लड़की की शादी होते ही उसकी जाति वही हो जाती है जो उसके पति की होती है क्या वर्मा की बेटी शर्मा से शादी करने पर मिसेज शर्मा नहीं हो जाती ।" आपस में झगड़ क्यों रहे हो, ज्ञानदेव मिश्रा बोला- मैं तुम लोगों को अपने दूर के रिश्तेदार की कहानी बताता हूँ ।  मेरी ममेरी भांजी ने एक पासी युवक से शादी कर ली फिर क्या था उसके पति ने पासी जाति का प्रमाण-पत्र उसके लिए बनवा दिया । कुसुम पढ़ने में तो होशियार नहीं थी पर वह उच्च जाति से सम्बन्ध रखती थी । उसे पढ़ाई की सहूलियते मिली हुई थीं अब कुसुम रेलवे में आरक्षण पा कर अफसर बनी हुई है कुसुम कहती है कि मैं अपने हसबैंड के गाँव एक बार गयी थी, वहाँ उनके मोहल्ले में बहुत बदबू आती है वहाँ के मर्द-औरतें और बच्चे मैले-कुचैले कपड़े पहने घूमते हैं गन्दी काली-खूसट औरतें मेरे दोनों हाथ पकड़-पकड़कर  चूमती थींवह कहती है कि मैं उसके साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकती ।"  

B
ook : Hum Kaun Hain
Author : Rajat Rani 'Meenu'
Publisher : Vani Prakashan
Price : `200(HB) 
ISBN : 978-93-5000-818-8
Total Pages : 124
Size (Inches) : 5.75X8.75

Category  : Collection of Short Stories

पुस्तक के सन्दर्भ में......

कहानी 'हम कौन हैं?' उसी कहानी के शीर्षक पर पुस्तक 'हम कौन हैं?' का नाम रखा गया है । जो एक प्रश्न उत्पन्न करती है और यह पहचान का सवाल हमेशा दलितों के बीच उभरता रहा है कि 'हम कौन थे और क्या हो गये हैं ?' इतिहास-बोध की दृष्टि से अछूत बनाई गयी जातियों को स्वामी अछूतानन्द अछूत भारत को 'आदि हिन्दू' मानते थे । बाद में बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बहिष्कृत भारत नाम दिया । 1956  में बौद्ध धर्म ग्रहण किया, तब से महाराष्ट्र के कुछ अछूत अपने आप को बुद्ध का अनुयायी कहने लगे । उत्तर भारत में दलितों ने अपनी जड़ें बाद में पहचानीं । कुछ दलित अपने कार्य व्यवहार में हिन्दू ही बने रहे, तो कुछ ने बौद्ध धर्म के आवरण ओढ़ लिए ।  इधर 'आजीवक धर्म' की खोज भी जोरों पर है । कहा जाता है कि यह बुद्ध से पहले का धर्म था । कमजोर वर्ग का धर्म होने के कारण इसे ताकतवर वर्ग के धर्म ने दबा दिया और यह विलुप्त कर दिया गया । अब गैर दलितों के लिए दलित चाहे जितने धर्म रूपी वस्त्र बदल लें, परन्तु उनके लिए वे अछूत ही हैं । भारतीय समाज पर अभी भी हिन्दू धर्म का वर्चस्व कायम है । जातिविहीन समाज बनाने वालों के दावों के बावजूद 'जाति' भारतीय समाज में जन्म से ही जिज्ञासा का विषय बनी रही है । इस समाज में दलित स्त्री के साथ हो रहे जातिगत भेदभावों, अमानवीय दमन को निज से जोड़ कर देखें तो अनुभवों के वितानों का विस्तार होता चला जाता है 'फरमान' कहानी इसी तरह के अनुभवों को समेट कर लिखी गयी है । दलित समाज में शिक्षा का स्तर अवश्य बढ़ा है, जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है । भले ही यह गैरदलितों के विकास की तुलना में न के बराबर है । सामन्ती व्यवस्था भारतीय समाज पर लम्बे अर्से तक कायम रही । यूँ दलित कभी सामन्त नहीं रहे मगर गैरदलितों द्वारा लम्बे समय तक उनसे सेवाएँ ली गयीं । उनके साथ दासों से भी ज्यादा ज्यादतियाँ की गयीं । समाज से मिले विभिन्न तरह के विषमतावादी अनुभवों ने लेखिका के संवेदनशील मन-मस्तिष्क पर चोट की है । दर्द के रूप में 'वे दिन', 'धोखा', 'सलूनी' जैसी कहानियाँ सृजित हुई हैं । 'हम कौन हैं?' ये समाज के कटु यथार्थ की पीड़ादायी अभिव्यक्ति है । 

