Friday, 18 May 2012

हंस के विमर्श



'हंस' ने बहसों-विवादों में पक्ष लेने से कभी गुरेज नहीं किया । 'हंस' ने साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक सीमाओं को हमेशा छदम माना और अपने पाठक वर्ग की निर्भ्रान्त पहचान  की । हिन्दी क्षेत्र के छोटे शहर-कस्बों, गाँवों के लोग इसके केंद्र में रहे । 'हंस' ने अपने पाठक वर्ग के लिए प्रवचनकर्ता की भूमिका निभाने से परहेज करते हुए उनसे सार्थक और जुझारू बहस में भिड़ने का जिम्मा सँभाला ।

Book : Hans Ke Vimarsh- I & II  
Series Editor : Rajendra Yadav
Editor : Vibhas Verma  

Publisher : Vani Prakashan
Price :
`1500 Both Parts (HB) 
Part One : ISBN : 978-93-5000-918-5
Part Two  : ISBN : 978-93-5000-919-2
Total Pages : 852
Size (Inches) :
5.75X8.75
Category  : Criticism

पुस्तक के सन्दर्भ में प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव के विचार.....

पिछले पच्चीस वर्षों में 'हंस' की पहचान मुख्य रूप से कथा-पत्रिका के रूप में तो रही ही है, वैचारिक विमर्श भी इस बीच 'हंस' के व्यक्तित्व का जरूरी हिस्सा बने हैं। कभी-कभी तो यह भ्रम भी होता है कि 'हंस' सिर्फ सम्पादकीयों और वैचारिक बहसों के लिए ही जाना जाता है । इस बीच हिन्दी समाज को जो सवाल झकझोरते रहे हैं उन्हें ही हमने अपनी बहसों में समेटने की कोशिश की है । मुझे गर्व है कि अनके विधाओं और क्षेत्रों के बुद्धिजीवियों ने इन बहसों में गम्भीरता और बेबाकी से हिस्सा लिया है । अगर ये बहसें इतनी जीवन्त और झकझोरने वाली बन पड़ी हैं, तो श्रेय उन्हीं को जाता है ।
बड़ा मुश्किल था पुराने अंकों में इन बहसों और विमर्शों को खोजना और महत्त्व के हिसाब से चुनना । कुछ बहसें  तो एकाधिक अंकों तक चलती रही हैं । इस संकलन को प्रस्तुत करते हुए सचमुच सन्तोष होता है कि 'हंस' सिर्फ परम्परागत अर्थों में सिर्फ साहित्य की ही पत्रिका नहीं रही, वह समय और समाज के बौद्धिक सवालों की बाहरी-भीतरी यात्रा भी रही है ।  वैसे भी साहित्य कलात्मक संरचना और भाषा सौन्दर्य तक ही नहीं होता, वह एक विशेष समाज में ही रचा और सराहा जाता है । उसी समाज के प्रश्नों से दो चार होना साहित्य की आत्मा का दर्शन भी है । पच्चीस वर्ष पूरे होने पर 'हंस की पच्चीस कहानियाँ', 'मुबारक पहला कदम' हंस की लम्बी कहानियाँ' (दो खण्ड) के बाद 'हंस के विमर्श' ( दो खण्ड) आशा है पाठकों को रोचक और उपयोगी लगेंगे ।

श्रृंखला सम्पादक के सन्दर्भ में.....
प्रख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त, 1929 आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ । आगरा से एम.ए. करने के बाद मथुरा, झाँसी, कोलकाता होते हुए दिल्ली में ।  पहली रचना 'प्रतिहिंसा' 1947 में 'चाँद' के भूतपूर्व सम्पादक श्री रामरखसिंह सहगल के मासिक 'कर्मयोगी' में प्रकाशित । पिछले 25  वर्षों से साहित्यिक पत्रिका 'हंस' का सम्पादन करते हुए दलित और स्त्री विमर्श को हाशिये से साहित्य की मुख्य धारा में लाने के ऐतिहासिक योगदान ।  प्रसार भारती बोर्ड में रहे ।  उपन्यास , कहानी संग्रह, समीक्षा निबन्ध, सम्पादन, अनुवाद, आदि विधाओं में लेखन । 'सारा आकाश', 'उखड़े हुए लोग', 'शह और मात', 'एक इंच मुस्कान' (मन्नू भंडारी के साथ) जैसे चर्चित उपन्यासों के लेखक ।

संकलन सम्पादक विभास वर्मा के सन्दर्भ में....

विभास वर्मा का जन्म जून 1970  भटसीमरि, मधुबनी (बिहार) में हुआ । इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. और एम. फिल. की डिग्री प्राप्त की । विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित । वर्तमान में देशबन्धु कॉलेज ( दिल्ली विश्वविद्यालय ) में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।