लेखिका के सन्दर्भ में.....
रजत रानी 'मीनू' का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद के जौराभूड़   नामक गाँव में हुआ । एम.फिल.,और पीएच.डी. (हिन्दी दलित कथा-साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त की हंस, कादम्बिनी, हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, अन्यथा, अपेक्षा, बयान, बसुधा, अंगुत्तर, युद्धरत आम आदमी, इंडिया टुडे आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ, आत्मकथाएँ एवं समीक्षा प्रकाशित । नवें दशक की हिन्दी दलित कविता पुस्तक मध्य प्रदेश दलित साहित्य अकादमी, उज्जैन द्वारा पुरस्कृत वर्तमान में यह असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं  



मीडिया रिपोर्ट :

12 अगस्त 2012 प्रभात खबर (अखबार) में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा http://www.prabhatkhabar.com/node/194728

30 सितम्बर 2012 अमर उजाला (अखबार) पृष्ठ संख्या-13 में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा http://epaper.amarujala.com/svww_index.php 
                                                                                                                                                                                                            

Wednesday, 27 June 2012

बृहद आधुनिक कला कोश




अब तो मुझे अपने पर तरस भी नहीं आता इस सन्नाटे की यन्त्रणा को मैं नहीं बता सकता जो शब्द कहने के लिए कभी मेरे पास थे तारों में बदल गये हैं।-एपोलिनेयर (पिकासो को समर्पित एक कविता की पंक्तियाँ)  

Book : Brihad Aadhunik Kala Kosh
Author : Vinod Bhardwaj
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `995(HB)  
ISBN : 81-8143-491-9
Total Pages : 556
Size (Inches) : 7.25X9325

Category  : Articles of Indian Art

पुस्तक के सन्दर्भ में......
'बृहद आधुनिक कला कोश' इसमें आधुनिक कला के सम्बन्ध में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ एक जगह पर एकत्रित की गयी हैं ।  कला प्रेमी पाठक और कलाकार के लिए यह एक इनसाइक्लोपीडिया की कमी को पूरा करती है । आधुनिक भारतीय कला के विकास, उसकी आधारभूत बहसों, चुनौतियों, उपलब्धियों, दस्तावेजों आदि का यह एक अभूतपूर्व और प्रामाणिक संकलन है ।  हिन्दी में ही नहीं अंग्रेजी सहित किसी दूसरी भारतीय भाषा में ऐसा कोश अद्वितीय है । क्योंकि यह आधुनिक कला के अब तक के विकास का एक प्रतिनिधि संकलन नये बृहद् रूप में पहली बार प्रस्तुत है ।  इसमें भारतीय आधुनिक कला और पश्चिमी आधुनिक कला के इतिहास का एक अलग तरह का परिचय और विश्लेषण शामिल है   भारतीय आधुनिक कला को उसकी समग्रता में जानने के लिए पश्चिमी आधुनिक कला के विकास को जानना और जाँचना जरुरी है ।  
इस कोश में  विनोद भारद्वाज के तीस वर्षों के लेखन के अलावा हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कला लेखन के नमूने शामिल हैं ।  हिन्दी का कुछ दुर्लभ कला लेखन खोज कर 'दस्तावेज' खण्ड में शामिल किया गया है ।  सिर्फ कला ही नहीं -किसी भी रचनात्मक विधा को उसकी समग्रता में समझने के लिए यह कोश अनिवार्य है ।  कविता, कला, सिनेमा, आदि सभी आधुनिक विधाओं की आवाजाही हमारे समय में महत्वपूर्ण हो गयी है ।  यह कोश इस महत्व को रेखांकित करता है ।  कोश में राजा रवि वर्मा से शुरू हो कर आज के अनेक युवा कलाकारों की सूची बहुत खोज और शोध के बाद शामिल की गयी है ।  आधुनिक भारतीय कला के अध्येता निश्चय ही इस सूची को उपयोगी पायेंगे।  तमाम दुर्लभ राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय कैटलागों, किताबों और पत्रिकाओं की मदद से तैयार की गयी यह सूची आधुनिक भारतीय कला के दरवाजे खोलने की एक कुंजी भी साबित हो सकती है । 

पुस्तक के अनुक्रम
पश्चिम में आधुनिक कला का इतिहास
आधुनिक भारतीय कला का विकास : कलाकारों के आईने में (जिसमें 50 हस्ताक्षरों को सम्मिलित किया गया है)
समकालीन भारतीय कला की दशा-दिशा
कला और उसका बाज़ार
राजा रवि वर्मा से आज तक
कवि और कलाकार
दस्तावेज

लेखक  के सन्दर्भ में.....
कविता के लिए भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और सर्जनात्मक लेखन के लिए संस्कृति पुरस्कार से पुरस्कृत हस्ताक्षर विनोद भारद्वाज का जन्म 7 अक्टूबर, 1948 को लखनऊ में हुआ । लखनऊ विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए. किया  सन 1967-69 में हिन्दी में आधुनिक कविता और कला की बहुचर्चित लघु पत्रिका 'आरम्भ' का सम्पादन किया । 1973 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के हिन्दी प्रकाशनों से पत्रकार के रूप में जुड़े । मुम्बई के नवभारत टाइम्स और धर्मयुग में प्रारम्भिक प्रशिक्षण के बाद 'दिनमान' साप्ताहिक के सम्पादकीय विभाग से जुड़े । टाइम्स ग्रुप में 25 साल काम करने के बाद 1998  से स्वतन्त्र लेखन । इन दिनों 'आउटलुक' साप्ताहिक के फ़िल्म समीक्षक और 'सहारा समय' के कला स्तम्भ लेखक हैं        

Saturday, 23 June 2012

एम. एफ. हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी



'एम. एफ. हुसेन की कहानी अपनी ज़ुबानी' 
हुसेन साहब ने अपनी माँ  को नहीं देखा था, हुसेन अपनी माँ की शक्ल को खोजते थे ।  वह स्त्री के अन्दर माँ के स्नेह को खोजते थे और सोचते थे कि क्या मेरी माँ ऐसी ही थी । एक बच्चे को प्यार-दुलार, ममता माँ के अलावा कोई नहीं दे सकता । हुसेन साहब ने उसे यूँ व्यक्त किया है - मक़बूल की माँ क्यों अपनी कोई निशानी नहीं छोड़ गयी ? क्या बेटे को इस दुनिया में छोड़ जाना ही काफी समझा ? क्यों बाप के जूतों में खड़ा कर उसे आँसू भरी आँखों से देखा करती ? कितनी तमन्नाएँ होंगी ? सब अपने साथ ले गयी । हुसेन साहब को कोई मराठी साड़ी इधर उधर पड़ी नज़र आये, तो उसकी हज़ारों तहों में माँ को ढूँढने लगते ।  वह ढूँढने थे माँ का चेहरा, जिसकी दो आँखों में न मालूम कितने ख़्वाब डूबे  । ढूँढते थे वह साँस जिसमें बच्चे के सारे बदन की भीनी खुशबू खिंच  कर कलेजे के अन्दर समा गयी और बाहर न निकल सकी ।  कहाँ हैं वह होंठ ? वह माँ की मोहब्बत का ज्वालामुखी ? वह ममता के जिस्म के हर पोर से उबलता बेपनाह प्यार का लावा, उनकी अंदरूनी कराहती चिंगारी दरबदर मारी मारी फिरती थी दुनिया का कोना कोना छान मारा, जंगल बयाबाँ  के नक्श को कुरेदा ।   
 
Book : M. F. Husain Ki Kahani Apani Zubani  
Author  : M. F. Husain
Distributor : Vani Prakashan
Published by : M.F. Husain Foundation 
Price : `395(PB)
Total Pages : 267
Size (Inches) : 9.28X7.25
Category  : Autobiography


पुस्तक के सन्दर्भ में.......
जब हम एक लेखक की 'आत्मकथा' पढ़ते हैं, तो वह उन्हीं शब्दों के माध्यम से अपनी कहानी कहता है जो उसने अपनी कविताओं, उपन्यासों में प्रयोग किये थे किन्तु जब एक चित्रकार या संगीतकार अपने जीवन के बारे में कुछ कहता है तो उसे अपनी 'सृजन भाषा' से नीचे उतर कर एक ऐसी भाषा का आश्रय लेना पड़ता है, जो एक दूसरी दुनिया में बोली जाती है, उससे बहुत अलग और दूर, जिसमें उसकी 'कालात्मा' अपने को व्यक्त करती है । वह एक ऐसी दुनिया है, जहाँ वह है भी और नहीं भी, उसे अपनी नहीं अनुवाद की भाषा में बात कहनी पड़ती है । हम शब्दों की खिड़की से एक ऐसी दुनिया की झलक पाते हैं , जो 'शब्दातीत' है -जो बिम्बों, सुरों, रंगों के भीतर संचारित होती है । हम पहली बार उनके भीतर उस 'मौन' को मूर्तिमान होते देखते हैं, जो लेखक अपने शब्दों के बीच खाली छोड़ जाता है । हुसेन की आत्मकथा की यह अनोखी और अद्भूत विशेषता है, कि वह अनुवाद की बैसाखी से नहीं सीधे चित्रकला की शर्तों पर, बिम्बों के माध्यम से अपनी भाषा को रूपान्तरित करती है । ऐसा वह इसलिए कर पाती है, क्योंकि उसमें चित्रकार हुसेन उस 'दूसरे ' से अपना अलगाव और दूरी बनाये रखते हैं, जिसका नाम मकबूल है, जिसकी जीवन-कथा वह बाँचते हैं, जिसने जन्म लेते ही अपनी माँ को खो दिया, जो इन्दौर के गली-कूचों में अपना बचपन  गुजारता है, बम्बई के चौराहों पर फिल्मी सितारों के होर्डिग बनाता है, कितनी बार प्रेम में डूबता है, उबरता है, उबार कर जो बाहर उजाले में लाता है उनकी तस्वीरें बनाता है धूल धूसरित असंख्य ब्योरे, जिनके भीतर के एक लड़के  की झोली, बेडौल, नि श्छल छवि धीरे धीरे 'एम. एफ. हुसेन, की प्रतिमा में परिणत होती है
हुसेन की आत्मकथा अपनी प्राणवत्ता छोटे-छोटे ब्योरों, तफसीलों में ग्रहण करती है ।  ज़रा देखिये उसकी शुरुआत, जैसे आप शब्दों के भीतर से फ़िल्म का कोई सीन देख रहे हों । 
'मिट्टी का घड़ा, चारपाई पर रखा, 
छत से लटकती लालटेन खामोश । 
तकिए के नीचे किताब का चौदहवां पन्ना खुला,
टीन के संदूक में बेजोड़ कपड़े ....
गर्द के मैले रंग की नीली कमीज़, साइकिल के टूटी चेन
मलमल का नारंगी दुपट्टा, बाँस की बांसुरी
गुलाबी पतंग के कागज़ की पुड़िया में अंगूठी

बचपन  की यह कच्ची स्मृतियाँ समय के साथ पकती जाती हैं और मुद्दत बाद यह लालटेन, यह घड़ा, मलमल का दुपट्टा आपको कभी हुसेन की किसी फिल्मी किसी पेंटिंग, किसी कविता के भीतर दुबके दिखाई दे जाते हैं ।  ज़िन्दगी के प्रवाह में बहता हुआ कोई अदना- सा टुकड़ा, कोई भूला हुआ शब्द, कोई भोला-सा चेहरा विस्मृति के अँधेरे  में गायब नहीं होता, बरसों बाद खोये हुए मुसाफिर की तरह लौटकर हुसेन की वर्कशॉप में आश्रय पा ही लेता था ।  हुसेन की 'आत्मकथा' अन्य चित्रकारों के पन्नो, डायरी, जर्नल्स से इतनी अलग दिखाई देती है, वह सीधे-सीधे अपने चित्रों के बारे में कुछ नहीं कहती वह उनके जीवन में होने वाली घटनाओं, सुदूर देशों की यात्राओं, खूबसूरत अविस्मरणीय लोगों की स्मृतियों और सबसे ज्यादा खुद अपने भीतर की भूलभुलैयों में भटकने का लेखा-जोखा है । 

लेखक के सन्दर्भ में.....
पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण सम्मानों से अलंकृत   प्रख्यात चित्रकार एम. एफ. हुसेन का जन्म 17 सितम्बर 1915, पंढरपुर, महाराष्ट्र के एक तीर्थ स्थान में हुआ था । जब वह एक वर्ष के थे, जब उनकी माता जैनब का देहांत हो गया । उनकी माता ने न कभी कोई तस्वीर खिंचवाई थी न कोई आकृति हुसेन को याद, वह हुसेन जिन्होंने कितने ही चेहरों को अमर बना दिया । यह कमी हुसेन ने अपनी सारी जिंदगी महसूस की । हुसेन के दादा ने उनकी परवरिश की । पंढरपुर छोड़ कर वह इन्दौर चले गये जहाँ हुसेन के पिता फिदा हुसेन को नौकरी मिली थी और यही से शुरू हुआ मक़बूल फिदा हुसेन का सफर ।  9 जून  2011 को  इनका  देहांत  हो  गया  । 

Tuesday, 19 June 2012

'बुनियाद'




वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भारतीय टेलीविजन इतिहास का मील स्तम्भ 'बुनियाद' । 'बुनियाद' डेढ़ सौ से भी ज्यादा कड़ियों तक चलने वाला लोकप्रिय धारावाहिक रहा है । इसकी लोकप्रियता को देखते हुए वाणी प्रकाशन ने इसे 'बुनियाद' और   'बुनियाद II' एवं 'बुनियाद III, के रूप में प्रकाशित किया है । पाठकों  के समक्ष 'बुनियाद' पुस्तक की शक्ल में प्रस्तुत है ।    

'दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में 'बुनियाद' को देश के लाखों-करोड़ों दर्शकों ने देखा और सराहा । उसकी  इस सफलता को लेकर मेरी  खुशी स्वाभाविक है, खासकर इसलिए भी कि इसके माध्यम से मैंने जो कहा, लोगों ने उसे पूरे मन से सुना समझा । लेकिन 'बुनियाद' पर काम करते हुए जिन मित्रों का सहयोग मिलता रहा, वह न मिलता तो ऐसी सफलता संदिग्ध थी । खासतौर से लेखन-कार्य में सलाहकार रहीं सुप्रसिद्ध कथाकार कृष्णा सोबती तथा शोध-कार्य के लिए डॉ. पुष्पेश पन्त के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ ।  दृश्यालेख को पुस्तक-रूप देने में श्री भूपेन्द्र अबोध ने जो कार्य किया उसके लिए मैं उनका भी आभारी हूँ ।'  - मनोहर श्याम जोशी( The  Father fo Indian Television soap opera)

Book : Buniyaad ( Total 3 Parts)
Author Manohar Shyam Joshi 

Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 848
Size (Inches) : 
5.75X8.75
Category  : Novel

S.No.
Books
ISBN
Price `
1.
Buniyad
81-8143-671-7
300
2.
Buniyad-II
978-93-5000-956-7
395
3.
Buniyad -III
978-93-5000-957-4
395

पुस्तक के सन्दर्भ में जी.पी.सिप्पी (बुनियाद के निर्माता) के विचार....
" 'बुनियाद' की कहानी एक परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी है । एक ऐसा परिवार, जो विभाजन के समय लाहौर में भड़क उठे दंगों की तबाही में उजड़ने-बिखरने के बाद, पाँच दशकों तक समय के थपेड़ों का मुकाबला कर आज फिर से खुशहाली की मंजिल तक पहुँचा है ।  जब 'हमलोग' बन रहा था, तब एक बार मनोहर श्याम जोशी से मुलाक़ात हुई थी । बड़े क़ाबिल और पढ़े-लिखे आदमी लगे । जब 'बुनियाद' की बात आई तो सबसे पहले उन्हीं का ख्याल आया ।"

पुस्तक के संदर्भ में प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार सुधीश पचौरी के विचार......
"अपने तमाम फ़िल्मी लटकों-झटकों के बावजूद हमारे लाख नाक-भौं सिकोड़ने के बावजूद जिस निरन्तरता से 'बुनियाद' ने एक-से -एक चरित्र हमें दिए, वैसे दूरदर्शन ने अब तक के इतिहास में न दिए होंगे । हवेलीराम का दृढ़ आदर्शवाद, लाजो का धरती जैसा 'माँ' - रूप और विभाजन की विभीषिका को पृष्ठभूमि  बनाकर चलती हुई कहानी, तमाम उत्तर भारत के आधुनिक मध्यवर्ग की नींव की तरह हमें छूती रही ।  अगर दूरदर्शन वाले इस सीरियल से मनमानी छेड़छाड़ न करते और जोशी-सिप्पी को थोड़ी अधिक आजादी देते तो यह आज़ादी के बाद के परिवार का और इस तरह समाज का राजनीतिक-सांस्कृतिक अध्ययन बन गया होता । फिर भी, इतने दबावों, आपाधापी और सेसरों के बाद, 'बुनियाद'  सीरियलों के इतिहास में एक निशान छोड़ने वाला है ।"

पुस्तक के संदर्भ में प्रभात रंजन के विचार.....
" 'बुनियाद' अगर सीधे शब्दों में कहें तो हिन्दुस्तान की आज़ादी के साथ हुए बँटवारे में सरहद के इस पार आ गये लोगों की दास्तान है - उनकी 'बुनियाद' की यादगार, लेकिन दारुण गाथा । 'बुनियाद' इतिहास नहीं है, न ही उसका वैसा दावा रहा, बल्कि वह स्मृति के सहारे रची गयी कथा है । स्मृति, जो सामूहिक है - सरहद के इस और उस पार । उसकी इसी सामूहिकता ने उसे बेजोड़ बनाया और ऐतिहासिक भी । 'बुनियाद' का ताना-बाना भले ही इतिहास से जुड़ी स्मृतियों के सहारे बुना गया है, लेकिन उसकी सफलता का भी इतिहास बना।
'बुनियाद' डेढ़ सौ से भी ज्यादा कड़ियों तक चला और अपने समय में सबसे ज्यादा दिनों तक सफलतापूर्वक चलने वाला धारवाहिक था । वे भारत में टेलीविजन की लोकप्रियता के शुरूआती दिन थे । तब भारत में टेलीविजन और दूरदर्शन एक-दूसरे के पर्याय समझे जाते थे । ऐसे बहुतेरे लोग मिल जाएँगे, जो यह कहते पाये जा सकते हैं कि उन्होंने 'बुनियाद' देखने के लिए ही टेलीविजन ख़रीदा । 'बुनियाद' इस कारण भी याद रहता है कि उसकी पारिवारिकता, प्रसंगों की मौलिकता और समकालीनता ने कैसे उसके किरदारों को घर-घर सदस्य बना दिया था । मास्टरजी, लाजोपी, वृषभान, वीरांवाली जैसे पात्र लोगों की आपसी बातचीत का हिस्सा बनकर 'टेलीविजन दिनों' के आमद की सूचना देने लगे थे । 'उजड़े' हुए परिवारों के 'आबाद' कहानी के रूप में जिस तरह इस कथा का ताना-बना बुना गया था, उसमें लेखकीय स्पर्श काफी मुखर था । इसी धारावाहिक के बाद इस तरह की चर्चा होने लगी थी कि टेलीविजन लेखकों को अपनी अभिव्यक्ति का पर्याप्त मौका देता है, कि यह लेखकों का माध्यम है ।
मनोहर श्याम जोशी टेलीविजन के पहले सफल लेखक थे । ऐसे लेखक जिनके नाम पर दर्शक धारावाहिक देखते थे ।  उस तरह से वे आखिरी भी रहे ।  टेलीविजन-धारावाहिकों ने लेखकों को मालामाल चाहे जितना किया हो, उन्हें पहचानविहीन बना दिया । मनोहर श्याम जोशी के दौर में कम-से कम उनके लिखे धारावाहिकों को लेखक के नाम से जाना जाता रहा । 'बुनियाद' उसका सफलतम गवाह है । टेलीविजन धारावाहिक के पात्रों से दर्शकों का अद्भूत तादात्म्य स्थापित हुआ । 'हमलोग' की बड़की को शादी के ढेरों बधाई तार मिले थे , तो बुनियाद के दौरान लाहौर में लोगों ने यह अनुभव किया कि हमारा पड़ोसी हिन्दू परिवार लौट आया है ।"

लेखक के सन्दर्भ में.......
भारतीय सोप ओपेरा के जनक मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को अजमेर (राजस्थान) में हुआ था । लखनऊ विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक हुए। वहीं से 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये थे। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद इन्हें प्राप्त हुआ । प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फिल्म विज्ञापन- सम्प्रेषण सभी के लिए सफलता पूर्वक कार्य किया

केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन 1967 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने । टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतन्त्र  लेखन किया। इन्होंने हम लोग के अलावा 'बुनियाद', 'हमराही' ,'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' व 'जमीन-आसमान' जैसे चर्चित धारावाहिकों के साथ उन्होंने 'हे राम', 'पापा कहते हैं' ,'भ्रष्टाचार' आदि अनेक फिल्मों की भी पटकथाएँ लिखीं।  'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें वर्ष 2005  में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।  30  मार्च 2006 को उनका निधन हो गया ।   

Monday, 18 June 2012

'हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया' दस खण्डों में



वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया' इसके सम्पादक मण्डल ने उपलब्ध ज्ञान के सभी स्रोतों द्वारा हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया के लिए सूचनाएँ एकत्रित की हैं । पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है 'हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया'       

'सभ्यताएँ नष्ट हो जाती हैं, पर शिलालेख, चित्रलेख व पुस्तकें बची रहती हैं । और ये हमारी संस्कृति की संवाहक हैं ।  इसलिए इन्हें सहेज कर रखना ज़रूरी है। देश भर में किसी प्रदेश का यह पहला इन्साइक्लोपीडिया है जिसे रिकॉर्ड समय में मात्र डेढ़ साल की अवधि में सम्पूर्ण किया गया है । - चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा (मुख्यमंत्री, हरियाणा सरकार)

कोई भी सभ्यता और संस्कृति अपने उपलब्ध आलेखों और तथ्यों से ही पहचानी जाती है। हड़प्पा सभ्यता और माया संस्कृति की जो भी जानकारी आज हमारे पास उपलब्ध है, वह सिर्फ और सिर्फ अपने पुरातात्विक संकेतों और प्राचीन अभिलेखों से ही जानी गयी है । 44  वर्षों में हरियाणा ने भारतीय इतिहास में विकास की नयी इबारत लिखी है । आज यह राज्य विकास का रोल मॉडल है । मेरे मन में कल्पना थी कि प्रदेश के भूगोल, इतिहास, संस्कृति, साहित्य और विकास से जुड़े हर पहलू को एकत्रित कर इन्साइक्लोपीडिया के रूप में प्रकाशित किया जाये ।  और इसकी परिणति आज इन्साइक्लोपीडिया के रूप में पाठकों के हाथों में है । मेरी जानकारी के अनुरूप यह भारतवर्ष में किसी भी प्रदेश का सम्पूर्ण जानकारी युक्त प्रथम इन्साइक्लोपीडिया है हमने अत्यन्त श्रमपूर्वक और अति सीमित समय में हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया दस खण्डों में प्रस्तुत किया है। - डॉ. कृष्ण कुमार खण्डेलवाल (आई.ए. एस.)

Book : Haryana Encyclopedia (Total 10 Parts )
Chief Editor : Dr. Krishna Kumar Khandelwal (IAS)
Editor : Dr. Shamim Sharma
Publisher : Vani Prakashan 
Price : `25,000(HB)  
ISBN : 978-81-8143-948-2
Total Pages : 5524
Size (Inches) :
8.75X11
Category  : Encyclopedia


हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया के प्रत्येक खण्ड का संक्षिप्त परिचय 
भूगोल खण्ड (पहला और दूसरा खण्ड)
भूगोल खण्ड में हरियाणा की त्रिविध धरती-उत्तर में शिवालिक की हरीतिमा-मंडित पहाड़ियों का सौन्दर्य, दक्षिण में अरावली की खुश्क पहाड़ियों में बहुमूल्य स्लेट का पत्थर और बीच में उपजाऊ मैदान-'धान का कटोरा', गेहूँ, कपास का भण्डारतारावड़ी और जीवन नगर के बासमती चावल की सुगन्ध का भरपूर आनन्द । साथ ही सरस्वती, घग्घर और दृषद्वती नदियों की कल-कल ध्वनि । हरियाणा के करीब सात हज़ार गाँवों और सैकड़ों कस्बों-शहरों का भौगोलिक और सांस्कृतिक परिचय ।  

संस्कृति खण्ड (तीसरा और चौथा खण्ड)
वैदिक ऋचाओं के पाठ की मधुर ध्वनियाँ एवं मत्रोच्चारण, प्राचीन मूर्तिकला, सांग, रागनी, भोपे, सँपेरे, दीपचन्द व लखमीचन्द से लेकर आधुनिक नाट्य कला, नुक्कड़ नाटक, फ़िल्म 'चंद्रावल' तथा बॉलीवुड में बढ़ती हिस्सेदारी चलचित्र की तरह दिखाई गयी है । गाँवों के पनघट की चहल-पहल, चौपालों के ठाठ और हुक्कों की गर्माहट । 
इतना ही नहीं बाबा तोतापुरी, भक्त फूलसिंह, सेठ छाजूराम, स्थाणुदत्त, सुभाषिणी, स्वामी रामदेव  और, साथ में पण्डित जसराज, जोहराबाई अम्बाला वाली, ख्वाज़ा अहमद अब्बास, जे.पी.कौशिक, ओम पुरी, मल्लिका शेरावत, योग ज्यॉय, रघुराय, मीता वशिष्ट, मीमांसा मलिक, शंकर जादूगर । इसके अलावा हरियाणा के खीर-चूरमा,सीत-राबड़ी एवं गुड़-बाजरे से लेकर रेवड़ी-घेवर तक के स्वाद और तागड़ी, बोरला, हंसली, छैलकड़े, गुलबन्द, पछेल्ली, बिछुए, रमझोला गहनों की चमक-दमक । 

साहित्य खण्ड ( पाँचवाँ और छठवाँ खण्ड)
ऋग्वेद, उपनिषद्, सांख्य दर्शन, पुराण, जैन, सन्त, सूफी, राम-कृष्ण काव्य, आधुनिक काल की विधाओं- कहानी, नाटक, उपन्यास, समकालीन कविता, आत्मकथा, लघुकथा, आलोचना, नवगीत और ग़ज़ल के गलियारों की सम्पूर्ण परिक्रमा । वेदव्यास, सूरदास, हाली, भाई संतोखसिंह , हरभजनसिंह 'रेणु', कश्मीरीलाल ज़ाकिर, राजाराम शास्त्री, जयनाथ 'नलिन',  विष्णु प्रभाकर, उदयभानु हंस, राकेश वत्स, कुमार रवीन्द्र, ज्ञानप्रकाश  विवेक, विकेश निझावन, कमला चमोला से लेकर मनोज छाबड़ा तक

इतिहास खण्ड (सातवाँ और आठवाँ खण्ड)
कुरुक्षेत्र में महाभारत का धर्म-अधर्म के बीच भीषण युद्ध, भारतीय इतिहास को नया मोड़ देती पानीपत की तीन लड़ाइयाँ प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में रक्तरंजित हाँसी की लाल सड़क और कारगिल की बर्फीली चोटियों पर वीर सैनिकों का खून-हरियाणवी बलिदान की रोमांचपूर्ण गाथा । हेमू से हुड्डा तक का विहंगावलोकन । खाप पंचायतों के वीरतापूर्ण संघर्ष, आईएनए के बलिदानी, स्वाधीनता संग्राम के योद्धा, कोसली, रोहनात और लुदेसर के रणबांकुरे । रेवाड़ी, रानियाँ और झज्झर के नवाब
उत्खनन स्थल, पुरातात्त्विक तथ्य और अभिलेख । हरियाणा की पहली विधान सभा से लेकर आज तक के सभी विधायकों-सांसदों का परिचय, और विधान सभा का इतिहास

नौवाँ खण्ड (विकास खण्ड)
हरियाणा के करीब सात हजार गाँवों में बिजली की जगमगाहट, सड़कों का निर्माण और घर-घर में पानी की सप्लाई। निर्मल गाँव योजना के तहत भारत के प्रथम राज्य हरियाणा के 798  निर्मल गाँवों की सफलता की कहानी । सोनीपत की एटलस साइकिल से गुड़गाँव की मारुति तक । अम्बाला में विज्ञान के साजो-सामान व मिक्सी से लेकर जगाधरी-रेवाड़ी के ठठेरों से होते हुए फरीदाबाद के ट्रैक्टर, कम्प्यूटर । जिन्दल उद्योग, ज़ी टी.वी., सनसिटी, डी.एल.एफ., लिबर्टी, एक्शन-शू और असंख्य औद्योगिक घरानों की विकास गाथा । नगर निर्माण में पंचकूला के व्यवस्थित रूप से लेकर गुड़गाँव की 'माल' के हाल तक की नवीनतम जानकारी । राजीव गाँधी एजुकेशन सिटी, कुल 311 कॉलेज, आठ यूनिवर्सिटी और उत्तरी भारत का पहला महिला विश्वविद्यालय -भक्त फूलसिंह महिला विश्वविद्यालय खानपुर कलां

दसवाँ खण्ड (चित्रलेख खण्ड)
'चित्रलेख' खण्ड में छाया चित्रों द्वारा उपरोक्त पाँच खण्डों की पृष्ठभूमि में समग्र हरियाणा का चक्षुष स्वरूप अंकित है । यह खण्ड हरियाणा के प्रसिद्ध छायाकार योग ज्वॉय, रघुराय, रणबीरसिंह, ओमप्रकाश कादयान तथा अशोक गुप्ता के छायाचित्रों से हरियाणा की आज तक की मनोहारी तस्वीर प्रस्तुत करता है । इसके अतिरिक्त हरियाणा के पुरातत्त्व विभाग द्वारा प्रदत्त अनेक  दुर्लभ चित्र भी हैं । 

सम्पादकों के सन्दर्भ में....
मुख्य संपादक, डॉ. कृष्ण कुमार खण्डेलवाल (आई.ए.एस.)
डॉ. कृष्ण कुमार खण्डेलवाल ने, प्रबंधन, इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र, संस्कृति, कानून आदि पर लगभग 18  पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने बी.ई. (सिविल), एलएल.बी., एलएल.एम., एम.एससी.( आई.टी.),  एम.सी.ए., एम.कॉम. (आई एम) इत्यादि की पढ़ाई की है प्रशासन के कई पदों पर कार्य का अनुभव । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अतिरिक्त प्रधान सचिव (मुख्यमंत्री, हरियाणा ) तथा वित्तायुक्त एवं प्रधान सूचना जन सम्पर्क एवं  सांस्कृतिक कार्य विभाग हरियाणा के पद पर कार्यरत हैं

सम्पादक : डॉ. शमीम शर्मा
इन्हें सामाजिक कार्यों में योगदान के लिए विभिन्न सम्मानों से पुरस्कृत किया गया है । जिसमें, मदर टेरेसा द्वारा स्वर्ण पदक प्राप्त, सन 2001, में राष्ट्रपति द्वारा रजत पदक से सम्मानित, तीस बार रक्तदान एवं रक्तदान कार्यों हेतु अनेक बार पुरस्कृत, उड़ीसा चक्रवात आपदा के समय में उड़ीसा जाकर पीड़ितों में राहत सामग्री वितरण, गुजरात भूकम्प आपदा के समय भुज, भुजाउ एवं अंजार में राहत कार्य किया । कारगिल युद्ध पीड़ित परिवारों हेतु सहायता राशि एकत्रित करने में योगदान
इनकी 'हस्ताक्षर'(लघुकथा) , अजन्मी बेटी की चिट्ठी , पंचनाद, हिन्दुस्तान के ससुर (आलेख), चौपाल के मखौल, चौपाल के चाले, चौपाल पै ताऊ ( हास्य) आदि प्रकाशित कृतियाँ हैं, इन्हें कई पत्र-पत्रिकों के सम्पादन का अनुभव है । वर्तमान में यह माता हरकी देवी महिला महाविद्यालय, ओढ़ा, सिरसा में प्राचार्या हैं

प्रबन्ध सम्पादक : शिवरमन गौड़ 
(आई.ए.एस.)
इन्होंने बी.ए. आनर्स (अर्थशास्त्र), एम. ए. (अंग्रेजी साहित्य) ,एम.फिल. (अंग्रेजी साहित्य) में किया है । यह अंग्रेजी के प्रवक्ता  राजकीय कॉलेज, नारनौल एवं एल.एम. हिन्दू कॉलेज, रोहतक, एस.डी. एम. एवं अतिरिक्त उपायुक्त नारनौल एवं सिरसा, परिवहन महाप्रबंधक, आयुक्त उच्चतर शिक्षा, हरियाणा, निदेशक जल परिवहन मंत्रालय, भारत सरकार,में कार्य का अनुभव है   वर्तमान में यह अतिरिक्त प्रधान सचिव (मुख्यमंत्री, हरियाणा ) तथा निदेशक, जन सम्पर्क एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा में कार्यरत हैं । 

सह सम्पादक : डॉ. नीलम प्रभा 
यह इंडियन लाइब्रेरी एसोसिएशन एवं हरियाणा लाइब्रेरी एसोसिएशन की आजीवन सदस्य हैं तथा हरियाणा लाइब्रेरी एसोसिएशन की सयुंक्त सचिव हैं ।  वर्तमान में यह पुस्तकालयाध्यक्ष एवं कम्प्यूटर केंद्र प्रभारी, फतहचन्द महिला महाविद्यालय, हिसार में कार्यरत हैं।